धान में जीआई टैग का खेल, दूसरे मालामाल तो बुंदेले फेल      Publish Date : 17/05/2026

धान में जीआई टैग का खेल, दूसरे मालामाल तो बुंदेले फेल

                                                                                                    प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

  • बुंदेलखंड के किसानों को नहीं मिलता बासमती का वाजिब दाम, पंजाब व हरियाणा का टैग लगने से मिलती अच्छी कीमत

बुंदेलखंड का बासमती धान खासतौर पर पूसा 1121 अपनी गुणवत्ता के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान बना चुका है। फिर भी भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग न मिलने से इसका फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है। बुंदेलखंड के किसानों को इस धान का भाव 2600 रुपये प्रति क्विंटल ही मिल पाता है। यही धान पंजाब और हरियाणा के नाम से 5000 6000 रुपये प्रति क्विंटल विकता है।

बुंदेलखंड खासतौर पर चित्रकूटधाम मंडल में बासमती धान (1121) की खेती होती है। किसान नेता डॉ. साहब लाल शुक्ला के अनुसार, अकेले चित्रकूट धाम मंडल में करीब एक लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की पैदावार होती है। उनका अनुमान है कि प्रति हेक्टेयर 30-35 क्विंटल धान पैदा होता है। मुंबई की निर्यात कंपनियां यह पूरा उत्पादन खरीदकर पंजाब या हरियाणा का बासमती बताकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचती हैं।

                                         

अनुमान है कि हर साल करीब 10,000 ट्रक चावल विदेश भेजा जाता है। बता दें कि बुंदेलखंड का बासमती धान विशेष सुगंध और लंबाई (8.4 मिमी) के कारण पूरी दुनिया में पसंद किया जाता है। इसे जैविक धान बताकर दिल्ली और मुंबई के बड़े कारोबारी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं लेकिन असल किसान को फायदा नहीं मिल रहा।

पूंजीपतियों को पहुंचा रहे फायदा: डॉ. शुक्ला का मानना है कि जीआई टैग पर रोक लगाकर सरकार पूंजीपतियों को फायदा पहुंचा रही है। सरकार को निर्यात प्रतिबंध हटाकर और बुंदेलखंड के धान को जीआई टैग दिलाकर किसानों की मदद करनी चाहिए। किसान प्रेम सिंह के अनुसार, पिछले दो वर्षों में बासमती चावल का दाम 40 रुपये से घटकर 25 रुपये प्रति किलो हो गया है। इससे किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही।

सीमित पानी में अच्छी उपज: पद्मश्री जल योद्धा उमाशंकर पांडे बताते हैं कि बुंदेलखंड जैसे कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए यह धान उपयुक्त है। जखनी के पांच किसानों ने इस धान की खेती शुरू की थी, जो धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में लोकप्रिय हो गई। चित्रकूट, हमीरपुर, बांदा जैसे जिलों में यह धान पैदा हो रहा है। बांदा क्षेत्र में ही 50 लाख क्विंटल से अधिक बासमती धान पैदा होता है। फिर भी एपीईडीए मानने को तैयार नहीं है कि बुंदेलखंड की जलवायु में पूसा बासमती की गुणवत्तापूर्ण पैदावार संभव है। वह कहते हैं कि सरकार और जनप्रतिनिधियों को जीआई टैग के लिए ज्यादा प्रयास करने चाहिए।

पूसा 1121 की विशेषताएं

                                            

पूसा 1121 धान भारत का सबसे लंवा, सुगंधित और स्वादिष्ट बासमती चावल है। यह प्रति हेक्टेयर 35-40 क्विंटल उपज देता है और 130 दिनों में तैयार हो जाता है। इसे अन्य किस्मों की तुलना में कम पानी की दरकार होती है। इसमें विटामिन बी और थायमिन होता है। 2008 में मान्यता प्राप्त इस किस्म ने 2018 में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराया था। चावल की इस किस्म के आविष्कारक कृषि वैज्ञानिक डॉ. विजयपाल सिंह को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत से होने वाले वासमती निर्यात में इसका 70 फीसदी हिस्सा है।

जीआई टैग की जरूरत क्यों: जीआई टैग किसी भी उत्पाद को उसकी विशिष्ट भौगोलिक पहचान देता है। उत्पाद की विशिष्टता और गुणवत्ता को दर्शाता है। उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाता है और नकली से बचाता है।

बुंदेलखंड में बासमती की तीन किस्में 1718, 1821 और 1811 पैदा होती हैं। पूसा 1121 की खेती 21 हजार हेक्टेयर में होती है। यह धान बिकने के लिए मंडी नहीं आता है। इसलिए इस पर मंडी शुल्क भी नहीं मिलता है। इसे जीआई टैग नहीं मिला है।

एपीईडीए पर सवाल

बुंदेलखंड के धान को जीआई टैग न मिलने के पीछे कृषि व प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। डॉ. शुक्ला का कहना है कि एपीईडीए केंद्रीय एजेंसी है, जो कृषि उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देती है। एजेंसी बुंदेलखंड के धान को जीआई टैग दिलाने में नाकाम रही है जबकि इससे बुंदेलखंड के किसान अंतरराष्ट्रीय बाजार से सीधे जुड़ सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।