
हिंदी का सपना मनी-मनी Publish Date : 19/10/2026
हिंदी का सपना मनी-मनी
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
जब से यह खबर सामने आई है कि हिंदी के कविकुल शिरोमणि और कवियों के कवि को ‘21 लाख’ रूपये मिला है, तभी से ‘मेरा मन डोले मेरा तन डोले’ और मेरे मन का मयूर नृत्य कर रहा है। इसके लिए अधिकांश लेखक बधाइयां दे रहे हैं, जबकि मैं स्वयं भी चार चार बार बधाईयां दे चुका हूं। सोचता हूं, जैसे उनके दिन फिरें हैं, वैसे ही सबके दिन भी फिरें। आज उन्हें 21 लाख मिले हैं, कल एक करोड़ मिले। कारण, वह हिंदी साहित्य के ‘पाइप पाइपर’ (चमत्कारी पुरुष) हैं। वह रास्ता दिखाते हैं, और अनके छोटे कवि के जैसे मूषक पीछे-पीछे दौड़े चले आते हैं।
वह हंसते हैं, हम जीते हैं। वह नवोनेही हैं, नवचारी हैं। हमेशा रचनात्मकता की कोई न कोई खोज करते ही रहते हैं। अवसर की जैसी सटीक पहचान उन्हें है, बड़े-बड़े अचूक अवसरवादियों को भी नहीं। अवसर आया, तो लपक लिए; अवसर आया, तो लौटा दिए। पहले लपककर नाम कमाया, फिर लौटाकर। हम जैसे फुकरों को जब कुछ मिला ही नहीं, तो क्या लौटाएं?
पहली बधाई दी, तो सोचा कि सर जी से धन्यवाद मिलेगा। जब नहीं मिला, तो दूसरी बधाई दी। तब भी धन्यवाद न आया, तो तीसरी ‘गुलदस्ता विद हाथ-जोड़ इमोजी’ भेजी। इसके बाद भी धन्यवाद न मिला, तो प्रशास्ति में टिप्पणी लिख भेजी। फिर भी कुछ न आया, तो अपने मन को समझाया- मन रे तू काहे ना धीर धरे? ऐसे अवसरों पर धन्यवाद देने की जरूरत ही किसे होती है। वह धन्यवाद दे कि बधाई देने के लिए शुक्रिया? ऐसे मौकों पर बड़े लोग दातार या डोज होते हैं।

अपनी हिंदी का मन तो ‘मनी’ में बसता है। इसलिए इस बार हिंदी में वह विचारात्मक सवाल उतने जोर से नहीं उठा, जैसे उठा करता था और विचारात्मक संघर्ष का कारण बन जाता था। इंस्टेंट आत्मामाउंट होने लगती थी कि इस पैसे का दाता कौन है? इतना पैसा कहां से आया? वह किसी कसाले का है या मामले का? किसी सोर्स का है कि टूलकिट का? पाप का है कि पुण्य का? मेहनत का है कि तोहमत का? इस पैसे का रंग क्या है? काला कि सफेद?
बहरहाल, ऐसे मार्मिक सवालों का जवाब मुझे महाभारत के वन पर्व के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में मिला- ‘धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्। महाजनो येन गतः स पन्थाः’, अर्थात धर्म का धर्म गुफा में निहित है। धर्म के मर्म में इधर-उधर भटकने से बेहतर है कि मनुष्य उसी मार्ग पर चले, जिस पर श्रेष्ठजन चलते हैं। आज के अनेकार्थी युग में इसका एक अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है कि इस कलियुग में असली अर्थ तत्व किसी महाजन की तिजोरी में निहित रहता है। उसके लिए इधर-उधर अटकने-भटकने की जगह है रे हिंदी लेखक, तू हमेशा सही, यानी ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ मार्ग पर चलाकर। उसी पर चलने में लाभ मिलेगा, लेकिन समय लग सकता है।
तुझे तेरा उचित अर्थ मिलेगा। यूं भी अपने जैसे गरीब स्थायित्व को उचित अर्थ मिलता भौतिकों से? हमने तो अपना भाव यूं ही गिरा रखा है। ऐसे में, कोई दाता हमें लिफ्ट क्यों दे? शहर में किसी ने अचानक हिंदी-साहित्य की सेवा के लिए बुला लिया, तो दौड़ लिए और एक गमला। सौ-पचास रुपये वाले अंगवस्त्र में अगोश हिंदी साहित्य की सेवा करके खुश हो लिए।
बचपन में ही हिंदी के साहित्यिक कीड़े के काटे किसी मोटे आसमानी ने दिल्ली से बाहर के शहर में अपने दादा/नाना/दादाजी/नानीजी की स्मृति में आयोजित साहित्य समारोह के लिए बुला लिया, तो टैक्सी किराया प्लस पांच-दस हजार तक का अर्थाभावड़ा इसी में गंवा देते गए, लेकिन लाख-दो लाख के दर्शन आज तक न हुए।
इसलिए, जब अपने कविकुल गुरु को 21 लाख मिलने की खबर आई, तो हम भी लाइन में लग लिए। सच कहें, हिंदी की गरीबी हटे, तो हिंदी बने। हिंदी का सपना ‘मनी-मनी’। अपना भी सपना मनी-मनी। सबका सपना मनी-मनी। अपना तो कुलगीत ही है- अपना सपना मनी-मनी और साहित्यगीत है- कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी, एक करोड़ की मंजिल सही!

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।