अनुष्ठान और विज्ञान      Publish Date : 07/11/2026

                  अनुष्ठान और विज्ञान

                                                                                                                प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

आधुनिक वैज्ञानिक युग में यज्ञ व हवन आदि वैदिक अनुष्ठानों को अंधविश्वास कहकर उनका उपहास उड़ाने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। दरअसल ऐसे लोगों को यज्ञ-हवन आदि कर्मकांडों के वैज्ञानिक स्वरूप की रंच मात्र भी जानकारी नहीं है। यदि जानकारी होती तो वे इन कर्मकांडों के संदर्भ में अपनी अज्ञानता का ढिंढोरा न पीटते। यज्ञ-हवन के कर्म कांडों को विज्ञान की कसौटी पर कसने के लिए पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने कई तरह के प्रयोग किए हैं।

इन वैज्ञानिक प्रयोगों के नतीजों से यह बात स्पष्ट तौर पर सामने आई है कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने ईस्वी सन् के हजारों साल पहले जिस ज्ञान का खुलासा किया था, वह कितना वैज्ञानिक था। उदाहरणस्वरूप फ्रांस के वैज्ञानिक त्रिले ने यज्ञ-हवन क्रियाओं के संदर्भ में जो अनुसंधान किए हैं, वे नासमझों की आंख खोलने वाले हैं। त्रिले के अनुसार यज्ञ-हवन में जो काष्ठ या लकड़ी जलायी जाती है, उससे फॉर्मिक आल्डिहाइड नामक एक गैस उत्पन्न होती है। त्रिले के अनुसार यह गैस जीवाणुओं को नष्टकर वातावरण-पर्यावरण को स्वच्छ रखने में पूर्णतः समर्थ है।

                            

भारत के अतिरिक्त चीन, जापान, जर्मनी और यूनान आदि देशों में अग्नि को पवित्र माना जाता है। इन देशों में विभिन्न प्रकार की धूप जलाने का चलन है। वस्तुतः अग्नि में जो वस्तु चलाई जाती है, उसका स्वरूप सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता है। आधुनिक परमाणु वैज्ञानिकों ने अब इस तथ्य को पूर्णतः आत्मसात कर लिया है कि स्थूल से सूक्ष्म कहीं अधिक शक्तिशाली है।

अग्नि में किसी पदार्थ के जलने पर उसके स्वरूप में काफी हद तक गुणात्मक परिवर्तन हो जाता है। जैसे अगर कोई व्यक्ति स्थूल रूप में किसी किसी जहर को खा ले तो वह शीघ्र ही मर जाएगा। वहीं यदि उसी विष को अग्नि संस्कार के द्वारा सूक्ष्मतर बनाकर उसका उचित व सम्यक मात्रा में सेवन करें तो वही विष अपने इस रूप-स्वरूप में व्यक्ति को रोगमुक्त कर उसे स्वस्थ व बलशाली बना सकेगा। आयुर्वेद में सोना, चांदी, तांबा आदि धातुओं की भस्मों को कई रोगों के लिए कारगर दवा माना जाता है।

इन धातुओं को अपरिष्कृत दशा में कोई भी व्यक्ति नहीं खा सकता, किंतु इन धातुओं की भस्मों को एक निश्चित मात्रा में विधिपूर्वक सेवन किया जाए तो इनके सेवन से शरीर में शक्ति का संचार होता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।