गुरू पूर्णिमा के अवसर पर विशेष      Publish Date : 30/07/2026

         गुरू पूर्णिमा के अवसर पर विशेष

                                                                                                                         प्रो0 आर. एस. सेंगर

गुरु पूर्णिमा केवल किसी व्यक्ति का सम्मान करने का ही पर्व नहीं, अपितु यह उस चेतना के प्रति कृतज्ञता है जो अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। भारतीय परंपरा में गुरु को इसलिए पूजनीय माना गया है क्योंकि वे केवल शिक्षा से ही साक्षात्कार नहीं कराते अपितु जीवन के उन मूल्यों की आधारशिला भी रखते हैं, जिन पर हमारा जीवन टिका होता है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया गया है। इसका आशय यही है कि सत्य या परम सत्ता तक पहुंचने का मार्ग गुरु की कृपा से ही खुलता है। गुरु, कोई व्यक्ति? यह संस्था से अधिक वह प्रकाश है जो हमारे भीतर सोई हुई चेतना को जगा दे।

                           

आज सूचना का युग है। नाना प्रकार का ज्ञान हमारी अंगुलियों पर बहुत सहजता से उपलब्ध है, किंतु इस क्रम में विवेक निरंतर दुर्लभ होता जा रहा है। आधुनिक संसाधनों से सूचनाएँ और जानकारी तो तत्काल मिल सकती हैं, परंतु वास्तविक समझ तो अनुभव से ही प्राप्त होता है और गुरु इसी अनुभव के धनी होते हैं। वस्तुतः, वे हमारे साथ अपना अनुभव भी साझा कर रहे होते हैं। इसी अनुभव के आधार पर जीवन को सही दिशा देने वाली दृष्टि गुरु से ही प्राप्त होती है। गुरु हमारे लिए उत्तर नहीं लिखते हैं। वे हमारे भीतर सही प्रश्न पूछने की चाह जगा देते हैं आदि। शंकराचार्य ने कहा था गुरु के बिना आत्मज्ञान दुर्लभ है। गुरु केवल संसार को देखने की दृष्टि नहीं बदलते हैं। वे स्वयं को देखने का साहस भी देते हैं। वे हमें यह सिखाते हैं कि सबसे बड़ी यात्रा बाहर की नहीं, अपने भीतर की है। इस गुरु पूर्णिमा पर यदि हम अपने गुरु के प्रति केवल पुष्प अर्पित करने के बजाय उनके एक उपदेश को जीवन में उतारने का संकल्प लें तो वही वास्तविक गुरुदक्षिणा होगी। अंततः गुरु वही है जो हमारे भीतर ऐसा दीप जला दे कि फिर जीवन में किसी भी प्रकार के अंधकार से कोई भय न रहे।

अंधेरे मोड़ पर प्रकाश है गुरु

                                

सीखने की प्रक्रिया जीवन भर निरंतर चलने वाली यात्रा है। ज्ञान का हर अनुभव चुनौती और नई जानकारी आपको बेहतर इंसान बनाती है और शायद यही प्रगति की सबसे बड़ी कुंजी है। गुरु गोविंद दो खड़े काके लागू पाए बलिहारी।गुरु आपने गोविंद दियो बताए।

इसके अलावा, यदि मन में सीखने की इच्छा हो तो हर व्यक्ति खुद का गुरु बन सकता है। किसी छोटे बच्चे से निष्कपटता, किसी बुजुर्ग से धैर्य, किसी किसान से मेहनत, किसी मजदूर से संघर्ष और किसी कलाकार से समर्पण सीखा जा सकता है। सीख केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन जीने के तरीके में छिपी होती है। वह कहते हैं ना, ज्ञान जहां से मिले उसे विनम्रता के साथ स्वीकार करना चाहिए। यही दृष्टिकोण व्यक्ति को आजीवन विद्यार्थी बनाए रखता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।