14 नवंबर बाल दिवस पर विशेष: नाचना और जी भर कर नाचना      Publish Date : 14/11/2025

   14 नवंबर बाल दिवस पर विशेष: नाचना और जी भर कर नाचना

                                                                                                                                                                               प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

अकादमिक बोझ थका देता है। किताबें, गृहकार्य, कक्षाकार्य, लक्ष्य, स्वाध्याय, कोचिंग ट्यूशन, और मां बाप अध्यापकों और समाज की अपेक्षाएं। थकान होती है, शारीरिक भी और मानसिक भी।

इस थकान से निपटने का उपाय परिवार और विद्यालय को मिलकर करना है। जैसे एक बहू को अपनी सास का दिन भर घर को ठीक रखने के लिए कोंचते रहना, अच्छा नहीं लगता; वैसे एक ही एक बच्चे को भी पढ़ने के लिए दिन भर कोंचते रहना थका देता है।

इसका एक शानदार उपाय है एक्स्ट्रा करिकुलर गतिविधियां। और मैने इन गतिविधियों में भी सबसे शानदार उपाय पाया है, अनियमित नृत्य को, जिसे मैने रैंडम डांस नाम दिया है।

एक सामान्य दिन जब बच्चे बोझिल मन से प्रातःकालीन सभा के लिए एकत्रित हो रहे हों, और आप सभा को सस्पेंड करके बॉलीवुड के गाने बजाने शुरू कर दो और थिरकने लागू, फिर बच्चों के चेहरे पर उत्साह देखते बनता है।

                                                              

मैं अपने विद्यालय में यह सालों से कर रहा हूं और सबसे दब्बू या सुस्त बच्चे पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखा है। जो बच्चे कभी नहीं बोलते वे भी थिरकते हैं अपने दोस्तों के साथ। कुछ बच्चे जमीन पर गिरकर नागिन डांस करते हैं।

पूरा माहौल खुशनुमा, बाँवला और ऊर्जित हो जाता है। निदेशक, अध्यापक भी बच्चों के बीच में थिरकते रहते हैं, उस दिन सब बच्चे बन जाते हैं और बच्चे सबको अपने पास पाते हैं।

हमारी जमीन पर तो हमारे भगवान भी विविध रूपों में नाचते हैं। भगवान कृष्ण और भगवान महादेव तो नर्तकों में शीर्ष पर हैं। हमारी माता काली तो समर में भी नृत्य करती हैं। समरे नाचे रे का ए रमणी।

सब नहीं नाच सकतें । जड़ नहीं नाच सकते। केवल चैतन्य ही नाच सकते हैं। इसलिए संगीत और नृत्य पर प्रतिबंध लगाने वाली सभ्यताएं और परंपराएं क्रूर और जड़ होती गईं।

नाचने के लिए हल्का होना पड़ता है और नाचने से हल्का हो जाता है इंसान। शरीर से भी और मन से भी। मन से भारी लोग नहीं नाच सकते और वे तो बिल्कुल नहीं जिन्होंने बहुत कुछ लबादा ओढ़ रखा है।

नाचने के लिए सारे लबादे नीचे उतार देने पड़ते हैं। इसलिए जितने लोकनृत्य और लोकगीत औरतों में रचे बसे हैं, उतने पुरुषों ने रचे भी नहीं हैं। यहां रचनात्मकता रचना के साथ एक हो जाने में है। पुरुषों ने पुरुषत्व ओढ़ लिया और नाचना बंद।

इसलिए मीराबाई के नाचने में सहजता है, समाज आनंदित है, श्रीकृष्ण भगवान आनंदित हैं, मीराबाई आनंदित हैं, केवल उनके परिवार को समस्या है क्योंकि उसे एक राजपरिवार की ओढ़ी हुई मर्यादा नृत्य के परों तले कुचले जाने का भय है।

चैतन्य महाप्रभु के नाचने में समग्र समाज हतप्रभ है। यह कैसा पुरुष जो हरे कृष्ण हरे कृष्ण कहकर नाच रहा है और उसे देखकर लोग तो रहे हैं और नाच रहे हैं! और तथाकथित पुरुषत्व का लबादा नीचे गिर जाता है। बचता है तो केवल श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और नृत्य।

सब कुछ भूल जाना ही नृत्य है और नृत्य सब कुछ भुला देता है। दो ही लोग जीनियस हो सकते हैं। एक वे जो सब कुछ याद रखते हैं; और दूसरे वे जो सब कुछ भूल जाते हैं। पहली श्रेणी में पागलपन की संभावना बहुत अधिक है।

इसीलिए हमारा आज का विश्व पागलों का समुदाय है। वह कुछ भूलना नहीं चाहता। सदियों पुरानी बात लेकर आपस में भिड़ा हुआ है, जहर उगल रहा है, लड़ रहा है, मार रहा है, वातावरण विषाक्त कर रहा है।

जबकि भूल जाने वाले लोगों को क्षमा करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ीं क्षमा करना उन्हें आता ही नहीं क्योंकि वे भूल जाते हैं इतनी बड़ी प्रकृति में इतनी छोटी सी गलती को कौन याद रखेगा! इसलिए वे भूल जाते हैं और गलती करने वाले को अपने क्षमा मिल जाती है।

सूफियों की परम्परा में तो नृत्य अभिन्न अंग है जीवन प्रणाली का। इसे 'समा' या 'चक्करदार दरवेश नृत्य' भी कहा जाता है। यह एक आध्यात्मिक और ध्यानपूर्ण नृत्य है।

इसमें नर्तक गोलाकार घूमते हैं, जो ईश्वर के प्रति समर्पण और आत्मा के अस्तित्व के सार की खोज का प्रतीक है। यह नृत्य पूर्ण ध्यान है जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत अहंकार को त्यागना और आध्यात्मिक परमानंद प्राप्त करना है।

इसलिए नाचिए। जब आप परेशान हैं नाचिए, बच्चों के साथ नाचिए, हंसिए, आनंदित होकर। जलालुद्दीन रूमी को नृत्य में अस्तित्व का सार मिला। यहां अहंकार को गलना पड़ता है। और अहंकार का गल जाना ही तो सब कुछ है।

                                                            

खुशियों का खजाना

वे प्यार भरे बचपन के दिन, वह गांव पुराना याद आया।

उस खिली सुनहरी धूप तले, डाली का दाना याद आया।।

महुआ, पीपल थे चौकीदार, तो नीम शुद्धता के साधन।

अरहर के खरहर से दुआरभर को, चमकाना याद आया।।

वह गांव नहीं घर था अपना, खलिहान खेत सब थे अपने।

पोरे पर बिना बिछोने के, वह नींद सुहाना याद आया।।

जब चढ़े पलानी पर अपने, लौकी नेनुआ के लालच में।

भुजिया चटनी संग लिट्टी ले, माई का बुलाना याद आया।।

उत्तम फल-सब्जी उगा-उगा, थोड़ा रख बेच दिया करते।

कीचड़ पानी में रेंग-रेंग, वह तालमखाना याद आया।।

दो चोटी वाली वह लड़की, फीते से बंधे फूल सुन्दर।

अल्हड़ सी खूब सांवली सी, उसपे बलखाना याद आया।।

सावन में भींग-भींग सोहनी, आलू उखाड़कर भून दिया।

ले नून लगा वह गरम-गरम, मुंह बाकर खाना याद आया।।

गहरी निद्रा में स्वप्न मधुर, तब जगा दिये थे पढ़ने को।

बैठा आधा कम्बल ओढ़े, वह झपकी आना याद आया।।

चूरा मूसल से कूट-कूट, भेली संग मुंह भर-भर खाना।

काका फूंके ‘होरहा’मन से, तब उन्हें मनाना याद आया।।

हां एक-एक से रिश्ते थे, किस घर से हूं था उन्हें पता।

छोटी से छोटी गलती पर, वह आंख चुराना याद आया।।

था व्यस्त गांव भर शादी में, बुआ की आई थी बरात।

ना हलवाई ना टंट-घंट, वह द्वार सजाना याद आया।।

हर एक काम हर रश्मों पर, थे गीत गवनई हो जाते।

वह दौड़-दौड़ वह पूछ-पूछ, वह पात खिलाना याद आया।।

उत्सव के अलग मजे होते, हफ्ते दस दिन सब रहते थे।

कुछ पाहुन फूफा लोगों का, वह गाल बजाना याद आया।।

अब लोग सिपारिस पर आते, अब होते खेल दिखावे के।

हम कैद हुए दीवारों में, खुशियों का खजाना याद आया।।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।