
पर्यावरण दिवस: 5 जून पर जलावयु परिवर्तन पर विशेष Publish Date : 07/06/2026
पर्यावरण दिवस: 5 जून पर जलावयु परिवर्तन पर विशेष
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
इस बार का पर्यावरण दिवस का नारा है, ‘‘प्रकृति से सीख कर जलवायु परिवर्तन को रोकें और भविष्य बचाये’’
जलवायु परिवर्तन के विषय में जैविक खेती बहुत ही प्रासंगिक है, जो प्रकृति पर आधारित है और भविष्य के लिए भूमि और सभी जीवो की सुरक्षा की गारंटी लेती है। ऊपर दोनों पोस्टर में बताया गया है की किस तरह रासायनिक खेती से जलवायु परिवर्तन की आग में घी डाला जा रहा है, जबकि जैविक खेती से सब कुछ शांति से संपन्न हो सकता है। अतः जैविक खेती जलवायु परिवर्तन में हुए विनाशकारी प्रभाव को बहुत हद तक रोकने में सफल है।
जैविक विधि से कम हो सकते है जलवायु परिवर्तन के खेती पर कुप्रभाव। जैविक खेती से निम्न प्रकार से जलवायु परिवर्तन के खेती पर बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है-
1. जैविक खाद से प्रयोग से भूमि की जलधारणा क्षमता बढ़ती है जिससे वर्षा की अनियमितता में कमी आती है और साथ ही फसल को पर्याप्त मात्रा में पानी भी मिलता रहता है। साथ ही सिंचाई की संख्या भी कम हो जाती है। प्रयोगों से पाया गया है कि जैविक खाद के प्रयोग से ग्वार-तिल आदि फसलों ने 42 दिन के सूखाकाल के बाद भी अच्छा उत्पादन दिया, जबकि रसायनिक खाद के द्वारा उगाई गई फसल 17 दिन बाद ही नष्ट हो गयी। इसी प्रकार गेहूं में जैविक प्रबंधन से 4 सिंचाई में ही अच्छी पैदावार प्राप्त हुई। अधिक वर्षा की स्थिति मे भूमि मे वायुसंचार बना रहता है। अतः फसल सड़ती या पीली नहीं पड़ती है। जैविक खाद से फसलों की जड़ों का अच्छा विकास होता है जो तेज हवा मे फसल को गिरने से बचाता है।

2. जैविक खाद के प्रयोग से संतुलित पोषण मिलने के कारण फसल में सूखा सहने व रोग-कीट से लड़ने की ताकत बढ़ती है। साथ ही तापमान की विषमता का भी कम प्रभाव पड़ता हैं।
3. जैविक खेती का जैव विविधता, फसल चक्र आदि के होने से जलवायु परिवर्तन के कारण अचानक होने वाले ताप, वर्षा, आद्रता आदि के परिवर्तनों का प्रभाव बहुत कम हो जाता है।
4. जैविक खाद के प्रयोगों से भूमि में 200-300 किलो कार्बन का अवशोषण (सीक्रेस्ट्रेशन) होता है जो कि जलवायु परिवर्तन को कम करने में सहायक होता है।
5. जैविक खेती मे सभी आदान खेत पर ही बनाए जाते हैं अतः रसायनिक खेती के मुकाबले लागत 30-40 प्रतिशत कम हो जाती है और यदि मौसम साथ नहीं भी देता तो कम से कम रसायनों के लिए लिया जाने वाला कर्ज तो नहीं चुकाना पड़ता है।
- जो धरती को जीवन देती वह है जैविक खेती।
- जलवायु परिवर्तन में हानिकारक हैं- रासायनिक खेती।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभाव न केवल रासायनिक खेती पर ज्यादा होने की संभावना है वरन् रासायनिक खेती से जलवायु परिवर्तन के हानिकारक प्रभाव बढ़ने की संभावना है।
- रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से भूमि की जलधारणा क्षमता कम होती है अतः एक साथ अधिक वर्षा या कई दिन की सूखा में भूमि में जल संचय न होने से फसल उत्पादन कम होता है।
- फसल को संतुलित पोषण न मिलने से उसकी सूखा व रोग-कीट सहने की क्षमता कम हो जाती है।
- यूरिया, डी.ए.पी. जैसे उर्वरको के प्रयोग से वायुमण्डल में नाइट्रस आक्साइड जैसी गैसे विसर्जित होती है जो कि वातावरण को गर्म करने में बड़ी भूमिका निभाती है अर्थात् जलवायु परिवर्तन में सहायक है।
- यूरिया बनाने व प्रयोग करने में प्रतिवर्ष 90 लाख टन नाइट्रस आक्साइड गैस वातावरण में जाकर धरती को गर्म कर रही है।
- एकल फसल जैसे कपास, गन्ना आदि के लगातार खेत में उत्पादन और वह भी एक-दो किस्मों के ही प्रयोग से इनकी विषम वातावरण को सहने की क्षमता कम होती जायेगी।
- इसी प्रकार विदेशी नस्लों के पशुओं में तापमान के उतार-चढ़ाव के सहने की क्षमता कम होती है। अतः उनका उत्पादन बनाये रखने के लिये आवास व दवाओं पर जयादा खर्च करना पड़ेगा।
अतः जैविक अपनाओ - धरती बचाओ और कम लगात में अच्छा उत्पादन प्राप्त कर अपनी आय बढ़ाएं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।

