
मोटे अनाजों की उपयोगिता Publish Date : 16/10/2026
मोटे अनाजों की उपयोगिता
प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 शालिनी गुप्ता एवं गरिमा शर्मा
मोटे अनाज विश्व की बहुत बड़ी आबादी के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत में भी पर्वतीय, शुष्क जनजातीय क्षेत्रों में आबादी का एक बड़ा हिस्सा खाद्य एवं पोषण सुरक्षा हेतु इन फसलों पर निर्भर रहता है। खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा एवं विभिन्न त्यौहारों एवं संस्कृति से जुड़े होने के कारण ये फसलें पर्वतीय क्षेत्रों में अमूल्य धरोहर के समान हैं, जिनका आने वाले पीढ़ियों के लिए संरक्षित करके रखना हमारा कर्तव्य है।
मोटे अनाज एक विशेष फसल समूह है जिसमें मंडुवा, मादिरा (सांवा / झंगोरा), चीना, कौणी, कोदों तथा कुटकी आदि फसलों का समावेश होता है। इन फसलों की खेती किसानों द्वारा असिंचित अवस्था में कम उपजाऊ भूमि में की जाती है। मोटे अनाजों में सूखा सहन करने की क्षमता अधिक होती है तथा रोग एवं कीटों की समस्या कम होती है, इसलिए विषम परिस्थितियों में भी ये फसलें कुछ न कुछ उपज देने में सक्षम होती है।
इन फसलों की महत्ता इससे भी समझी जा सकती है कि भारत सरकार के पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 2022 से अन्तर्राष्ट्रीय पोषक अनाज वर्ष के रूप में मनाया गया और मोटे अनाजों को भी 'अन्न' नाम दिया गया।

ये फसलें कठिन परिस्थितिकी में उगायी जाती हैं और ये पोषक तत्त्वों का सस्ता एवं सुलभ स्रोत हैं। वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में भी मोटे अनाजों में बदलते पर्यावरणीय वातावरण के अनुरूप अपने को ढालने की बहुत क्षमता है। इसके अतिरिक्त, इन फसलों से उच्च गुणवत्तायुक्त चारा मिलता है। पोषण की दृष्टि से भी इन फसलों की बढ़ती मांग एवं कीमत से किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
हरित क्रान्ति के उपरान्त इन फसलों के क्षेत्रफल में निरंतर गिरावट आयी है। इसके अलावा मिलेट्स को C-4 अनाज के रूप में वर्गीकृत किया गया है क्योंकि C-4 अनाज वातावरण से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं साथ ही कार्बन डाइऑक्साइड को चार कार्बन वाले यौगिकों में बदलकर केल्विन चक्र में प्रवेश करते हैं, जिससे इस प्रक्रिया में आसक्सालोएसिटेट नाम का चार कार्बन वाला यौगिक बनता है, कम पानी का उपयोग करते हैं और इनके लिए कम निवेश की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि ये अनाज पर्यावरण के लिए अनुकूल होते हैं, जिससे वे जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने और लचीले कृषि खाद्य प्रणालियों के निर्माण के लिए एक स्थायी रणनीति बनाते हैं।
छोटे दाने वाली धान्य फसलों को मोटा अनाज कहते हैं। ये छोटे बीज वाले अनाज हैं, जिनकी प्राचीन काल में खेती की जाती थी, परन्तु मध्य युग में ये फसलें लुप्त हो गई हैं। इन प्राचीन फसलों के लुप्त होने के मुख्य कारण हैं - मानव जाति की बदलती भोजन प्रणाली, जीवन शैली, प्राथमिकता, आदतें, स्वाद, पसंद, उदासीनता, घटती उत्पादकता, तकनीकों व जानकारी का अभाव आदि। वर्तमान में मोटे अनाजों की जगह पतले अनाजों ने ली है। मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहन देना चाहिए क्योंकि ये फसलें असिंचित क्षेत्रों, कम उपजाऊ भूमि तथा न्यूनतम सस्य क्रियाओं में भी औसत उत्पादन दे सकती हैं। भारत में मोटे अनाज मुख्यतः मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बिहार, उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश में उगाये जाते हैं।
इन राज्यों में देश के कुल मोटे अनाजों के उत्पादन का लगभग दो तिहाई भाग पैदा होता है। देश के उत्तरी भाग में इन फसलों का उत्पादन पश्चिमी एवं पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों में होता है, जिनमें जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य के क्षेत्र आते हैं। इन फसलों का विशेष महत्त्व है और ये अनाज ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के भोजन का प्रमुख स्रोत हैं। पोषक मान (न्यूट्रिटिव वैल्यू) की दृष्टि से भी कदन्न एक महत्त्वपूर्ण फसल समूह है। मंडुवा में कैल्शियम, धान एवं गेहूं की तुलना में क्रमशः 34 तथा 8 गुना अधिक पाया जाता है। इस प्रकार मादिरा में रेशा 9.8 ग्राम / 100 ग्राम दाना है जो धान, गेहूं से कई गुना अधिक है। मोटे अनाजों के प्रयोग से सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी व प्रोटीन ऊर्जा कुपोषण से बचा जा सकता है।
मोटे अनाज की विशेषताएं
मोटे अनाजों को अधिकांशतः खाद्यान्न के रूप में लिया जाता है। मोटे अनाज सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से भरपूर हैं और हमारे स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
मोटे अनाज, गेहूं व धान की तुलना में ज्यादा पौष्टिक होते हैं। अनुसंधानों से यह ज्ञात होता है कि मोटे अनाज ही हमारे स्वास्थ्य एवं सेहत के लिए उपयोगी हैं। इनसे प्राप्त होने वाले पोषक तत्त्वों का विवरण सारणी में दिया गया है :
सारणी : अनाजों से प्राप्त होने वाले पोषक तत्त्व (प्रतिशत में)
|
फसल |
प्रोटीन |
वसा |
खनिज |
रेशा |
कार्बोहाइड्रेट |
|
मंडुवा |
7.3 |
1.3 |
27. |
3.6 |
72.00 |
|
सांवा |
6.2 |
2.2 |
4.4 |
9.8 |
65.0 |
|
चीना |
12.5 |
3.1 |
1.9 |
7.2 |
70.4 |
|
कौणी |
12.3 |
4.3 |
3.3 |
8.0 |
60.9 |
|
गेहूं |
11.8 |
1.5 |
1.5 |
1.2 |
71.2 |
|
चावल |
6.8 |
0.5 |
0.6 |
0.2 |
78.2 |

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।