देश में एवोकाडो की बढ़ी डिमांड      Publish Date : 25/09/2026

          देश में एवोकाडो की बढ़ी डिमांड

                                                                                                प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

  • कभी डिमांड फ्रूट रहे एवोकाडो की देश में बढ़ी मांग, आयात 15 हजार टन पहुंचा

  • किसान पारंपरिक फसलों के विकल्प के तौर पर अपना रहे खेती

कभी भारत में बहुत कम लोग एवोकाडो जानते थे, लेकिन पिछले दो वर्षों में एवोकाडो की मांग तेजी से बढ़ी है और एवोकाडो का आयात 15 हजार टन तक पहुंच गया है।

एवोकाडो की खेती मुख्य रूप से दक्षिण भारत में होती है, लेकिन अब किसान पारंपरिक फसलों के विकल्प के तौर पर इसकी खेती अपना रहे हैं। एक पेड़ से 15 से 20 किलो एवोकाडो मिलता है और 8 से 9 साल में पेड़ पूरी तरह से तैयार हो जाता है। एवोकाडो का बाजार तेजी से बढ़ रहा है।

पोषण से भरपूर फल

एवोकाडो में स्वस्थ वसा, फाइबर, पोटेशियम, विटामिन ई, के, सी, बी6 जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें मौजूद मोनोअनसैचुरेटेड फैट हृदय स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। इसमें मौजूद पोटेशियम ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। इसमें फाइबर भरपूर मात्रा में होता है जो पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद है और वजन नियंत्रित रखने में भी मदद करता है।

एवोकाडो के लिए बाजार का बड़ा अवसर है। एवोकाडो की खेती किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है। इसके लिए अधिक पानी की जरूरत नहीं होती।

मांग बढ़ी तो बदली खेती

देश के अलग-अलग हिस्सों में एवोकाडो की खेती का रकबा तेजी से बढ़ रहा है। एवोकाडो के पौधे की कीमत 150 से 200 रुपये के बीच है। एक हेक्टेयर में लगभग 400 पौधे लगाए जा सकते हैं। पौधे लगाने के 3 से 4 साल बाद फल आने लगते हैं। एक पेड़ लगभग 15 साल तक फल देता है। एक पेड़ से 100 से 150 फल तक मिल सकते हैं। एवोकाडो की खेती से किसानों को अच्छा मुनाफा हो रहा है। कंपनियां भी सीधे किसानों से एवोकाडो खरीद रही हैं। पिछले 2-3 वर्षों में एवोकाडो की मांग में 40 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है।

देसी के मुकाबले विदेशी किस्मों की मांग

पुणे के एवोकाडो उत्पादक बताते हैं कि विदेशी किस्मों की मांग देसी किस्मों से ज्यादा है। भारतीय बाजार में हस एवोकाडो की मांग सबसे ज्यादा है। इसकी कीमत भी अधिक मिलती है। एवोकाडो की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी की जरूरत होती है। भारत में इसकी खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं। पहाड़ी इलाकों में इसकी खेती अधिक सफल मानी जाती है।

आम नहीं तो एवोकाडो सही : किसानों पर जलवायु परिवर्तन का असर

पिछले कुछ वर्षों में आम की पैदावार पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़ा है। ऐसे में किसानों ने एवोकाडो को एक विकल्प के रूप में देखा है। एवोकाडो की खेती में आम की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है। साथ ही इसमें कीटों का प्रकोप भी कम होता है। एवोकाडो की खेती से किसानों को आम की तुलना में अधिक मुनाफा हो रहा है। कुछ राज्यों में सरकार भी एवोकाडो की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को सब्सिडी दे रही है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।