गौमाता का वैज्ञानिक महत्व      Publish Date : 02/08/2026

          गौमाता का वैज्ञानिक महत्व

                                                                                                                    प्रो0 आर. एस. सेंगर

कृषि के समस्त कार्यों में भारतीय नस्ल के गौवंश के बैलों का विशेष महत्व है। भूमि की जुताई व बीज की कटाई व अन्न प्राप्त करने तक की सारी कर्षण क्रियायें बैलों के द्वारा ही की जाती है जो वर्तमान में यंत्रों की अपेक्षाकृत अधिक लाभप्रद है। गौवंश के गोबर व मूत्र से बनी खाद सर्वोत्तम, गुणकारी तथा मिट्टी की अधिक उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाली मानी गई है। जिसके प्रयोग से अन्न, दलहन, तिलहन फसलों के साथ फल एवं सब्जियों का अधिक उत्पादन होता है जो अधिक गुणकारी व पौष्टिक होता है तथा बाजार मूल्य अधिक प्राप्त होता है। गोमूत्र व गोबर वैज्ञानिक दृष्टि से भी अधिक पवित्र एवं स्वचछंदता प्रदान करने वाला प्रमाणित हुआ है। गौ माता का वैज्ञानिक रूप से मानव स्वास्थ्य के लिए तथा पर्यावरण विकास के लिए काफी महत्व है जो निम्नलिखित लाभप्रद तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है।

                                

1. गाय के दूध में रेडियो विकिरण से रक्षा करने की सर्वाधिक शक्ति होती है। जिन घरों में गाय के गोबर से लिपाई-पुताई होती है वे घर रेडियो विकिरणों से सुरक्षित रहते हैं।

2. गाय का दूध हृदय रोग से रक्षा करता है एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाता है। शरीर में स्फूर्ति व चुस्ती लाता है।

3. क्षय रोगियों को गाय के बाड़े में या गौशाला में रखने और गोमूत्र की गंध से क्षय रोग के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही गोबर में हेजे के कीटाणुओं को नष्ट करने की शक्ति होती है।

4. गाय के दूध में कैरोटिन तत्व सर्वरोग नाशक एवं सर्व विषनाशक होता है। 5. गाय के दूध, घी, गोबर व गौमूत्र को विभिन्न पदार्थों व तत्वों के मिश्रण से विभिन्न रोगों को नष्ट करने वाली औषधियों का निर्माण होता है।

6. गाय के घी को अग्नि में डालकर धुंआ करने पर तथा सूखे गोबर को जलाकर धुंआ करने पर वायुमण्डल में फैल रहे प्रदूषण का नियंत्रण होता है तथा हानिकारक कीटों व कीटाणुओं पर नियंत्रण होता है।

7. गाय एवं उसकी संतान के रम्भाने की आवाज (ध्वनि) से मनुष्य की अनेक मानसिक विकृतियां एवं रोग स्वयंमेव दूर हो जाते हैं।

8. गाय के घी को चावल के साथ जलाने पर महत्वपूर्ण गैसें जैसे इथीलीन ऑक्साइड, प्रोपलीन ऑक्साइड आदि बनती है। इथीलीन ऑक्साइड गैस जीवाणुरोधक होने के कारण ऑपरेशन थियेटर में एवं जीवन रक्षक औषधि निर्माण के प्रयोग में आती है। प्रोपलीन ऑक्साइड गैस को वैज्ञानिक तौर पर कृत्रिम वर्षा का आधार माना जाता है। अग्निहोत्र हवन का यही मुख्य आधार है।

                                   

गाय का आर्थिक महत्वः धार्मिक दृष्टि से ही नहीं अपितु व्यवहारिक दृष्टि से त्य व गौवंश को अति महत्वपूर्ण माना गाया है। गाय से उत्पन्त दुग्ध व इससे ने वाले पौष्टिक आहार, गौ मूत्र व गोबर से मिलने वाली खाद, पंचगव्य औषधियां, -उपलब्धि तथा गौवंश (बैलों) का खेती में प्रयोग के कारण, गाय सार्वभौमिक राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था तथा शिक्षा प्रणाली दोनों का केन्द्र बन गई है। यह तथ्य निम्न बिन्दुओं से स्पष्ट हो जाता है कि गौवंश की महत्ता तथा उपयोगिता राष्ट्रीय कृषि एवं आर्थिक नीति का आधार है।

1. भारतीय गौवंश से उत्तम बैल प्राप्त होते हैं जो खेती के काम में आते हैं। वर्तमान में 70 प्रतिशत खेती का काम बैलों के द्वारा ही किया जाता है।

2. बैलों को भार ढोने के तथा यातायात के लिए काम में लिया जाता है।

3. भारत में खेती का कार्य गौवंश पर निर्भर है और गौवंश खेती पर निर्भर है। दोनों एक दूसरे के पूरक है, किन्तु वर्तमान में वैज्ञानिक व यांत्रिक खेती के कारण गौवंश की महत्वता व उपयोग की अनदेखी की जा रही है।

4. एक गौवंशीय जीव से बनी नाडेप खाद का मूल्य लगभग 20 से 25 हजार रूपये होता है।

5. गाय के गोबर से बनी खाद के प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति निरन्तर बढ़ती रहती है, जबकि रासायनिक उर्वरकों से और कीटनाशी रसायनों के प्रयोग से उर्वरा शक्ति निरन्तर घटती रहती है तथा अन्ततः भूमि बंजर हो जाती है।

6. मरे पशु को भूमि में दबाने के कुछ माह पश्चात समाधि खाद मिलता है जो कई एकड़ भूमि के लिए उपयोगी होता है। मरे पशु के एक सींग में गोबर भरकर कुछ समय अवधि तक दबाने के बाद अति मूल्यवान सींग या अणु खाद बन जाता है। जो एक एकड़ भूमि के लिए प्रयोग

में ली जा सकती है। गाय के गोबर में 16 प्रकार के विभिन्न खनिज पाए जाते हैं।

7. वर्तमान में डीजल-पेट्रोल के जलने के कारण कार्बन डाई ऑक्साइड से फैले प्रदूषण पर नियंत्रण हेतु गोबर-गोमूत्र तथा वनस्पतियों का अधिकाधिक उपयोग करना चाहिए।

8. गौमूत्र में अनेक रसायन होते हैं जैसे नाइट्रोजन, कार्बोलिक एसिड दुधारू गाय के मूत्र में लेक्टोस, सल्फर, अमोनिया गैस, कॉपर, पोटेशियम, मैगनीज, यूरिया, साल्ट तथा अन्य कई क्षार, आरोग्यकारी अम्ल होते हैं।

9. गौ के मूत्र में तांबा होता है जो औषधि रूप में मनुष्य के शरीर में पहुंच कर स्वर्ण में परिवर्तित होता है जिससे सर्वरोगनाशक शक्ति प्राप्त होती है।

10. भारतीय देशी गाय के मूत्र व गोबर से विभिन्न औषधियों का निर्माण किया जाता है। ये औषधियां मानव शरीर की बीमारियों के उपचार में अति लाभप्रद पाई गई।

11. गौ-मूत्र व गोबर से उन्नत किस्म के कीटनाशी रसायन बनते हैं जिनको फसलों व वनस्पतिर्यो पर लगे कीट/रोग के नियंत्रण हेतु प्रयोग किया जाता है।

12. देशी गाय के दुग्ध, दही, घी, गौमूत्र व गोमय से निर्मित पंचगव्य औषधियों से जटिल से जटिल रोग जैसे कैंसर, टी.बी., मधुमेह, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, अस्थमा, गठिया, हेपेटाइटिस ए व सी के मरीज लाभान्वित हो रहे हैं। भारत में विभिन्न स्थानों पर हजारों की संख्या में पंचगव्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित हो रहे हैं जहाँ रोगियों को उपचार के अनुसंधान हेतु गौ विज्ञान अनुसंधान स्थापित किये गये हैं।

13. पंचगव्य चिकित्सा एवं गौवंश आधारित्त कृषि तंत्र को अपनाने से सभी गांवों में नवयुवकों को रोजगार मिलेगा जिससे ग्रामीण क्षेत्र का आर्थिक विकास होगा। इससे पर्यावरण व जन स्वास्थ्य सुरक्षित रहेगा।

14. बायी गैस संयंत्र से गैस ईंधन एवं चालक शक्ति का उपयोग ग्रामीण क्षेत्र में हो रहा है।

15. ग्रामीण क्षेत्र में गौ गोबर के उत्पाद साबुन, अंगराग पाउडर, कम्पोस्ट खाद, दीवार रंग, धूपबत्ती आदि के निर्माण हेतु उद्योग इकाईयां स्थापित हो रही हैं जिससे ग्रामीण व राष्ट्रीय आर्थिक विकास में वृद्धि होगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।