
देसी जीवनशैली का दम Publish Date : 26/05/2026
देसी जीवनशैली का दम
प्रो0 आर. एस. सेंगर
ये नारा हमेशा से बहुत दमदार रहा है ‘स्थानीय आवश्यकताएं स्थानीय संसाधनों से’। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे रोजगार के लिए ‘लोकल’ और ‘वोकल’ से जोड़ा। आज यह बात और भी अधिक सटीक महसूस होती है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां इसी और इशारा कर रहीं हैं। अमेरिका ईरान और रूस-यूक्रेन जैसे संघर्षों ने पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है और उनको भी जिनका इससे कुछ लेना देना नहीं। इन युद्धों का पहला बड़ा असर हमारी रसोई पर पड़ा, जिसे दुनियाभर के हर घर-रेस्त्रां और ढाबे ने झेलना शुरू किया।
मुड़कर देखने का समय
पिछले दशकों में हमने अपने देसी तरीकों को धक्का दिया और नए पन के प्रति आसक्त ही हो गए। अगर हम 100 साल पीछे जाएं, तो सभी तरह की रसोइयां, घरेलू या व्यावसायिक स्थानीय संसाधनों पर निर्भर थीं, इनका पूरा नियंत्रण हमारे पास ही था। गांवों में लोग ईंधन के लिए लकड़ी इकट्ठा करते थे या मवेशियों से प्राप्त गोबर के उपलों (कंडों) का उपयोग करते थे, जिनसे चूला जलता था। शहरी क्षेत्रों में मिट्टी का तेल और लकड़ी के बुरादे कोयले की अंगोठियों जैसी चीजें आवश्यकताओं को पूरा कर देती थीं।
सच्चाई यह भी है कि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में चूल्हा किसी खाड़ी संघर्ष या बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट पर निर्भर नहीं है। आज भी गांवों में लकड़ी, उपले, कंडे या उनसे जुड़े विकल्प चूल्हे को जिंदा रखे हुए हैं। यह समय हमें एक बार फिर से पीछे मुड़कर सोचने के लिए मजबूर कर रहा है। कितनी विचित्र बात है कि दो बड़े देशों के बीच की लड़ाई का असर पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है और सबसे पहली चोट हमारी उसी व्यवस्था पर पड़ती है, जिससे हमारा दैनिक जीवन चलता है।
जल रही चूल्हे की लो
इस बड़े संकट ने सबको बुरी तरह घेर लिया है। दुर्भाग्यवश, इसे एक राजनीतिक मुद्दा भी बना दिया गया। आर्थिक संकट के सवाल खड़े हो गए। यह आशंका भी जताई जाने लगी कि इसका असर खेतों और आने वाली फसलों पर पड़ेगा। ठंडे दिमाग से सोयें तो यह सब इसलिए हुआ क्योंकि आज हमारी निर्भरता आयातित तौर-तरीकों पर बहुत अधिक हो गई है। पहले हम आस-पास के संसाधनों से ही किसी न किसी तरह घर का चूल्हा जला लेते थे। अब ‘जलाऊ गैस’ ही आन बान के साथ आवश्यकता बन गई और इसके विकल्पों का तो सोच ही खत्म हो गया। दूसरी तरफ दुनिया के कई हिस्सों में आज भी लकड़ी व कंडों ने चूलहों को भटकने नहीं दिया और उनकी लौ अनवरत जारी है।
मशीनी हो रहा जीवन
पेट्रोल और डीजल ने तो अपने देश की दुखी नहीं किया पर दुनिया में इनकी कीमतों में नया उछाल आया और चक्का जाम की नौबत आई। वैसे इसने कई लोगों को साइकिल तथा घोड़ागाड़ी की भी याद दिलाई। बड़ी बात यह है कि आज हम इतने कमजोर हो गए हैं कि जरा असुविधा हमें चौराहों पर खड़ा कर देती है। कूलर, एसी, वाशिंग मशीन, मिक्सी जैसी मशीनों ने हमारे जीवन में ऐसी जगह। बना ली है कि हम भी मशीनी हो चुके हैं। यदि अचानक लंबे समय के लिए बिजली ही चली जाए, तो ऐसा लगता है मानो सब कुछ ठप हो गया हो।
सवाल पूरी दुनिया का
यह एक गंभीर सवाल है, जो इस वैश्विक संकट ने हमारे सामने खड़ा किया है। यदि आज एक युद्ध के कारण हमारी रसोई प्रभावित हो सकती है, तो कल किसी और आयातित साधन के अभाव में हम कितना असहाय बन सकते है। कोविड-19 के संकट के समय हमने सोखा था कि स्थानीय जीवनशैली, जड़ी-बूटियां, पारंपरिक उपाय और अपने गांव ही असली उपयोगी साबित हुए थे। दुनिया में अपने देश का प्रदर्शन बेहतर था, जिसका एक बड़ा कारण था कि हम उस समय समय ‘असली देसी’ हो गए थे।
वर्तमान संकट ने यह दर्शाया है कि हमें अपनी जीवनशैली चाहे वह भोजन हो, पहनावा, हो या दैनिक गतिविधियां, संतुलन बनाए रखना चाहिए। जितना हम देसी और स्वदेसी होंगे, उतने ही स्वतंत्र भी रहेंगे क्योंकि एक परतंत्रता वह होती है जब कोई हमसे सब कुछ छीन लेता है, और दूसरी वह होती है जब हम स्वयं ही अपनी सुविधाओं के दास हो जाते हैं। अब समय आ गया है कि हम फिर से आत्मनिर्भर बनें और अपनी स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त करें, जो स्वदेसी रहकर ही मिल सकेगी।
खंडित हो गई आत्मनिर्भरता
हम कितने कमजोर और मजबूर हुए हैं इसका एक सच यह भी है कि पहले गांवों में नमक और चीनी को छोड़कर लगभग सभी आवश्यक चीजें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होती थी। कई जगहों पर चीनी का भी स्थानीय विकल्प तैयार कर लिया जाता था, जैसे खजूर, नारियल, शहद आदि, लेकिन आज यदि आप गांव के बाजारों को देखें, तो वहां 70-80 प्रतिशत निर्भरता बाहरी चीजों पर हो गई है। चाहे गेहूं, मसाले, चावल या जीविका का अन्य कच्चा माल गांव में ही पैदा होता हो, फिर भी वही चौजे मूल्य वृद्धि होकर उनके ही बाजारों में बाहर से आकर बिकती है। ऐसे करते हुए हमने धीरे-धीरे गांवों की आत्मनिर्भरता को खंडित कर दिया है।
सुविधाओं ने बनाया कमजोर
आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का संकट हमें एक बड़ा सबक देता है। पहले हम स्थानीय साधनों-संसाधनों से अपनी जरूरतें पूरी कर लेते थे। स्थानीय विज्ञान और प्रयोग, जैसे गोबर गैस ने भी हमारी आवश्यकताओं को पूरा किया। जहां-जहां गोबर उपलब्ध का वहां गोबर गैस का उपयोग होने लगा। नए-नए लकड़ी के चूल्हों के स्थानीय आविष्कार भी समयानुसार सहायक हुए, लेकिन जैसे-जैसे नई गैस और आधुनिक सुविधाएं आईं, हमने खुद को पूरी तरह उन पर निर्भर कर लिया। आज हम इतने कमजोर हो चुके है कि अब एक छोटी-सी बाधा. भी हमें इस तरह हिला देती है, जैसे सब कुछ समाप्त हो गया हो।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
