
अवसर के साथ चुनौती भी है एआई Publish Date : 24/10/2026
अवसर के साथ चुनौती भी है एआई
प्रो0 आर. एस. सेंगर एंव इं0 कार्तिकेय सिंह
भारत दुनिया में एआई क्षेत्र की तीसरी सबसे बड़ी ताकत बनने की तैयारी में है, पर वास्तव में यह बात तब बनेगी जब हमारी एआई कंपनियां भी अमेरिकी कंपनियों के समकक्ष खड़ी हो सकेंगी।
दिल्ली में संपन्न हुए एआई इंपैक्ट समिट ने जिस तरह दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, उससे इस सम्मेलन की महत्ता रेखांकित होती है। एआई पर अब तक हुए तीन वैश्विक सम्मेलनों की तुलना में इस सम्मेलन में जिस तरह एआई कंपनियों के दिग्गजों, शासनाध्यक्षों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के साथ अन्य लोगों की कहीं अधिक भागीदारी रही, उस लिहाज से भी यह सम्मेलन काफी उपयोगी सिद्ध हुआ है। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इस संबोधन से एआई तकनीक के उपयोग को लेकर एक नई दिशा देने की कोशिश की, कि एआई को मशीन से मानव केंद्रित बनाने के साथ उसे जवाबदेह, सुरक्षित, लोकतांत्रिक और एक समावेशी रूप भी देना होगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने एआई को लेकर भारत की प्राथमिकता रेखांकित करने के साथ ही विश्व समुदाय को एक विजन भी दिया, जिसे उन्होंने एमएनएआई यानी ‘मानव’ की संज्ञा दी। उन्होंने इसे परिभाषित करते हुए बताया कि एम यानी मारल एंड एथिकल, ए यानी एकाउंटेबल, एन यानी नेशनल सावरेनटी, ए अर्थात एक्सेसिबल एंड इंक्लूसिव और वी यानी वैलिड एंड लेजिटिमेट। इसका आशय है कि एआई नैतिक, जवाबदेह होने के साथ, जिसका डाटा उसके अधिकार को सुनिश्चित करने के साथ ही सबकी पहुंच में हो और वैध एवं प्रामाणिक भी हो।
चूंकि भारत एआई में भविष्य देख रहा है, इसलिए भारत सरकार एआई पर निवेश को प्रोत्साहित कर रही है और इस कोशिश में है कि दुनिया भर की एआई कंपनियां भारत के साथ मिलकर काम करें। इस एआई सम्मेलन ने स्पष्ट किया कि भारत की तकनीकी क्षमता से दिग्गज एआई कंपनियां प्रभावित हैं। उन्हें भारत अपने लिए एक बड़ा बाजार भी दिख रहा है और मानव संसाधनों का स्रोत भी।
अमेरिका के बाद चैट-जीपीटी के सबसे अधिक उपभोक्ता भारत में ही हैं और इसे छात्रों से लेकर उद्योग जगत के लोगों के द्वारा इस्तेमाल किय जा रहा हैं। भारत में चैट-जीपीटी के साथ अन्य एआई टूल के उपयोगकर्ता भी तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका एक कारण यह भी है कि सरकार भी एआई टूल्स के उपयोग को बढ़ावा दे रही है। सरकार की कोशिश यह है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग जगत के साथ शासन-प्रशासन और अन्य अनेक क्षेत्रों में भी एआई का उपयोग किया जाना चाहिए।
यह अच्छा है कि भारत एआई की महत्ता को समझ रहा है। इस बजट में घोषणा की गई है कि सरकार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सेवा क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा के लिए एक समिति गठन करेगी। इसके अलावा बजट में वित्त मंत्री ने ’भारत विस्तार’ नाम से एक नई पहल का एलान किया, जो किसानों के लिए एआई आधारित बहुभाषी सिस्टम होगा।
बजट से पहले पेश आर्थिक समीक्षा में भी एआई को एक आर्थिक रणनीति के रूप में देखा गया। यह स्पष्ट है कि जैसे इंटरनेट के उपयोग में भारत अग्रणी देशों में है, वैसे ही शीघ्र ही एआई के इस्तेमाल में भी आगे होगा, लेकिन यह ध्यान रहे कि अधिकांश एआई कंपनियां अमेरिकी हैं और वे भारत में वर्चस्व बढ़ा रही हैं। इस कारण यह सवाल उभर रहा है कि ये अमेरिकी कंपनियां भारतीय डाटा का उपयोग करके अपने एआई माड्यूल को सुदृढ़ करने के क्रम में अपने आर्थिक लाभ में भारत को हिस्सेदार बनाएंगी या नहीं और यदि बनाएंगी तो किस तरह?

क्या भारतीयों का डाटा भारत में रहेगा और वह उसके अधिकार क्षेत्र में होगा?
इस समय विश्व भर में जिस तेजी के साथ एआई कंपनियों में निवेश हो रहा है, वह तेजी देश के किसी अन्य सेक्टर में नहीं दिख रही। कुछ विशेषज्ञों की मानें तो एआई कंपनियां अपने एकाधिकार को बढ़ा रही हैं। इसी एकाधिकार के कारण उनके स्टाक बढ़ते जा रहे हैं और उनमें निवेश भी बढ़ रहा है। अमेरिकी कंपनियों की कुछ हद तक काट चीन की एआई कंपनियां कर रही हैं, पर अभी उनका वैसा दबदबा नहीं, जैसा गूगल, ओपनएआई, मेटा आदि कम्पनियों का है। फिलहाल एआई तकनीक के विकास में यूरोप के साथ विश्व के अन्य देश पीछे नजर आ रहे हैं। भारत एआई क्षेत्र की तीसरी सबसे बड़ी ताकत बनने की तैयारी कर रहा है, लेकिन बात तब बनेगी, जब भारतीय एआई कंपनियां अमेरिकी कंपनियों के समकक्ष खड़ी हो सकें। उन्हें अमेरिकी कंपनियों पर निर्भरता से बचना होगा और अपनी अलग पहचान बनानी होगी।
एआई सम्मेलन के दौरान जिस तरह एक निजी यूनिवर्सिटी ने चीनी एआई उपकरण को अपनी खोज बताकर पेश किया, उससे भारत असहज हुआ। भारत सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि एआई तकनीक के विकास के नाम पर विदेशी एआई टूल की नकल न होने पाए। हम विदेशी तकनीक और उपकरणों की नकल करके आगे नहीं बढ़ सकते। इसे उद्योग जगत को भी समझना होगा और शिक्षा संस्थानों को भी।
भारत में युवा एआई का उपयोग तो कर रहे हैं, लेकिन वे इससे अनजान से हैं कि यह तकनीक कैसे काम करती है? इसी तरह बहुत से लोग नहीं जानते कि इसके दुरुपयोग से कैसे बचा जा सकता है? अभी छात्रों को एआई के बारे में सही ज्ञान देने की भी कोई ठोस व्यवस्था नहीं बन सकी है। साफ है कि एआई के पठन-पाठन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। सरकार के साथ उद्योग जगत को इसके प्रति भी सावधान रहना होगा कि ऐसी स्थिति न आने पाए कि एआई आधारित नई नौकरियां सृजित होने के पहले परंपरागत नौकरियों पर कोई बड़ा संकट आ जाए।
एआई सम्मेलन में भारत ने एआई के दुरुपयोग को रोकने पर खासा जोर दिया, जिससे अन्य देशों ने सहमति जताई और इसका प्रमाण वह घोषणापत्र है, जिसमें 86 देशों ने हस्ताक्षर किए, लेकिन एआई का दुरुपयोग रोकने की अभी कोई ठोस व्यवस्था नहीं बन सकी है। अभी यह भी नहीं कहा जा सकता कि जिस घोषणा पत्र पर 86 देशों ने सहमति जताई, उस पर सही तरह अमल हो सकेगा।
जब यह स्पष्ट है कि देश में विभिन्न क्षेत्रों में एआई का उपयोग तेजी से बढ़ेगा, तब उसके नियमन के लिए कोई ठोस ढांचा बनाया जाना समय की मांग है। अच्छा हो कि ट्राई सरीखी कोई नियामक संस्था बने, जो एआई तकनीक के दुरुपयोग को रोकने में सक्षम हो। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो एआई के दुरुपयोग से समाज में विघटन पैदा करने, भ्रम फैलाने का काम हो सकता है। सरकार को एआई तकनीक के विकास और उसके उपयोग के मामले में सतत निगाह रखने और एआई तंत्र की लगातार समीक्षा करने के लिए भी तैयार रहना होगा।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।