
भातृत्व भाव को बचाकर रखें Publish Date : 08/06/2026
भातृत्व भाव को बचाकर रखें
विभिन्न रामायणों में राम चरित्र का वर्णन किया गया है और राम किसी भी स्तर पर भातृत्व भाव का परिष्कार करना नहीं छोड़ते हैं। वह कहते हैं, 14 वर्ष बाद भी भरत राजा रहना चाहें, तब भी चलेगा। वह मेरा भाई है, राजा बनना चाहता है, तो ठीक है, कोई बात नहीं, दोनों एक ही हैं। जैसे मैं परिपालन करूंगा प्रजा का, भाई भरत मुझसे अच्छा ही करेंगे।
कई बार वार्ता में लोग कहते थे कि लक्ष्मण जी की ओर से भी कई बार यह बात आई, कि हो सकता है कि भरत को राज-मद हो गया हो। तो इस पर श्री रामचन्द्र जी ने स्पष्ट कहा, लक्ष्मण, राज-मद जिन्हें होता है, वे और लोग होते हैं । लेकिन भरत को कभी भी राज-मद नहीं हो सकता। भरत में विकृति तो आ ही नहीं सकती, क्योंकि वह समस्त विकृतियों से परे हैं। रामजी ने लक्ष्मण को समझाया। रामजी भरत के बारे में कहते हैं:-
“मसक फूंक मकु मेरु उड़ाई।
होई न नृपमदु भरतहि भाई।
लखन तुम्हार सपथ पितु आना।
सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना”।
अर्थात, मच्छर की फूंक से चाहे पहाड़ उड़ जाए, किंतु हे भाई, भरत को राज-मद नहीं हो सकता। हे लक्ष्मण, मैं तुम्हारी और पिता की सौगंध खाकर कहता हूं कि भरत के समान पवित्र और उत्तम भाई संसार में कोई दूसरा नहीं है”।

इसी प्रकार से एक और प्रसंग है, जब भरत जी अपने बड़े भाई को मनाने गए, तब गुरु वशिष्ठ जी ने भरत जी की खूब प्रशंसा की। इतनी बड़ाई श्री रामचरितमानस में किसी की नहीं हुई है, जितनी वशिष्ठ जी ने भरत की की है। वह कहते हैं कि जो भरत कहते हैं, उसे सुनिए और उस पर अमल कीजिए। भरत जो बोलते हैं, वह धर्म है। भरत जैसा आचरण करते हैं, वह धर्म है। धर्म के मानक पुरुष हैं भरत।
यह सुनकर रामजी बहुत खुश हुए। अयोध्या कांड के चित्रकूट के प्रसंग में रामजी ने कहा कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि मेरे भाई के लिए संसार के सबसे बड़े ज्ञान शिरोमणि, इतने बड़े तपस्वी और इतने बड़े ऋषि, इतने बड़े संयमी, जिनका कोई जोड़ नहीं है, वह भरत की इतनी अनुशंसा कर रहे हैं, मेरा जीवन धन्य हुआ, मुझे गौरव है भारत का भाई होने का।
इसके विपरीत आज देखिए, आज कैसा समय है? अगर मंच पर कोई बड़े नेता के सामने छोटे नेता की ऐसी प्रशंसा कर दे, तो पार्टी उस छोटे नेता को निकाल बाहर करेगी। दूसरे की प्रशंसा सुनकर लोगों को जलन होने लगती है। सहिष्णुता समाप्त हो गई है। भाई को भिन्न समझने लगे हैं आज के लोग।

ऐसे समय में मैं सभी लोगों को आगाह करना चाहता हूं कि आज भातृत्व के भाव को अधिक गरिमा देने की आवश्यकता है। भातृत्व को सुन्दर बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि जिस भातृत्व के बिना हमारा कोई व्यवहार नहीं चलता, कोई बड़प्पन नहीं चलता, विकास का भी कोई मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता, उस भातृत्व को किसी भी स्तर पर हमें बिगड़ने नहीं देना चाहिए और इसको बचाने के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए।
