
नीट परीक्षा: अगले चरण की जरूरी बातें Publish Date : 04/12/2025
नीट परीक्षा: अगले चरण की जरूरी बातें
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
इस बार आयोजित हुई मेडिकल की प्रवेश परीक्षा नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कमएंट्रेस टेस्ट - अंडरग्रेजुएट) में 1800000 से भी ज्यादा युवाओं ने करीब एक लाख एमबीबीएस सीटों के लिए भाग लिया है। अब परिणाम आने के बाद काउंसलिंग का दौर चलेगा। जिसमें अकसर देखा जाता है कि सरकारी संस्थानों में किसी भी तरह दाखिला पाने की होड़ सी चलती है। क्योंकि, उनके शुल्क तुलनात्मक रूप से कम नजर आते हैं। इस होड़ के चलते कई छात्र धोखे का शिकार होते हैं।
कई छात्र अगले साल अच्छे नंबरों की आशा में बार-बार साल छोड़ते हैं। छात्रों और अभिभावंकों से गलत निर्णय इसलिए होते हैं, क्योंकि उन्हें प्रवेश से संबंधित सही जानकारी नहीं होती। यहां मैं आपको इसकी जानकारी के साथ अपने अनुभव से कुछ बातें साझा करना चाहूंगा।
बिना काउंसलिंग प्रवेश नहीं
यदि कोई आपसे इस कारण सेवा शुल्क लेता है कि वह बिना कांउंसलिंग किसी अमुक संस्थान में दाखिला दिला देगा, तो यह सरासर धोखेबाजी है। जान लीजिए कि किसी भी मेडिकल प्रोग्राम में सीधे ऐंडमिशन संभव नहीं है। एमबीबीएस, बीडीएस, बीएएमएस, बीएचएमएस सभी कोर्स में दाखिले के लिए काउंसलिंग से होकर गुजरना पड़ता है। हमारे देश में किसी भी मेडिकल कोर्स में ऐंडमिशन की दो स्टेज होती हैं। नीट की तैयारी की कोचिंग और उत्तीर्ण करने के बाद काउंसलिंग की प्रक्रिया में भाग लेना।
कैसे मिलते हैं संस्थान

याद रखें कि किसी भी व्यक्ति या कॉलेज के हाथ में किसी भी एमबीबीएस सीट पर दाखिला देने का अधिकार नहीं होता है। सभी मेडिकल कॉलेजों की सीटों का आवंटन दो स्तर पर होता है। एक केंद्रीय स्तर पर एमसीसी द्वारा होता है, जिसमें सभी आईएनआई और डीम्ड मेडिकल यूनिवर्सिटी की सभी सीटों और साथ ही देश के सभी गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेजों की 15% सीटों के लिए (जिसे एआईक्यू या ऑल इंडिया कोटा सीट भी कहा जाता है) आबंटन होता है। ये काउंसलिंग 'बिना किसी डोमिसाइल की शर्त के नीट उत्तीर्ण किए हर बच्चे के लिए उपलब्ध होती है।
दूसरे स्तर की काउंसलिंग राज्यों के डायरेक्टर जनरल ऑफ मेडिकल एजुकेशन द्वारा आयोजित की जाती है। जिसमें उस राज्य में स्थित प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सभी सीटों और गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेजों को 85% स्टेट कोटा सीटों के लिए आबंटन किया जाता है। इस काउंसलिंग में भाग लेने के लिए आवेदक को नीट की उत्तीर्णता के साथ-साथ डोमिसाइल संबंधित शर्तों का पालन आवश्यक होता है। राज्य स्तर की काउंसलिंग में किसी भी गवर्नमेंट सीट के लिए उस राज्य का डोमिसाइल होना जरूरी है, परंतु कुछ राज्य कुछ शर्तों के साथ अपनी प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की सीटों के लिए दूसरे राज्यों के आवेदकों को भी अवसर देते हैं।
इयर ड्रॉप क्यों और कब चुनें
बहुत से छात्र कोचिंग टीचर्स या ऑनलाइन सलाहों से प्रभावित हो कर मेडिकल की पढ़ाई के लिए सरकारी संस्थान में प्रवेश को अंतिम लक्ष्य बना लेते हैं। वित्तीय सामर्थ्य होने के बावजूद इस जिद में साल ड्रॉप करते हैं। यह सही सोच नहीं है। हमारे देश में बहुत से प्राइवेट और डीम्ड मेडिकल कालेज बहुत से गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेजों से ज्यादा अच्छे हैं। सिर्फ निजी या डीम्ड यूनिवर्सिटी के आधार पर वहां की पढ़ाई और प्रैक्टिस को नौ आंके।
जिनके पहले प्रयास में 400 से ज्यादा अंक आते हैं, अगर उनकी वित्तीय स्थिति निजी और डीम्ड मेडिकल कॉलेजों की फीस के अनुकूल नहीं है तो वे अगली बार गवर्नमेंट मेडिकल कालेज में दाखिले की कोशिश कर सकते हैं। परंतु पहली बार में 400 से कम, नंबर आने की स्थिति में माता-पिता को चाहिए कि वे निजी या डीम्ड मेडिकल कालेज में दाखिला दिलवाएं।
अगर वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं है तो एमबीबीएस की पढ़ाई किसी भी बैंक से लोन लेकर भी कर सकते हैं। सरकार ने एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए खास प्रावधान बनाए हैं, जिसके तहत छात्र को बहुत सरल शतों पर आसानी से लोन मिल जाता है।
इयर ड्रॉप का फायदा कब नहीं
एक बात और समझ लें कि नीट में दो कोशिशों के बाद भी अगर गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में दाखिले लायक रैंक नहीं पा रहे हैं, तो आगे और साल ड्रॉप करने का बहुत फायदा नहीं मिलता है।
वैसे भी हाल ही में नेशनल मेडिकल कमीशन ने नीट के आयोजन से संबंधित कुछ बदलावों की पेशकश की है, जिसमें नीट की योग्यता को+2 के दो साल बाद तक ही सीमित कर देने का प्रस्ताव रखा है। अगर आपने 2021 से पहले 2 की परीक्षा पास की है तो इस तथ्य को ध्यान में रख कर अगले साल नीट में कोशिश करने का निर्णय करना चाहिए।
कितना होता है खर्च
अगर हम एमबीबीएस में दाखिले की बात करें तो इस साल हमारे देश में 4 तरह के 690 मेडिकल कॉलेजों में कुल 1,08,000 के करीव एमबीबीएस की सीटें हैं। ये 4 तरह के मेडिकल कॉलेज आईएनआई (जैसे एम्स, बीएचयू, जेआईपीएमईआर, एएफएमसी) गवर्नमेंट, प्राइवेट मेडिकल कालेज और डीम्ड मेडिकल यूनिवर्सिटी होती है।
जहां आईएनआई और गवर्नमेंट सेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए सालाना 2 लाख रुपए से भी कम फीस देनी होती है, वहीं प्राइवेट और डीम्ड मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की पढ़ाई का खर्च सालाना 6.5 लाख से शुरू हो कर 28 लाख रुपए तक जाता है।
काउंसलिंग के दौर के लिए इन बातों को समझें
नीट स्कोर, डोमिसाइल, कैटेगरी और फीस बजट के हिसाब से एमबीबीएस में ऐंडमिशन की संभावना का सटीक आकलन करें। इसके लिए कुछ अच्छी वेबसाइट (जैसे नीट नेविगेटर, कैरियर 360 इत्यादि) हैं।
दाखिले के आकलन के बाद ये समड़ों कि आप में किस-किस मेडिकल काउंसलिंग में हिस्सा लेने की पात्रता है और उनमें से किस- किस में हिस्सा लेना चाहिए। जिस काउंसलिंग में भाग लेना है, उसके प्रॉस्पेक्टस को अच्छे से पढ़ना और समझना चाहिए।
संभावित कॉलेजों में से अपनी चॉइस लिस्ट बनाएं। इसके लिए कॉलेज की एकेडेमिक गुणवत्ता, क्लिनिकल व्यावहारिक प्रशिक्षण, कॉलेज का इन्फ्रास्ट्रक्चर, फीस, आसान पहुंच, संस्कृति जैसे विषयों पर जानकारी ले कर ही लिस्ट तैयार करनी चाहिए।
प्रवेश के लिए सभी आवश्यक डॉक्यूमेंट्स की जानकारी काउंसलिंग के प्रॉस्पेक्टस में होती है। अभिभावकों को काउंसलिंग की फीस देने के लिए ऑनलाइन पेमेंट सर्विसेज को एक्टिवेट करवा लेना चाहिए।
आवश्यक है कि ये सारी प्रक्रिया छात्र अपने माता-पिता या किसी बड़े की सलाह और मार्गदर्शन में पूरा करें।
इस दौर के लिए मेडिकल ऐंडमिशन काउंसलर सहायक होगा। लेकिन, विश्वास योग्य एक्सपर्ट को ही संपर्क करें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
