ट्राइकोडर्मा अपनाएं और फसल का बंपर उत्पादन पाए      Publish Date : 02/06/2026

ट्राइकोडर्मा अपनाएं और फसल का बंपर उत्पादन पाए

                                                                       प्रो0 आर. एसत्र सेंगर ण्वं डॉ0 निधि सिंह

ट्राइकोडर्मा का उपयोग कर किसान मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ा सकते हैं, जिससे फसल की पैदावार में सुधार होता है। रासायनिक खाद पर होने वाले खर्च को कम करने के साथ ही यह फसलों को रोगमुक्त और खेती को टिकाऊ बनाने में सहायक सिद्व होता है।

मिट्टी की सेहत को सुधारने के लिए ट्राइकोडर्मा का उपयोग सस्ता और असरदार जैविक उपाय है। ट्राइकोडर्मा इको-फ्रेंडली और मित्र फफूंद है, जो मिट्टी की जैविक सक्रियता को बढ़ाकर फसलों की जड़ों को सड़न, आर्द्र गलन और अन्य फफूंद जनित बीमारियों से बचाता है। ट्राइकोडर्मा पौधों की जड़ों के विकास को तेज करता है, जिससे पौधे मिट्टी से पोषक तत्वों का बेहतर तरीके से अवशोषण कर पाते हैं। सरदार वल्लभभाइ पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर. एस. सेंगर बताते हैं कि ट्राइकोडर्मा मिट्टी की संरचना को सुधारता है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाता है। इसके नियमित उपयोग से फसल रोगों के प्रति अधिक सहनशील बनती है एवं स्वस्थ रहती है, जिससे उत्पादन में बढ़ोतरी होती है और किसानों को लाभ होता है।

                                  

ट्राइकोडर्मा की सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली दो प्रजातियां ट्राइकोडर्मा हर्जियानियम और ट्राइकोडर्मा विरिडे का खेती में अधिक उपयोग होता है। बुआई से पहले ट्राइकोडर्मा हर्जियानम से बीज उपचार करें तो जड़ सड़न व तना गलन से फसल बची रहती है। ट्राइकोडर्मा विरिडे को गोबर खाद या कम्पोस्ट के साथ मिलाकर उपयोग करें तो मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। ट्राइकोडर्मा को सीधी धूप व रासायनिक दवाओं से दूर रखें तथा हमेशा शाम को नम मिट्टी में प्रयोग करना चाहिए।

घर पर ही तैयार करें कृषि अस्त्र

ट्राइकोडर्मा को बेहद कम लागत में किसान भाई अपने ही घर पर आसानी से तैयार कर सकते हैं। इसके लिए 10 किलो सड़ी हुई गोबर खाद या वर्मी कम्पोस्ट में 2 किलो चोकर मिलाएं। इसमें 100 ग्राम ट्राइकोडर्मा कल्चर डालकर हल्की नमीं बनाए रखें। मिश्रण को 5-7 दिन तक छाया में किसी जूट के बोरे से ढककर रखें और इस मिश्रण को प्रतिदिन पलटते रहें। तैयार होने पर ट्राइकोडर्मा की हरी परत दिखेगी, जो इसकी सक्रियता का संकेत होता है।

रोगजनक फफूंद पर करता है सीधा वार. ट्राइकोडर्मा रोगजनक फफूंद के आसपास फैलकर उनके पोषक तत्वों को अवशोषित कर लेता है, जिससे कि उसका विकास अवरूद्व हो जाता है। यह काइटिनेज और ग्लुकेनेज जैसे एंजाइम बनाकर हानिकारक फफूंद की कोशिका दीवार को तोड़ देता है। यह पौधों की जड़ों को मजबूत बनाता है, पोषक तत्वों के अवशोषण की दर को बढ़ाता है और पौधों में प्राकृतिक प्रतिरोध विकसित करता है, जिससे पौधे रोगों के प्रति अधिक सहनशील बनते हैं।

                                    

5-10 ग्राम पाउडर से करें एक किलो बीज उपचार ट्राइकोडर्मा का उपयोग उद्यानिकी फसलों के बीज उपचार, नर्सरी और मिट्टी शोधन में में भी किया जा सकता है। 5-10 ग्राम ट्राइकोडर्मा के पाउडर से प्रति किलो बीजों के उपचार से आर्द्र गलन व पौध अंगमारी रोग से बचाव होता है। नर्सरी में 5-10 ग्राम पाउडर प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में मिलाने से जड़-तना गलन का नियंत्रण होता है। खेत की तैयारी के समय 4-5 किलो पाउडर प्रति एकड़ में उपयोग करें तो फ्यूजेरियम, पीथियम व राइजोक्टोनिया जैसे रोगजनक नियंत्रित रहते हैं।

फल और सब्जी फसलों में बेहद उपयोगी ट्राइकोडर्मा का उपयोग लगभग सभी फसलों में किया जा सकता है, लेकिन यह फलों और सब्जियों की फसलों के लिए अधिक प्रभावी माना जाता है। टमाटर, मिर्च, गोभी, बैंगन, प्याज, अदरक, हल्दी, केला, अमरूद और पपीता जैसी बागवानी फसलों में इसके बेहतर परिणाम मिलते हैं। किसान इसे बीज उपचार, नर्सरी तैयार करने और खेत की मिट्टी में मिलाकर आसानी से उपयोग कर सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।