कृत्रिम-बुद्धिमत्ता: सहायक ही रहे, मालिक न बन जाए      Publish Date : 10/10/2026

कृत्रिम-बुद्धिमत्ता: सहायक ही रहे, मालिक न बन जाए

                                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय सिंह

मानवता के विकास के साथ ही मानव अपने जीवन को सरल तथा सुविधाजनक बनाने के लिए नए-नए आविष्कार करता रहा है। कभी मनुष्य ने ज्यादातर मशीनें इसलिए बनाई थीं कि उसका काम आसान हो जाए; वहीं अब वह ऐसी मशीनें बना रहा है जो यह तय करने की क्षमता हासिल कर रही हैं कि मनुष्य को क्या करना चाहिए। यही वह क्षण है जहाँ विज्ञान की सबसे चमकदार उपलब्धि मानव सभ्यता की सबसे असुविधाजनक चिंता बन जाती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई को लेकर उत्साह होना स्वाभाविक ही है। किसान के लिए मौसम और मिट्टी का विश्लेषण, फसल में रोग की पहचान, चिकित्सक के लिए हजारों रिपोर्टों में छिपे सटीक संकेत तलाशना, विद्यार्थियों के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध सर्वज्ञानी सहायक, भाषाओं की दीवार तोड़ना, आपदा प्रबंधन, अंतरिक्ष अनुसंधान और ऊर्जा दक्षता जैसे क्षेत्रों में एआई असाधारण उपयोगिता साबित कर रहा है।

दुनिया में कम से कम 70 करोड़ लोग अब हर सप्ताह प्रमुख एआई प्रणालियों का उपयोग करते हैं। अंतरराष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता सुरक्षा प्रतिवेदन-2026 के अनुसार सामान्य प्रयोजन कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित अर्थव्यवस्थाओं में साठ प्रतिशत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में लगभग चालीस प्रतिशत नौकरियों से जुड़े कार्यों को प्रभावित कर सकती है। अर्थात सवाल कृत्रिम बुद्धिमत्ता को रोकने का नहीं है। असली सवाल यह है कि हम उसे किस हद तक अधिकार देने जा रहे हैं? और क्या यह सुविधा धीरे-धीरे सत्ता में बदल सकती है?

हमारी मूल चिंता किसी काल्पनिक रोबोट सेना की नहीं है। खतरा उससे पहले शुरू हो चुका है। आज यह किसी व्यक्ति की आवाज की मात्र तीन सेकंड की रिकॉर्डिंग से उसकी आवाज की नकल तैयार कर सकता है।

भारत में ऐसी आवाज-आधारित धोखाधड़ी को लेकर चेतावनियाँ लगातार सामने आई हैं। चेहरा भी नकली हो सकता है, वीडियो भी और अब वह आवाज भी, जिसे कल तक हम पहचान का सबसे भरोसेमंद प्रमाण मानते थे। भारत सरकार ने 2026 में एआई-निर्मित डीपफेक यानी भ्रामक डिजिटल प्रतिरूप और सिंथेटिक कंटेंट यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा जनित सामग्री से निपटने के लिए नियम और अधिक कठोर किए हैं, जिनमें ऐसी सामग्री को स्पष्ट लेबलिंग, मूल स्रोत और उसके प्लेटफॉर्म की पहचान तथा समुचित जवाबदेही जैसे प्रावधान शामिल हैं।

                                 

जरा कल्पना कीजिए, आधी रात को फोन आता है, दूसरी ओर आपके बेटे की घबराई हुई आवाज है, ‘हॉस्पिटल में हूँ, तुरंत पैसे भेजिए।’ आवाज वही, लहजा वही, घबराहट वही। मगर बेटा वहां है ही नहीं। दूसरी तरफ एक मशीन है और उसके पीछे बैठा ठग। कल तक हम चेहरा देखकर पहचानते थे। फिर आवाज सुनकर पहचानने लगे। कल यदि स्मृतियाँ भी कृत्रिम रूप से निर्मित होने लगें तो मनुष्य भरोसा किस पर करेगा? संकट केवल धोखाधड़ी का भी नहीं है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास के वर्तमान में इसके अभिकर्ताओं को केवल प्रश्न का उत्तर देने के बजाय विशिष्ट लक्ष्य दिया जा सकता है और फिर ये इंटरनेट, दूसरे सॉफ्टवेयर तथा दूसरे कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अभिकर्ताओं से संवाद करते हुए स्वयं रास्ते खोज सकते हैं। 2026 की अंतरराष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता सुरक्षा प्रतिवेदन चेताती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अभिकर्ता-आधारित प्रणालियाँ बहुत जोखिमपूर्ण हैं, क्योंकि उनके काम के दौरान मनुष्य के हस्तक्षेप के अवसर बहुत कम हो जाते हैं।

परीक्षणों में यह भी सामने आया है कि कुछ प्रणालियाँ परीक्षण और वास्तविक वातावरण के बीच अंतर पहचान सकती हैं तथा मूल्यांकन की कमजोरियों का लाभ उठा सकती हैं। यानी अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि मशीन क्या कर सकती है, बल्कि यह भी है कि उसे क्या और किस सीमा तक करने की अनुमति दी जानी चाहिए। यह अंतर छोटा दिखाई देता है, लेकिन मानव सभ्यता की अस्तित्व-रक्षा के लिए यही बहुत बड़ा अंतर है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता सुरक्षा क्षेत्र के कुछ विशेषज्ञों ने अगले दशक में मानव अस्तित्व के लिए दो अंकों में जोखिम की संभावना व्यक्त की है।

उदाहरण के लिए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता सुरक्षा शोधकर्ता इयान ह्राविंगर ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से मानव सभ्यता की समाप्ति की संभावना के खतरे का आकलन दस प्रतिशत किया है। हालांकि यह व्यक्तिगत आकलन है, पर वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता के एक शीर्ष सुरक्षा विशेषज्ञ का आकलन है। इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता के गॉडफादर कहे जाने वाले जिओफ्री हिंटन (जीञ्णुर्निट ल्ह्राइङ्गल) ने भी लगभग दस प्रतिशत के जोखिम को असंगत नहीं माना है। इसे समझाने के लिए मैं यहाँ इसके मुकाबले जलवायु परिवर्तन से मानवता के पूर्ण विलुप्त होने की संभावना के कुछ आकलन, लगभग 1 प्रतिशत के आसपास, रहे हैं। ये 10% का खतरा कितना बड़ा है, इसे समझाने के लिए मैं मानवता पर मंडरा रहे एक और बड़े खतरे का उदाहरण देना चाहूँगा। वह खतरा है

जलवायु परिवर्तन अर्थात क्लाइमेट चेंज का। इस खतरे से आने वाले वर्षों में मानवता के समाप्त होने का खतरा एक प्रतिशत आंकलित किया गया है। इस तुलना से खतरे की गंभीरता को समझा जा सकता है। तो क्या हमें इस दस प्रतिशत के खतरे को सच मान लेना चाहिए? नहीं। या फिर इसे हँसकर टाल देना चाहिए? बिल्कुल नहीं।

एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े साइबर हमलों के वास्तविक प्रमाण बढ़े हैं। ये प्रणालियाँ सॉफ्टवेयर की कमजोरियाँ खोजने और दुर्भावनापूर्ण कोड लिखने में सक्षम हो रही हैं। एक साइबर प्रतियोगिता में एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता अभिकर्ता ने वास्तविक सॉफ्टवेयर में मौजूद 77 प्रतिशत कमजोरियाँ पहचान लीं। अभी पूर्ण स्वायत्त, शुरू से अंत तक चलने वाले साइबर हमलों का प्रमाण नहीं है, लेकिन हम उस दिशा में बढ़ती क्षमता को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। यदि कभी कोई काल्पनिक सुपरइंटेलिजेंस मानवता को समाप्त करने का निर्णय लेगी, तो उससे बहुत पहले ही वह हमारी अर्थव्यवस्था, सूचना, रोजगार, कला, शिक्षा और निर्णय क्षमता को बदलने की क्षमता हासिल कर लेगी। रोजगार पर खतरा सबसे बड़ा है और वास्तविक है। कारखाने की मशीनों के बाद वह अब दफ्तर की मेज तक पहुंच चुका है।

अनुवादक, लेखक, ग्राहक सेवा कर्मचारी, प्रारंभिक स्तर के प्रोग्रामर, दस्तावेज तैयार करने वाले कर्मचारी, यहां तक कि कानूनी और प्रशासनिक कार्यों के बड़े हिस्से इसके प्रभाव क्षेत्र में आ रहे हैं। वकील हो या जज, इनके दशकों का अनुभव तथा ज्ञान भी इसकी सटीक विश्लेषण और निर्णय क्षमता का लोहा मानता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।