
गन्ना अनुसंधान संस्थान शाहजहांपुर की उपब्धियाँ Publish Date : 04/10/2026
गन्ना अनुसंधान संस्थान शाहजहांपुर की उपब्धियाँ
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
गन्ना अनुसंधान केन्द्र शाहजहांपुर की अपनी एक बड़ी पहचान, उत्तर प्रदेश की इस गन्ना शोध परिषद ने किसानों को सदैव ही दी हैं नई उम्मीदें। दशकों की वैज्ञानिक साधना से खेतों तक पहुंची नई किस्में, लाल सड़न जैसे रोग से मुकाबले और गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
त्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के गन्ना उत्पादन और चीनी उद्योग को वैज्ञानिक आधार देने में शाहजहांपुर स्थित उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद (UPCSR) की हमेशा ही एक अति महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गन्ने की नई किस्मों का विकास, उनकी उपज और गुणवत्ता का मूल्यांकन, रोग प्रतिरोधक क्षमता पर अनुसंधान तथा किसानों के लिए उन्नत खेती की तकनीकों का प्रसार आदि इन सभी क्षेत्रों में गन्ना शोध संस्थानों का काम देश की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने से जुड़ा रहा है। शाहजहांपुर की यह शोध संस्था भी इसी उद्देश्य के साथ गन्ना किसानों की चुनौतियों के समाधान की दिशा में प्रारम्भ से ही काम कर रही है।
हाल ही में परिषद की विकसित गन्ना किस्म को.शा.23232 को पूरे उत्तर प्रदेश में खेती के लिए स्वीकृति मिलने से संस्था की वैज्ञानिक क्षमता एक बार फिर चर्चा में आई है। इसके साथ ही परिषद की को.शा.19235 और को.शा.18232 किस्मों को भी खेती के लिए मंजूरी मिली है। ये उपलब्धियां ऐसे समय में सामने आई हैं, जब गन्ना किसान बेहतर उत्पादन, गन्ने के रोगों से सुरक्षा, चीनी की अधिक रिकवरी और खेती की लागत को नियंत्रित करने जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इस बार गन्ना किस्म के विकास में तत्कालीन प्रभारी निदेशक व अपर गन्ना आयुक्त डा वी. के. शुक्ला तथा वर्तमान निदेशक आइएसएस अभिषेक आनंद का विशेष सहयोग रहा है।
गन्ना अनुसंधान का इतिहासः परंपरागत खेती से वैज्ञानिक कृषि तक

भारत में गन्ना केवल एक व्यावसायिक फसल ही नहीं है, बल्कि यह लाखों किसानों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार स्तम्भ भी है। उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल है। प्रदेश में चीनी मिलों का व्यापक नेटवर्क, गन्ना समितियों की व्यवस्था और बड़ी संख्या में गन्ना उत्पादक किसानों होने के कारण इस फसल का आर्थिक एवं सामाजिक महत्व विशेष बन जाता है।
परंपरागत खेती में गन्ने की उपज और गुणवत्ता काफी हद तक स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध बीज और किसान के अनुभव पर निर्भर करती थी। परन्तु आज समय के साथ वैज्ञानिक अनुसंधान ने इस तस्वीर को पूरी तरह से ही बदल दिया है। फसल की आनुवंशिक विशेषताओं, पकने की अवधि, रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता, गन्ने के वजन और उसमें मौजूद चीनी की मात्रा को ध्यान में रखकर नई किस्में विकसित करने पर जोर दिया गया।
इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अंतर्गत गन्ना अनुसंधान संस्थान किसानों के लिए ऐसी किस्में विकसित करने का प्रयास करते हैं, जो अलग-अलग कृषि जलवायु, मिट्टी और खेती की परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
शाहजहांपुर स्थित उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद इसी अनुसंधान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्ष 1912 में स्थापित इस संस्थान की उपलब्धियों को समझने के लिए उसके संस्थागत इतिहास के साथ-साथ विकसित लगभग 250 किस्मों के योगदान बडा प्रमाण है।
को.शा.23232: पुरानी लोकप्रिय किस्म के सापेक्ष एक नया विकल्प
गन्ने की किस्म को.0238, गन्ना किसानों के बीच लंबे समय तक एक लोकप्रिय किस्म रही है। हालांकि, किसी भी किस्म का लगातार व्यापक उपयोग होने पर उसके रोगों के प्रति व्यवहार, उत्पादन क्षमता और बदलती कृषि परिस्थितियों में प्रदर्शन आदि का मूल्यांकन करना भी जरूरी होता है। ऐसे में नई और उपयुक्त किस्मों का विकास किसानों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प उपलब्ध करा सकता है।
परिषद की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, नई अगेती किस्म को.शा.23232 की औसत पौधा गन्ना उपज 95.56 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। यह आंकड़ा मानक किस्म को.0238 की तुलना में 9.44 प्रतिशत अधिक बताया गया है।
गन्ने की किस्म को.शा.23232 के प्रमुख आंकड़े
- औसत पौधा उपजः 95.56 टन प्रति हेक्टेयर।
- मानक किस्म सीओ 0238 के सापेक्ष 9.44 प्रतिशत अधिक
दर्ज उपज का अंतरः
पेड़ी की औसत उपज - 80.57 टन प्रति हेक्टेयर।
पेड़ी उपज में बढ़त 3.16, सीओ 0238 के सापेक्ष।
परिषद के प्रसार अधिकारी डा संजीव पाठक तथा प्रजाति के प्रजनक डॉ0 अरविंद कुमार के अनुसार, को.शा.23232 में लाल सड़न रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता और अच्छी पेड़ी क्षमता उत्कृष्ट स्तर की है। इस कारण इसे किसानों के लिए सीओ 0238 के विकल्प व भविष्य की बेहतर प्रजाति माना गया है। हालांकि, खेतों में बड़े पैमाने पर इसके प्रदर्शन, बीज की उपलब्धता और क्षेत्रवार परिणामों के आधार पर ही इसकी व्यावहारिक उपयोगिता का आकलन अधिक स्पष्ट होगा।
दो अन्य किस्मों को भी मिली स्वीकृति
परिषद की उपलब्धि केवल को.शा.23232 तक सीमित नहीं है। को.शा.19235 और को.शा.18232 को भी खेती के लिए स्वीकृति मिली है। इन किस्मों के आंकड़े भी उपज के लिहाज से उल्लेखनीय बताए गए हैं।
को.शा.19235 की पेड़ी उपज 73.90 टन प्रति हेक्टेयर तथा को.शा.18232 की पेड़ी उपज 82.06 टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। इनकी पेड़ी उपज संबंधित मानक किस्म को.शा.767 से क्रमशः 11.36 और 23.70 प्रतिशत अधिक पाई गई है।
अलग-अलग पकने की अवधि वाली किस्मों का विकास किसानों को खेतों की योजना बनाने, फसल प्रबंधन और गन्ने की उपलब्धता को व्यवस्थित करने के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध करा सकता है।
लाल सड़न रोगः अनुसंधान के सामने बड़ी चुनौती
किसानों को लाल सड़न रोग यानी रेड राट के कारण सीओ 0238 गन्ना किस्म को छोडना पडा। दरअसल गन्ने का कैंसर कहा जाने वाला यह लाल सडन रोग गन्ने के महत्वपूर्ण रोगों में गिना जाता है। रोग के प्रकोप से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं। किसी लोकप्रिय किस्म में रोग का प्रसार होने पर किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
इसी वजह से रोग प्रतिरोधी या रोग के प्रति कम संवेदनशील किस्मों का विकास गन्ना अनुसंधान का अहम क्षेत्र है। नई किस्मों की रोग प्रतिरोधक क्षमता का वैज्ञानिक परीक्षण, रोग प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी और प्रमाणित बीज का उपयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं। परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ0 अरविंद कुमार ने सीओ 0238 की नर प्रजाति के साथ शाहजहांपुर की गन्ना किस्म के साथ संकरण कराया, इसके चमत्कारिक परिणाम सामने आए और को.शा.23232 नई किस्म प्राप्त हुई, जिसमें लाल सड़न रोग से लडने की प्रतिरोधक क्षमता भी पाई गई है। शोध प्रयोगशाला से किसान के खेत तक पहुंचना जरूरी
किसी नई किस्म को विकसित करना वैज्ञानिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन उसका लाभ तभी व्यापक तरीके से होता है जब किस्म का प्रमाणित बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो, किसानों को उसकी उपयुक्तता की जानकारी मिले और खेतों में उसका प्रदर्शन अनुकूल साबित हो।
इस प्रक्रिया में कई स्तर शामिल होते हैं:
किस्म का विकासः उपज, गुणवत्ता, पकने की अवधि और रोग प्रतिरोधक क्षमता को ध्यान में रखकर अनुसंधान किया जाता है।
वैज्ञानिक परीक्षणः अलग-अलग परिस्थितियों में फसल का मूल्यांकन और मानक किस्मों से तुलना की जाती है।
स्वीकृति और प्रसारः निर्धारित प्रक्रिया के बाद खेती के लिए किस्म की मंजूरी तथा बीज उत्पादन की व्यवस्था।
किसानों तक जानकारीः प्रशिक्षण, खेत प्रदर्शन और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के माध्यम से तकनीक का सही तरीके से प्रसार करना।
निरंतर निगरानीः किसानों के खेतों में उपज, रोगों और अन्य कृषि परिणामों का वास्तविक आकलन करना भी बहुत महत्वपर्ण होता है।
शाहजहांपुर की शोध परिषद के लिए भी इन सभी स्तरों पर मजबूत कार्य किसानों तक नई किस्मों का लाभ पहुंचाने में महत्वपूर्ण होगा।
चीनी उद्योग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी उपलब्धि
गन्ने की उत्पादकता में सुधार का प्रभाव केवल किसान की फसल तक सीमित नहीं रहती है। बेहतर उत्पादन और उपयुक्त गुणवत्ता से गन्ना आपूर्ति, चीनी मिलों की कार्यक्षमता और ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित आर्थिक गतिविधियों को भी लाभ मिल सकता है। हालांकि, किसानों की वास्तविक आय पर बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, परिवहन और अन्य लागतों का भी प्रभाव पड़ता है।
इसलिए किसी नई किस्म की सफलता का आकलन केवल प्रति हेक्टेयर उपज से नहीं, बल्कि चीनी की रिकवरी, रोग प्रबंधन, पेड़ी उत्पादन, लागत और किसानों को मिलने वाले आर्थिक लाभ के आधार पर भी किया जाना चाहिए।
शाहजहांपुर की वैज्ञानिक पहचान को आगे बढ़ाने का अवसर
को.शा.23232, को.शा.19235 और को.शा.18232 को खेती के लिए स्वीकृति मिलना परिषद के अनुसंधान कार्यों की चर्चा का महत्वपूर्ण अवसर है। नई किस्मों के परीक्षण परिणाम बताते हैं कि गन्ने की उत्पादकता और रोग प्रबंधन की दिशा में लगातार वैज्ञानिक प्रयास आवश्यक हैं।
आने वाले समय में इन किस्मों के बीज उत्पादन, किसानों तक उपलब्धता, विभिन्न क्षेत्रों में प्रदर्शन और चीनी रिकवरी के आंकड़े यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि इन्हें प्रदेश के गन्ना उत्पादन में कितनी व्यापक जगह मिलती है।
शाहजहांपुर की गन्ना शोध परिषद की वास्तविक सफलता इसी में होगी कि प्रयोगशाला और परीक्षण खेतों में विकसित वैज्ञानिक उपलब्धियां किसानों के खेतों तक पहुंचें, उत्पादन की चुनौतियां कम हों और गन्ना खेती अधिक टिकाऊ तथा लाभकारी बन सके।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।