
हरित पहलों से ग्रामीण समृद्धि Publish Date : 27/05/2026
हरित पहलों से ग्रामीण समृद्धि
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
केंद्रीय बजट 2026-27 भारत की वित्तीय नीति को हरित और सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ाने का स्पष्ट संकेत देता है। यह बजट पर्यावरणीय स्थिरता, सर्कुलर इकॉनॉमी और ग्रामीण सशक्तीकरण को एक साथ जोड़ता है। प्रस्तावित निधियों और संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से निपटने, ग्रामीण आजीविका को मज़बूत करने और निम्न कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को गति देने पर विशेष बल दिया गया है। जीएसटी सुधार, हरित ऊर्जा प्रोत्साहन, कार्बन कैप्चर तकनीक और महत्त्वपूर्ण खनिजों में निवेश जैसे उपाय इस परिवर्तन को आधार प्रदान करते हैं। यह दृष्टिकोण विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।भारत की विकास यात्रा अब एक निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है जहाँ आर्थिक प्रगति को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ संतुलित करना अनिवार्य हो गया है। केंद्रीय बजट 2026-27 इस परिवर्तन को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करता है।
इसमें ग्रामीण भारत को हरित परिवर्तन के केंद्र में रखा गया है, यह स्वीकार करते हुए कि गाँव केवल जलवायु कार्रवाई के लाभार्थी नहीं बल्कि सतत भविष्य के सक्रिय भागीदार हैं।ग्लासगो में आयोजित COP26 जलवायु सम्मेलन में भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारितकिया। यह मात्र औपचारिक घोषणा नहीं थी बल्कि उत्पादन, उपभोग, परिवहन और संसाधन प्रबंधन की संपूर्ण व्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव की माँग थी। बजट 2026-27 इस संकल्प को वित्तीय उपायों, लक्षित सब्सिडी, कर सुधारों और रणनीतिक निवेशों के माध्यम से आगे बढ़ाता है। इन कदमों का उद्देश्य आर्थिक प्रोत्साहनों को पर्यावरणीय परिणामों के साथ जोड़ना है। दुर्लभ खनिजों के जिम्मेदार दोहन और पुनर्चक्रण पर जोर देकर सर्कुलर इकॉनॉमी को भी मजबूती दी गई है।

कृषि क्षेत्र को अधिक समावेशी और सशक्त बनाने के लिए एआई आधारित मंचों जैसे 'इंडिया एक्सटेंशन' की शुरुआत तथा जलवायु-सहिष्णु बीजों के विकास हेतु मिशनों को लागू करने का प्रावधान किया गया है। साथ ही, अंतर्देशीय जलमार्गों के विकास से ग्रामीण क्षेत्रों को बहु-माध्यमीय संपर्क का लाभ मिलेगा, जिससे परिवहन लागत कम होगी और बाजार तक पहुँच आसान होगी। ग्रामीण भारत आज एक जटिल मोड़ पर खड़ा है। अनियमित वर्षा, घटती मिट्टी की उर्वरता, जल संकट और बढ़ती लागत जैसी चुनौतियाँ छोटे और सीमांत किसानों को सबसे अधिक प्रभावित करती हैं। दूसरी ओर, गाँवों में नवीकरणीय ऊर्जा, बायोमॉस आधारित उद्योग, पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन, खनिज प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण उद्योगों की अपार संभावनाएँ भी मौजूद हैं। केंद्रीय बजट 2026 इस दोहरी वास्तविकता को स्वीकार करता है। यह केवल ग्रामीण समुदायों को जलवायु जोखिमों से सुरक्षित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें हरित विकास के प्रेरक केंद्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास भी करता है। इस दृष्टि से यह बजट पर्यावरणीय प्रतिबद्धता और आर्थिक सशक्तीकरण को एक साझा मार्ग पर आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण कदम है।
नवाचार, विविधीकरण और जलवायु लचीलापन
ग्रामीण आजीविका की आधारशिला आज भी कृषि ही है और बजट इसमें दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाता है। अखरोट, बादाम और पाइन नट जैसी उच्च घनत्व वाली फसलों की खेती को बढ़ावा दिया गया है। साथ ही, ग्रामीण युवाओं को प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और कृषि उद्यमिता से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इससे कच्चे उत्पादों को बाहर भेजने के बजाय गाँवों में ही उनका मूल्य संवर्धन संभव होगा। राज्यों के सहयोग से चंदन की खेती पारम्परिक पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने और दीर्घकालिक आय सृजन का माध्यम बनेगी। काजू और कोको के लिए लक्षित पहल 2030 तक आत्मनिर्भरता और निर्यात प्रतिस्पर्धा को सुदृढ़ करने की दिशा में कदम है। वहीं नारियल उत्पादकता बढ़ाने के लिए बागानों के नवीनीकरण और उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाने पर बल दिया गया है। जलवायु सहनशीलता को विशेष महत्व दिया गया है। अरहर, उड़द और मसूर जैसी दलहनी फसलों के लिए_जलवायु-सहिष्णु बीज विकसित करने हेतु छह वर्षीय मिशन खाद्य सुरक्षा को बदलते मौसम के अनुकूल बनाने का प्रयास है। मत्स्य पालन को सुदृढ़ करने के लिए 500 जलाशयों के एकीकृत विकास की योजना आय के स्रोतों में विविधता लाएगी और किसानों की एकल फसल पर निर्भरता कम करेगी।
डिजिटल हस्तक्षेप के रूप में 'Bharat-VISTAAR' एक बहुभाषी एआई आधारित सलाह मंच है, जो एग्रीस्टैक और आईसीएआर के ज्ञान तंत्र को एकीकृत करता है। यह मंच मौसम, मिट्टी की सेहत, सिंचाई, कीट प्रबंधन, बीज गुणवत्ता और सरकारी योजनाओं से संबंधित वास्तविक समय मार्गदर्शन प्रदान करेगा। ड्रिप सिंचाई, सौर पंप और खेतों पर सौर ऊर्जा प्रणालियों के साथ मिलकर यह व्यवस्था लागत घटाने, जल संरक्षण और लाभप्रदता बढ़ाने में सहायक होगी।बजट संरक्षण और आजीविका को भी आपस में जोड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बिग कैट गठबंधन की स्थापना और पहले वैश्विक बिग कैट सम्मेलन की मेजबानी जैव विविधता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। ओडिशा, कर्नाटक और केरल में 'टर्टल ट्रेल्स' तथा पुलिकट झील के आसपास बर्ड वॉचिंग सर्किट जैसे प्रयास पारिस्थितिकी पर्यटन को संरक्षण से जोड़ते हैं। इससे रोजगार सृजन के साथ संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा भी सुनिश्चित होगी।
वित्तीय और जीएसटी सुधार
सतत ग्रामीण विकास के लिए ऐसी वित्तीय संरचना आवश्यक है जो लचीलेपन को प्रोत्साहित करे। बजट 2026-27 सहकारी संस्थाओं और कृषि-आधारित उद्यमों को सशक्त बनाने हेतु लक्षित जीएसटी और वित्तीय सुधार प्रस्तुत करता है। कपास बीज और पशु आहार जैसे आवश्यक इनपुट उपलब्ध कराने वाले सहकारी सदस्यों को कर कटौती का लाभ देकर इनपुट सुरक्षा मजबूत की गई है। पशुपालन क्षेत्र के लिए क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी योजना संस्थागत वित्त तक पहुँच आसान बनाएगी। डेयरी और पशुधन गतिविधियाँ फसल विफलता की स्थिति में आय का महत्वपूर्ण सहारा है और सरल ऋण सुविधा आय के विविधीकरण को बल देगी। 'नारियल प्रोत्साहन योजना' तटीय और दक्षिणी राज्यों में बागानों के पुनरोद्धार के माध्यम से क्षेत्रीय कृषि अर्थव्यवस्था को मज्जबूत करेगी। उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में प्रयुक्त घटकों पर सीमा शुल्क छूट घरेलू मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देती है। यद्यपि यह औद्योगिक पहल है, पर इसके सहायक उद्योग और लॉजिस्टिक नेटवर्क अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर पैदा करेंगे।
स्वच्छ ऊर्जा और प्रौद्योगिकी
ग्रामीण परिवर्तन के लिए विश्वसनीय ऊर्जा अनिवार्य है। बजट 2026 में इलेक्ट्रॉनिक घटक निर्माण के लिए आवंटन ₹22,919 करोड़ से बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ किया गया है, जिससे घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन और आयात निर्भरता में कमी आएगी। सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के तहत 2026-27 में 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान कर इस क्षेत्र को नई गति दी गई है। अनुमान है कि 2030 तक यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के साथ तकनीकी आत्मनिर्भरता को मज्जबूत करेगा।पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम जैसी वित्तीय संस्थाओं को सशक्त बनाने की भी योजना है,ताकि ग्रामीण विद्युतीकरण और स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं के लिए समय पर वित्त उपलब्ध हो सके। सौर मिनी-ग्रिड और विकेंद्रीकृत नवीकरणीय प्रणालियों के साथ मिलकर ये पहलें गाँवों में विश्वसनीय बिजली, बेहतर डिजिटल संपर्क और ग्रामीण उद्यमों के नए अवसर सुनिश्चित करेंगी। इसके प्रभाव केवल बिजली उपलब्धता तक सीमित नहीं हैं। स्वच्छ ऊर्जा जीवाश्म ईंधनों से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम कम करती है, किसानों और सूक्ष्म उद्यमों की लागत घटाती है और गाँवों को भारत के ऊर्जा परिवर्तन का सक्रिय भागीदार बनाती है।
जिम्मेदार औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन की ओर
औद्योगिक क्षेत्र में उत्सर्जन घटाने के लिए पाँच वर्षों में ₹20,000 करोड़ कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (सीसीयूएस) के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस्पात, सीमेंट और रसायन जैसे उच्च-उत्सर्जन उद्योग इससे लाभान्वित होंगे। वातावरण में कार्बन-डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन से पहले उसे पुनः उपयोग या सुरक्षित भंडारण करने की यह तकनीक पर्यावरण संरक्षण और उत्पादन दक्षता दोनों को बढ़ावा देती है। हालाँकि इसे अक्सर भारी उद्योगों से जोड़ा जाता है, लेकिन इसका ग्रामीण आयाम भी महत्वपूर्ण है। खनिज-समृद्ध क्षेत्रों के आसपास प्रायः ग्रामीण आबादी रहती है। स्वच्छ प्रौद्योगिकियों के उपयोग से पर्यावरणीय जोखिम कम होंगे, साथ ही, स्थानीय-स्तर पर कौशल-आधारित रोजगार और तकनीकी हस्तांतरण के अवसर बढ़ेंगे।
जिम्मेदार खनन और रेयर अर्थ कॉरिडोर
नवीकरणीय ऊर्जा और विद्युत गतिशीलता की ओर बढ़ते कदमों के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आवश्यकता है। बजट 2026 में ओडिशा, केरल, आंध प्रदेश और तमिलनाडु में समर्पित रेयर अर्थ कॉरिडोर स्थापित करने का प्रस्ताव है। ये राज्य, खनिज संपदा और ग्रामीण आबादी, दोनों से समृद्ध हैं। खनिजों का प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण उत्खनन स्थलों के निकट करने से परिवहन लागत घटेगी, लंबी दूरी के परिवहन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान में कमी आएगी और स्थानीय रोजगार सृजित होंगे। छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्य भी बेहतर आपूर्ति नेटवर्क से लाभान्वित होंगे।महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण हेतु मशीनरी पर कर राहत घरेलू क्षमता निर्माण को प्रोत्साहित करेगी। यह रणनीति कच्चे माल के निर्यात से आगे बढ़कर मूल्य संवर्धन की दिशा में कदम है, जिससे ग्रामीण समुदाय वैश्विक स्वच्छ प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बन सकेंगे।
सर्कुलर इकॉनॉमी
केंद्रीय बजट 2026 भारत की सर्कुलर इकॉनॉमी की दिशा को और मजबूत करता है। लिथियम आयन बैटरी सेल उत्पादन हेतु मशीनरी पर सीमा शुल्क में निरंतर छूट ऊर्जाभंडारण उद्योग को प्रोत्साहित करती है। बैटरी पुनर्चक्रण से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में सूक्ष्म उद्यमों के लिए नए अवसर खुलते हैं। सौर ग्लास निर्माण में आवश्यक सोडियम एंटीमोनेट पर शुल्क छूट सौर आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करने में मददगार होगी। इसी प्रकार, महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण हेतु मशीनरी पर छूट घरेलू पुनर्चक्रण क्षमता को बढ़ावा देगी। सामूहिक रूप से ये उपाय आयात निर्भरता घटाते है, अपशिष्ट कम करते हैं और संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देते हैं। ग्रामीण भारत के लिए सर्कुलर इकॉनॉमी का अर्थ है-स्थिरता को आय सृजन के साथ जोड़ते हुए नए आजीविका स्रोतों का निर्माण।
हरित लॉजिस्टिक्स और जलमार्ग
परिवहन सुधार बजट के हरित एजेंडे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। अंतर्देशीय जलमार्ग स्वच्छ और किफायती परिवहन विकल्प प्रदान करते हैं। अगले पाँच वर्षों में 20 नए राष्ट्रीय जलमागाँ को चालू करने की योजना है, जिसकी शुरुआत राष्ट्रीय जलमार्ग-5 से होगी, जो खनिज-समृद्ध ग्रामीण क्षेत्रों को बंदरगाहों से जोड़ेगा। स्वच्छ लॉजिस्टिक्स न केवल उत्सर्जन कम करते हैं, बल्कि किसानों, खनिकों और ग्रामीण उद्यमों के लिए परिवहन लागत घटाकर बाजार तक पहुँच और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाते हैं।वर्तमान में लगभग 145 मिलियन टन माल प्रतिवर्ष अंतर्देशीय जलमार्गों से परिवहन हो रहा है, जो इस प्रणाली के बढ़ते उपयोग को दर्शाता है। वाराणसी और पटना में जहाज मरम्मत केंद्रों की स्थापना स्थानीय रोजगार सृजन और सहायक उद्योगों को मजबूती देगी। तटीय कार्गो प्रोत्साहन योजना का लक्ष्य 2047 तक जल-आधारित परिवहन की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करना है।
इससे यातायात भीड़ और प्रदूषण में कमी आएगी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, भारत के कुल कार्बन-डाइ-ऑक्साइड उत्सर्जन में परिवहन क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 12 प्रतिशत है। सूरत-दनकुनी जैसे समर्पित माल ढुलाई गलियारों का विस्तार विद्युत आधारित, कम-उत्सर्जन लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को प्रोत्साहित करेगा।
निष्कर्ष
केंद्रीय बजट 2026 यह स्पष्ट करता है कि ग्रामीण विकास और पर्यावरणीय स्थिरता परस्पर विरोधी नहीं बल्कि एक-दूसरे को सशक्त करने वाले लक्ष्य है। कृषि, ऊर्जा, उद्योग, जल संसाधन और महत्त्वपूर्ण खनिजों में हरित वित्तीय उपायों को एकीकृत कर एक अधिक लचीली और समावेशी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण संभव है। यह दृष्टिकोण विकास को प्रकृति के साथ संतुलित करते हुए ग्रामीण भारत को सतत प्रगति की दिशा में आगे बढ़ाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
