
सतत उत्पादन के लिए भारत की बेहतर कृषि पद्धतियाँ Publish Date : 02/11/2025
सतत उत्पादन के लिए भारत की बेहतर कृषि पद्धतियाँ
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
सतत उत्पादन के लिए बेहतर कृषि पद्धतियाँ: भारतीय कृषि के नित बदलते परिवेश में, बढ़ते तापमान, पर्यावरण प्रदूषण, मृदा ह्रास एवं बीमारियों के प्रकोप को कम करने के लिए उन्नत एवं स्वच्छ क्रियाओं को अपनाना बहुत आवश्यक है। कृषि उत्पादन के प्रत्येक पहलुओं जैसे खेत की तैयारी, खेत का चुनाव, बीज की उचित प्रजाति का चुनाव, खरपतवार नियंत्रण, पौध सरंक्षण, फसलोत्तर फसल प्रबंधन, फसल कटाई, आदि कृषि पद्धतियाँ अपने आप में काफी महत्वपूर्ण होती हैं।
सुथरी कृषि पद्धतियाँ
यह कृषि उत्पादन तथा उत्पादन के पश्चात की प्रक्रियाओं के सिद्धांतों का एक संग्रह है, जिसे हम सामाजिक, पर्यावरणीय, आर्थिक और स्थिरता आदि को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित एवं स्वच्छ कृषि उत्पाद प्राप्त कर सकते हैं।
सुथरी कृषि प्रणाली के मुख्य उद्देश्य
- सतत कृषि उत्पादन व उत्पादकता को बढ़ाना।
- प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर, टिकाऊ उपयोग करना।
- खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के अंतर्गत उत्पाद की गुणवत्ता एवं सुरक्षा का पूरा लाभ उठाना।
- खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के बदलाव से नई विपणन सुविधाओं का लाभ उठाना।
- कृषकों एवं निर्यातकों के लिए नई विपणन सुविधाओं का विकास करना।
- सामाजिक/आर्थिक मांगों की पूर्ति करना।
- चयनित कृषि क्रियाओं के लिए सुथरी कृषि पद्धतियाँ अपनाना।
मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ
मिट्टी के भौतिक एवं रसायनिक गुण, कार्बनिक तथा जैविक गतिविधियां कृषि उत्पादन को सतत बनाये रखने के लिए अति महत्वपूर्ण है। यह एक साथ मिलकर मृदा की उर्वरकता और उत्पादकता को निर्धारित करती हैं।
- मृदा की जैविक गतिविधियों को बढ़ाकर पौधों को उपलब्ध पानी एवं उर्वरकों के उपयोग की दक्षता में सुधार करना।
- मिट्टी के कटाव एवं पोषक तत्वों एवं कृषि रसायनों के निक्षालन से होने वाले नुकसान को कम करना।
- मिट्टी की नमी में वृद्धि करना।
- भू-परिष्करण क्रियाओं से बचाव करना।
- मृदा संरचना में सुधार के लिए मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा को बढ़ाना।
- उचित फसल चक्र, चारागाह प्रबंधन, समन्वित उर्वरक प्रबंधन यांत्रिक या सरंक्षित।
- जुताई क्रियाओं को अपनाते हुए मृदा में कार्बनिक पदार्थ को बनाये रखना और उनमें अपेक्षित सुधार करना।
- वायु/जल के माध्यम से मिट्टी के कटाव को कम करना।
- कार्बनिक एवं अकार्बनिक उर्वरकों, अन्य कृषि रसायनों का उचित मात्रा में उचित समय पर व उपयुक्त विधि से उपयोग करना, जिससे मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य को किसी भी प्रकार से कोई नुकसान न पहँचें।
जल प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ
गुणात्मक तथा मात्रात्मक दृष्टि से जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए कृषि क्षेत्र की अहम जिम्मेदारी है। कृषि कार्य में कुशल सिंचाई प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन निक्षालन तथा लवणता से होने वाली हानियों को कम करना आवश्यक है।
- सतही और मृदा जल का उचित प्रबंधन करना।
- नमी संरक्षण क्रियाएं अपनाना।
- मृदा में जल धारण की क्षमता बढ़ाना।
- फसल के हिसाब से उचित सिंचाई पद्धतियों का चयन करना एवं समयबद्ध क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करना।
- अत्यधिक निकासी या संचय को रोकने के लिए जल स्तर का उचित प्रबंधन करना।
- मृदा जैविक पदार्थों की स्थाई परत को बनाये रखते हुए जल की कार्य-शीलता में वृद्धि करना।
- पानी की बचत के उपायों जैसे खेत तलाई, जल हौद, डिग्गी, फव्वारा, मिनी स्प्रिंकलर, माइक्रो स्प्रिंकलर रेनगन एवं बूंद-बूंद आदि सिंचाई पद्धतियों को अपनी आवश्यकता के अनुसार अपनाना।
- पशुओं के लिए पर्याप्त, सुरक्षित व स्वच्छ पानी की व्यवस्था करना।
उत्कर्ष फसल उत्पादन प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ

फसल उत्पादन में वार्षिक और बारहमासी फसलों एवं किस्मों का चयन स्थानीय उपभोक्ता एवं बाजार की जरूरतों के अनुसार किया जाना चाहिए।
उपयुक्त फसल व फसल किस्म का चयन क्षेत्र की जलवायु एवं स्थानीय परीस्थितियों के आधार पर ही करें।
- समय पर बुवाई करना, जिससे अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सके।
- प्रमाणित उन्नत बीज की बवुाई को ही प्राथमिकता प्रदान करना।
- बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिए बीजोपचार अवश्य करें।
- उचित बीज दर रखें, कतार में बुवाई करें तथा कतार से कतार व पौध की समुचित दूरी बनाकर रखें।
- जुताई, बुवाई ढलान के विपरीत करें, जिससे की वर्षा का ज्यादा पानी जमीन में अंदर जाए।
- उचित फसल चक्र अपनाएं, इससे कीट-रोग आदि के प्रकोप में कमी आती है। फसल चक्र में दलहनी फसलों को अवश्य ही शामिल करें।
- मिश्रित फसलों की बुवाई करें।
- तिलहनी/दलहनी फसलों में जिप्सम का उपयोग अवश्य करें।
- सिफारिश के अनुसार अगेती, पछेती फसल व किस्मों का चयन करें ताकि विषम परिस्थितियों में भी आमदनी कम न हो़ सके।
- गर्मी में गहरी जुताई करें तथा खरपतवार, रोग व कीट के प्रकोप में कमी करें।
- जैविक खेती अपनाएं और यथासम्भव रसायनिक उर्वरक का उपयोग करने से बचें।
पौध संरक्षण कृषि पद्धतियाँ
फसलीय खेती में उत्पादन और गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए फसल के स्वास्थ्य को बनाये रखना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए समन्वित कीट व्याधि प्रबंधन के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए रोग एवं कीट प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करना, उचित फसल चक्र अपनाना, ट्रेप फसल उगाना तथा कृषि रसायनिक विधि से खरपतवार, कीट एवं व्याधि का नियंत्रण करना आवश्यक है। इनका प्रयोग पर्यावरण एवं मनुष्य पर इनसे होने वाले संभावित नकारात्मक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण ज्ञान एवं उपयुक्त विधियों से किया जाना जरूरी है।
- प्रतिरोधी किस्मों का चयन तथा चक्र एवं कृषिगत क्रियाओं से कीट बीमारियों से बचाव।
- जैविक विधि से रोग/कीट नियंत्रण करना।
- हानिकारक एवं लाभकारी कीटों के बीच उचित संतुलन को बनाये रखना।
- आवश्यकता के अनुसार न्याय संगत तथा सुरक्षित कीटनाशकों का छिडक़ाव करना।
- कीटों की संख्या अधिक होने पर ही कीटनाशी रसायनों का प्रयोग करना।
- किसी भी कीटनाशक का उपयोग दोबारा न करें फसल चक्र की तरह ही कीटनाशी चक्र का भी उपयोग करें।
- छिडक़ाव/भुरकाव सही उपकरण व नोजल आदि का उपयोग करना।
- कीट ग्रसित फसल अवशेष जैसे कपास के टिण्डे, बैंगन, टमाटर और मिर्च आदि के काणे फल, डंठल, टहनियों आदि को जला देना।
- परभक्षी चिडिय़ा, मैना, गौरेया और मोर आदि के बैठने हेतु स्टेंड बनाएं और इन्हे खेत में आकर्षित करने के लिए एक-दो दिन चुग्गा डालें।
- कीट एवं बीमारियों के बारे में पूर्वानुमान लगाना एवं प्रबंधन के लिए प्रभावी कार्य योजना बनाना।
- कृषि रसायनों का भंडारण एवं उपयोग निर्धारित मापदंडों के अनुसार ही करना।
- रसायनों के उपयोग का फसलवार सम्पूर्ण रिकॉर्ड रखना।
- मित्र कीटों को सरंक्षण प्रदान करना, प्रकाश-पाश एवं फेरोमोन-पाश आदि का उपयोग करना।
- समन्वित कीट प्रबंधन, समन्वित व्याधि प्रबंधन, समन्वित खरपतवार प्रबंधन को बढ़ावा देना।
- फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई अवश्य करना।
- फसल की आवशयकता के अनुरूप ही संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों एवं सिंचाई जल का उपयोग करना।
- खरपतवार हटाने के लिए समय-समय पर निराई गुड़ाई आदि कार्य करना।
- फसल पद्धति के साथ पशुपालन का समन्वय करना।
- सुरक्षा नियमों/सुरक्षा मानकों के अनुसार फसल उत्पादन में उपयोग होने वाली मशीनरी की स्थापना व संचालन करना।
कटाई एवं भंडारण कृषि पद्धतियाँ
- उत्पाद की गुणवत्ता कटाई एवं भण्डारण के लिए स्वीकार्य प्रोटोकॉल के क्रियान्वन पर निर्भर करता है।
- उत्पाद की कटाई कीटनाशी रसायनों के छिडक़ाव के बाद प्रतीक्षा अवधि को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए।
- गोदामों/घर में रखने से पहले अनाज को अच्छी तरह से साफ करना चाहिए।
- गोदाम/घर में अनाज को अच्छी तरह सुखाकर (नमी स्तर 8-10 प्रतिशत) व ठण्डा करके रखना।
- उत्पाद का भंडारण वैज्ञानिक तरीके से उचित स्थान, तापमान व नमी को ध्यान में रख कर ही करना चाहिए।
- अनाज की बोरियों को गोदाम/कमरे की दीवारों से दूर रखा जाना चाहिए।
- कमरे/गोदाम में लकड़ी के पट्टे/पॉलीथिन सहित पहले बिछाएं और बाद में इसके ऊपर अनाज को रखें।
- भंडारण में कीड़ों के प्रकोप की रोकथाम हेतु आवश्यक निरोधक उपाय अपनाएं।
- रसायनिक उपचार प्रशिक्षित विशेषज्ञ की उपस्थिति में ही करना चाहिए।
- चूहों जैसे कीटों की रोकथाम के लिए जिंक फास्फाइड या ब्रामोडियोलोन का उपयोग करना चाहिए।
इस प्रकार कृषक, कृषि उत्पादन में स्वच्छ क्रियाओ को अपनाकर सतत व अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकता हैं। इन क्रियाओं (कृषि पद्धतियाँ) को अपनाने से कृषि लागत में कमी आने के साथ-साथ का पर्यावरण संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य व मानव स्वास्थ्य में आशातीत सुधार परिलक्षित हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
