
भारत का पशुधन क्षेत्र Publish Date : 16/05/2026
भारत का पशुधन क्षेत्र
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 पूतन सिंह
नई पहलें, प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं
भारत का पशुधन क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। पशुधन क्षेत्र ग्रामीण आबादी को आजीविका सहायता प्रदान करने में बहुआयामी भूमिका निभाता है। पशुधन क्षेत्र सामान्य रूप से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से कृषि अर्थव्यवस्था में योगदान देने के अलावा, रोज़गार सृजन के अवसर, संपत्ति निर्माण, फसल खराब होने के प्रति बचाव तंत्र और सामाजिक और वित्तीय सुरक्षा भी प्रदान करता है।भारत में पशुधन उत्पादन प्रणालियों मुख्यतः कम लागत वाले कृषि अवशेषों, कृषि-आधारित उप-उत्पादों तथा पारंपरिक प्रौद्योगिकियों पर आधारित हैं, जिनका प्रमुख उद्देश्य दूध, कृषि कार्य हेतु पशु शक्ति, मांस, अंडा, रेशा आदि का उत्पादन करना है।
लगभग 100 मिलियन ग्रामीण परिवारों के पास किसी न किसी प्रजाति के पशुधन हैं और उनमें से 80 मिलियन के पास गाय और/या भैंस हैं। पशुधन क्षेत्र, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान देने के अलावा, 80 मिलियन ग्रामीण परिवारों को आजीविका प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में, अधिकांश पशुपालन गतिविधियाँ महिलाओं द्वारा संभाली जाती हैं। पशुधन क्षेत्र में लगभग 75 मिलियन महिलाएँ, जबकि केवल 15 मिलियन पुरुष संलग्न हैं। पशुधन विकास गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। इससे ग्रामीण समुदायों में महिला प्रधान परिवारों का सशक्तिकरण हुआ है।ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन के महत्व को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि हमारे देश में किसानों के बीच भूमि समान रूप से वितरित नहीं है, जबकि छोटे सीमांत और भूमिहीन मजदूरों के पास 90ः से अधिक दुधारू पशु हैं और ग्रामीण परिवारों की 12-26ः आय पशुपालन और डेयरी क्षेत्र से आती है।
कम पूंजी निवेश, छोटा परिचालन चक्र और स्थिर लाभ पशुपालन को ग्रामीण परिवारों के बीच एक पसंदीदा आजीविका गतिविधि बनाते हैं। पशुपालन बाढ़ और सूखे जैसी पर्यावरणीय प्रतिकूलताओं के समय कृषि नुकसान को कम करके एक सुरक्षा कवच के रूप में भी कार्य करता है।
डेयरी सहकारी समितियों के बड़े नेटवर्क ने लाखों डेयरी किसानों को बाज़ार तक पहुँच प्रदान करने में सहायता की है तथा हमारे डेयरी किसानों को एकीकृत कर सशक्त बनाया है। देश में डेयरी सहकारी समितियाँ उपभोक्ता मूल्य की 70 प्रतिशत से अधिक धनराशि दुग्ध उत्पादकों को वापस करती हैं, जो विश्व में सबसे अधिक है। दुग्ध और दुग्ध उत्पाद भारतीय थाली के महत्वपूर्ण घटक हैं, जिनका उपभोग 75 प्रतिशत से अधिक परिवार करते हैं और कुल खाद्य व्यय का लगभग 20 प्रतिशत दुग्ध और दुग्ध उत्पादों पर खर्च किया जाता है।
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में पशुधन क्षेत्र का योगदान
पशुधन क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का एक महत्वपूर्ण उपक्षेत्र है। यह 2014-15 से 2023-है। 24 के दौरान 12.77 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ा (स्थिर मूल्य पर) कृषि और उससे संबंधित क्षेत्रों के क्षेत्रवार जीवीए के लिए राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी (एनएएस) 2025 के अनुमानों के अनुसार, कुल कृषि और उससे संबंधितक्षेत्र जीवीए (स्थिर मूल्य पर) में पशुधन का योगदान 24.32 प्रतिशत (2014-15) से बढ़कर 31 प्रतिशत (2022-23) हो गया है। पशुधन क्षेत्र ने 2022-23 में कुल जीवीए में 5.5 प्रतिशत का योगदान दिया। पशुधन क्षेत्र के विकास से दुग्ध, अंडे और मांस की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में सुधार हुआ है। 2022-23 के दौरान मौजूदा कीमत पर पशुधन क्षेत्र के उत्पादन का मूल्य ₹18.99 लाख करोड़ है (राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी2025 के अनुसार)। सिर्फ दुग्ध के उत्पादन का मूल्य ₹12.77 लाख करोड़ से अधिक है (पशुधन क्षेत्र के कुल उत्पादन मूल्य का 67%) जो कृषि उत्पादों में सबसे अधिक है और धान और गेहूं के संयुक्त मूल्य से भी अधिक है।
डेयरी क्षेत्र में वृद्धि
भारत दुग्ध उत्पादन में वैश्विक अग्रणी देश है, जो वैश्विक दुग्ध उत्पादन में 25 प्रतिशत का योगदान देताहै। दुग्ध उत्पादन 2014-15 में 146.31 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 247.87 मिलियन टन हो गया, जो लगभग 70% की वृद्धि है। स्वतंत्रता के पश्चात डेयरी उद्योग भारत की विकास गाथा का एक अभिन्न अंग रहा है, जिसमें सरकार ने आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि के लिए पशुधन क्षेत्र की क्षमता का उपयोग करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और करोड़ों डेयरी किसानों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के लिए सबसे प्रभावी साधन साबित हुआ है। पिछले 7 दशकों में, भारत सरकार की प्रेरक नीतिगत कार्यप्रणाली के तहत राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के माध्यम से की गई पहलों ने यह सुनिश्चित किया है कि डेयरी क्षेत्र में कई गुना वृद्धि हुई है, जिससे भारत विश्व में दुग्ध उत्पादन में शीर्ष स्थान पर है। डेयरी सहकारी आंदोलन ने दुग्ध और डेयरी पशुओं से संबंधित सभी प्रमुख मूल्य श्रृंखलाओं को शामिल करते हुए पूरे डेयरी क्षेत्र को बदल दिया है।
अग्रणी पहलें उत्पादकता वृद्धि
भारत के डेयरी क्षेत्र में पिछले एक दशक में परिवर्तनकारी वृद्धि देखी गई है, जिसमें दुग्ध उत्पादन 247.87 एमटी के शिखर पर पहुँच गया है, जो 11 वर्ष की अवधि में 69.4% की उल्लेखनीय वृद्धि है। यह बढ़ोतरी 36.63% उत्पादकता वृद्धि के कारण संभव हुई है, जो विश्व में सबसे अधिक है, जो 2013-14 में 1,648.17 किग्रा./पशु/वर्ष से बढ़कर 2024-25 में 2251 किग्रा./पशु/वर्ष हो गई है।
राष्ट्रीय डेयरी योजना चरण - I
विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित भारत सरकार की केंद्रीय क्षेत्र योजना, जिसका परियोजना व्यय ₹2,242 करोड़ था, जिसका नाम राष्ट्रीय डेयरी योजना चरण-(एनडीपी-1) था, जो अप्रैल 2012 में प्रारंभ की गई थी। एनडीडीबी द्वारा एनडीपी-1 को 2011-12 से 2018-19 तक 18 प्रमुख डेयरी राज्यों में लगभग ₹2,250 करोड़ के व्यय के साथ कार्यान्वित किया गया था। इस परियोजना का लक्ष्य दुग्ध उत्पादन बढ़ाना, उत्पादकता में सुधार करना और ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों को संगठित दुग्ध प्रसंस्करण क्षेत्र तक पहुँच प्रदान करना था।मुख्य उपलब्धियों में 2456 उच्च आनुवंशिक गुण वाले सांड़ उपलब्ध कराना, 119 मिलियन रोग-मुक्त सीमन डोज का उत्पादन करना और परियोजना क्षेत्र में गर्भधारण दर को 35% से बढ़ाकर 44% करना शामिल है।
इस परियोजना ने आहार संतुलन कार्यक्रम के तहत 2.87 मिलियन दुधारू पशुओं को शामिल किया, जिससे फीडिंग लागत में 12% की कमी आई, और दूग्ध उत्पादकों की दैनिक आय में लगभग ₹8,000 प्रति लैक्टेशन में वृद्धि हुई। इसने चारे के विकास को भी बढ़ावा दिया, 120 बायोमास बंकरों का निर्माण किया, और 1.69 मिलियन दुग्ध उत्पादकों को बाज़ार तक पहुँच प्रदान की। इसके अलावा, एनडीपी-प् ने महिलाओं को सशक्त बनाया, जिसमें गाँव-स्तर की डेयरी सहकारी समितियों में 0.77 मिलियन महिला सदस्य नामांकित हुईं, और सामाजिक समावेश में योगदान दिया और पलायन को कम किया। वर्ष 2020-21 के दौरान परियोजना की समाप्ति तक भारत का दूध उत्पादन 210 मिलियन टन तक पहुँच गया, जिससे निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति हुई। 60 प्रतिशत की आर्थिक रिटर्न दर के साथ, विश्व बैंक ने राष्ट्रीय डेयरी योजना चरण 1 (एनडीपी-1) को ‘अत्यंत संतोषजनक’ की श्रेणी प्रदान की।
राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत की गई पहल
भारत सरकार की पहल के तौर पर, देश भर में कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम 623 जिलों में क्रियान्वित किया गया, जहाँ कृत्रिम गर्भाधान कवरेज 50% से कम था, और इन 623 जिलों में से 126 जिलों में कृत्रिम गर्भाधान कवरेज 50% से ज्यादा हो गया है। इसके परिणामस्वरूप देश में प्रजनन योग्य मादा गोवंश के लिए कृत्रिम गर्भाधान कवरेज 25 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत तक हो गया। एक ऐसी टेक्नोलॉजी जो केवल मादा बछिया का जन्म सुनिश्चित करती है, वह न केवल नर बछड़ों की देखभाल की ज़रूरत को समाप्त करके डेयरी किसानों पर वित्तीय बोझ को कम करती है, बल्कि श्रेष्ठ गायों से ज़्यादा रिप्लेसमेंट हीफर पैदा करने की संभावना भी देती है। भारत में, एक ऐसी किफ़ायती सेक्स-सोंटिंग टेक्नोलॉजी की ज़रूरत थी जो डेयरी किसानों की आय बढ़ा सके। तथापि, उपलब्ध टेक्नोलॉजी कुछ मल्टीनेशनल कंपनियों के पास थीं, जिससे ये उत्पाद आम किसानों के लिए बहुत महंगे थे। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ विज़न के तहत, पशुपालन और डेयरी विभाग ने राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के माध्यम से सेक्स सॉर्टड सीमन प्रोडक्शन टेक्नोलॉजी विकसित की है, जिससे भारत सेक्स-सॉर्टेड सीमन डोज़ के प्रोडक्शन में आत्मनिर्भर बन गया है। इस पहल से, सेक्स सॉर्टेड सीमन अब सभी किसानों को किफायती कीमतों पर उपलब्ध है।
देश में पहली बार राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत गोवंशीय आईवीएफ टेक्नोलॉजी प्रारंभ की गई है। आईवीएफ टेक्नोलॉजी गोवंश की उत्पादकता बढ़ाने को के लिए बहुत आवश्यक है, क्योंकि जो कार्य 7 पीढ़ियों में होता है, वह आईवीएफ टेक्नोलॉजी से एक ही पीढ़ी में किया जा सकता है। इस योजना के तहत, देश में गायों और भैंसों में आईवीएफ टेक्नोलॉजी बढ़ावा देने के लिए 24 आईवीएफ लैब चालू की गई हैं। विभाग ने इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के लिए स्वदेशी मीडिया राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड के माध्यम से विकसित किया है। यह स्वदेशी मीडिया, महंगे इम्पोर्टेड मीडिया का एक किफ़ायती विकल्प देता है। इस मीडिया के उपयोग से भूण उत्पादन की लागत ₹5000 से घटकर ₹2000 प्रति भ्रूण हो जाएगी।
विकसित डेयरी देश गोवंश की आबादी में जेनेटिक सुधार की दर बढ़ाने के लिए डीएनए आधारित चयन का उपयोग कर रहे हैं, जिसे जीनोमिक चयन कहा जाता है। एडवांस्ड डेयरी देशों द्वारा विकसित जीनोमिक चिप विदेशी नस्लों जैसे होल्स्टीन फ्रीजियन (एचएफ) और जर्सी के लिए उपयुक्त थी। गायों और भैंसों के जेनेटिक सुधार में तेज़ी लाने के लिए, विभाग ने पूरी तरह से स्वदेशी एकीकृत जीनोमिक चिप्स विकसित की हैं, जैसे स्वदेशी गायों के लिए गौ चिप और भैंसों के लिए महिष चिप, जिन्हें खास तौर पर देश में जीनोमिक चयन प्रारंभ करने के लिए डिज़ाइन किया गया है और अब तक संदर्भ आबादी बनाने के लिए 75,000 से ज़्यादा पशुओं का जीनोटाइप किया गया है।
भारत पशुधन प्लेटफॉर्मः डिजिटलीकरण के माध्यम से पशुधन शासन व्यवस्था में बदलाव
पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) ने एनडीडीबी के साथ मिलकर ष्भारत पशुधनष् नामक एक डेटाबेस विकसित किया है। यह डेटाबेस हर पशुधन को दिए गए एक विशिष्ट 12 अंकों के टैग आईडी का उपयोग करके विकसित किया गया है। अब तक, इस डेटाबेस पर 36.10 करोड़ पशुओं का पंजीकरण किया जा चुका है। सभी हितधारक एक ओपन सोर्स एपीआईआधारित आर्किटेक्चर के माध्यम से एक ही डेटाबेस से जुड़े हुए हैं। भारत पशुधन पोर्टल डीएएचडी की सभी लाभार्थी-उन्मुख योजनाओं के साथ-साथ निजी क्षेत्र की पशु चिकित्सा और प्रजनन सेवाओं के लिए आईटी फ्रंट और बैक-एंड के रूप में कार्य करेगा, जिससे पूरी तरह से डिजिटलीकरण, पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित होगी। प्रमुख उपलब्धियाँ इस प्रकार हैंरू (प) एक विशिष्ट 12-अंकीय टैग आईडी को प्राथमिक पहचान कुंजी के रूप में ष्भारत पशुधनष् डेटाबेस का निर्माण; (पप) पशुधन किसानों के लिए 1962 मोबाइल एप्लिकेशन; (पपप) रोग निगरानी के लिए सीरो-सर्विलांस और सीरी-मॉनिटरिंग एप्लिकेशन; (पअ) गीर गाय के घी, बद्री गाय के घी, पश्मीना और अन्य पशुधन उत्पादों के लिए ट्रेसबिलिटी समाधान और (अ) वर्तमान में फील्ड अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा सिस्टम में 150 करोड़ से अधिक लेनदेन दर्ज किए गए हैं।
पशुधन इकोसिस्टम का पूर्ण डिजिटलीकरण डेटा संचालित शासन, रियल टाईम निगरानी, प्रत्यक्ष लाभअंतरण और किसानों को राष्ट्रीय बाजारों के साथ एकीकृत करने में सक्षम बनाएगा। इन हस्तक्षेपों के माध्यम से, पशुधन क्षेत्र ग्रामीण समृद्धि, रोजगार और निर्यात वृद्धि का एक प्रमुख वाहक बन जाएगा जो विकसित भारत के विज़न में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम
राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम ने पहले ही 32,331 से अधिक डेयरी सहकारी समितियों की स्थापना और उन्हें मजबूत करके, 20.97 लाख किसानों (एमपीओ में 76% से अधिक महिलाओं सहित) को नामांकित करके और 41.45 लाख लीटर/दिन दुग्ध संकलन क्षमता में वृद्धि कर भारत के डेयरी परिदृश्य को बदल दिया है। बुनियादी ढांचे के लाभों में 138.64 एलएलपीडी चिलिंग क्षमता वाले 5,647 बल्क मिल्क कूलर, 56,916 एएमसीयू डीपीएमसीयू इकाइयों और 252 उन्नत प्रयोगशालाएँ शामिल हैं, जिन्होंने मिलकर दुग्ध की गुणवत्ता में सुधार किया है- जिसका प्रमाण एमबीआरटी में 63 से 90 मिनट तक 40% की वृद्धि है।
मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने 2020-21 में एनडीडीबी के माध्यम से क्रियान्वित की गई एसडीसी एवं एफपीओ योजना के तहत कोविड-19 के कारण लिक्विडिटी की समस्या का सामना कर रही डेयरी सहकारी समितियों को सहायता देने के लिए एक इंटरेस्ट सबर्वेशन कंपोनेंट प्रारंभ किया। इस योजना का उद्देश्य उत्पादक-स्वामित्व वाली संस्थाओं को दुग्ध उत्पादकों को समय पर भुगतान करने में सहायता करना है। यह वित्तीय बोझ को कम करने के लिए वर्किंग कैपिटल लोन पर इंटरेस्ट सबवेंशन प्रदान करती है। डेयरी प्रसंस्करण एवं अवसंरचना विकास निधि (डीआईडीएफ) तथा पशुपालन अवसंरचना विकास निधि (एएचआईडीएफ) जैसी योजनाएं प्रोसेसिंग, वैल्यू-एडिशन और फीड मैन्युफैक्चरिंग में बड़े पैमाने पर निवेश को सक्षम बना रही हैं। डीआईडीएफ का फरवरी, 2024 में आधिकारिक तौर पर एएचआईडीएफ में विलय हो गया। उदारीकरण के बाद, निजी डेयरियों ने महत्वपूर्ण निवेश किया है, और एएचआईडीएफ निजी क्षेत्र के लिए एक समान अवसर प्रदान कर रही है, दुग्ध प्रोसेसिंग प्लांट बनाने के लिए इंटरेस्ट सबवेंशन दे रही है।
ऐसी पहलों के परिणामस्वरूप 22 राज्य महासंघ, 240 जिला दुग्ध संघ और 1.7 लाख गांव-स्तरीय समितियों के साथ एक फलता-फूलता डेयरी सहकारी नेटवर्क बना है, जिसमें देश भर में 1.7 करोड़ सदस्य जुड़े हुए हैं। यह उल्लेखनीय उपलब्धि वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित विवेकपूर्ण और समय पर लिए गए फैसलों की शक्ति का प्रमाण है। यह नेटवर्क प्रतिदिन लगभग 675 लाख किलोग्राम दुग्ध संकलित करता है और 445 लाख लीटर तरल दुग्ध बिक्री करता है, जिसकी सामूहिक प्रोसेसिंग क्षमता प्रति दिन 1100 लाख लीटर से अधिक है। गौरतलब है कि निजी क्षेत्र ने भी इसी तरह की क्षमता निर्मित की है, जो इस क्षेत्र के विकास और क्षमता को रेखांकित करता है।
रोग नियंत्रण कार्यक्रम
खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी) खुर वाले पशुओं में अत्यधिक प्रसारित होने वाला संक्रामक वायरल रोग है और भारत में स्थानिक है, जिससे उत्पादकता में कमी और व्यापार प्रतिबंधों के कारण बड़ी आर्थिक हानि होती है। पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम एलएचडीसीपी) के तहत, भारत का लक्ष्य व्यवस्थित टीकाकरण के माध्यम से 2030 तक एफएमडी को नियंत्रित और समाप्त करना है। इसके लिए, गुणवत्ता परीक्षित ट्राइवैलेंट एफएमडी टीके केंद्रीय रूप से खरीदे जाते हैं और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को उनकी आपूर्ति की जाती हैं। यह कार्यक्रम सभी योग्य गायों और भैंसों (और चुनिंदा चारागाह बाहुल्य राज्यों में भेड़ बकरियों) के लिए वर्ष में दो बार टीकाकरण क्रियान्वित करता है, जिसमें पहली बार टीका लगाए गए बछड़ों को 30-45 दिनों के बाद बूस्टर डोज दी जाती है। टीकाकरण चरणों के मध्य का अंतराल छह महीने से कम रखा जाता है। 2020 से अब तक 125 करोड़ से अधिक एफएमडी वैक्सीन लगाई जा चुकी हैं। राज्यों को वैक्सीनेशन, लॉजिस्टिक्स, कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर, वैक्सीनेटर, ईयर-टैगिंग, भारत पशुधन पोर्टल पर डेटा एंट्री और जागरूकता गतिविधियों के लिए 100% केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है। राज्य पशुपालन विभाग क्षेत्र में क्रियान्वयन करने और माइक्रो-प्लानिंग करने के लिए उत्तरदायी हैं। सभी वैक्सीनेटेड पशुओं को विशिष्ट ईयर-टैग लगाए जाते हैं और वैक्सीनेशन रिकॉर्ड को डिजिटल रूप से रिकॉर्ड किया जाता है।
उद्यमिता को बढ़ावा देना-युवाओं कीसहभागिता और रोज़गार सृजन
भारत की पशुधन अर्थव्यवस्था में बकरी, भेड़, सूअर, मुर्गीपालन और चारा उद्यम शामिल हैं। राष्ट्रीय पशुधन मिशन (एनएलएम) उद्यमिता और रोज़गार सृजन को प्रोत्साहित करता है, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को पशुधन उद्यमिता में एकीकृत करता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक रोज़गार पैदा होता है। केंद्र सरकार अपनी योजनाओं के माध्यम से पेरेंट लेयर फार्म और भेड़ या बकरी प्रजनन फार्म और सूअर पालन स्थापित करने के लिए 50% पूंजी सब्सिडी प्रदान करती है, जिससे ग्रामीण मुर्गीपालन और पशुधन विकास को बढ़ावा मिलता है।
पशुपालन अवसंरचना विकास निधि निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करना
₹29,000 करोड़ के परिव्यय वाले एएचआईडीएफ को व्यक्तिगत उद्यमियों, निजी कंपनियों, एमएसएमई, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और धारा 8 कंपनियों द्वारा निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए अनुमोदित किया गया है ताकि (1) डेयरी प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन अवसंरचना, (II) मांस प्रसंस्करणऔर मूल्य संवर्धन अवसंरचना और (पपप) पशु आहार संयंत्र स्थापित किए जा सकें। एएचआईडीएफ की सफलता को ध्यान में रखते हुए, पूर्व डेयरी प्रसंस्करण अवसंरचना विकास निथि का 01.02.2024 को एएचआईडीएफ में विलय कर दिया गया है। अब निधि का कुल आकार ₹29110 करोड़ है। अब तक, 523 अनुमोदित परियोजनाओं में ₹24500 करोड़ का निवेश किया गया है। एएचआईडीएफ डेयरी और मांस प्रसंस्करण, पशु आहार निर्माण, नस्ल सुधार और गुणन फार्म, पशु चिकित्सा वैक्सीन और दवा उत्पादन, पशु अपशिष्ट-से-समृद्धि पहल, और प्राथमिक ऊन प्रसंस्करण अवसंरचना जैसी गतिविधियों का समर्थन करके व्यापक क्षेत्रीय कवरेज सुनिश्चित करती है। समय के साथ, इन क्षेत्रों ने महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की है, जिससे दूरदराज के जिलों से भी परियोजनाएं आकर्षित हुई हैं, जहाँ पूर्व में भागीदारी अत्यंत सीमित थी। यह स्थिति योजना की व्यापक पहुँच तथा पशुपालन क्षेत्र पर इसके परिवर्तनकारी प्रभाव को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।
गरीबी उन्मूलन के सर्कुलेरिटी माध्यम के रूप में पशुधन क्षेत्र
पशुधन क्षेत्र एक शक्तिशाली गरीबी उन्मूलन के सर्कुलैरिटी माध्यम के रूप में, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों, भूमिहीन परिवारों, महिलाओं और युवाओं के लिए कार्य करता है। पशुपालन क्षेत्र 10 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों और डेयरी से जुड़े लगभग 8.5 करोड़ किसानों को आजीविका सहायता प्रदान करता है। उद्यमिता को बढ़ावा देकर, घर-घर पशु चिकित्सा और प्रजनन सेवाएं, मूल्य संवर्धन, संगठित संकलन, और चारा-पशु आहार आत्मनिर्भरता से, इनपुट आपूर्ति और पशुपालन से लेकर प्रसंस्करण और विपणन तक पूरी मूल्य श्रृंखला में आय के अवसर पैदा होते हैं। उत्पादकता वृद्धि, निश्चित बाजार तक पहुंच, और रोग-मुक्त पशुधन से स्थिर और नियमित आय, बेहतर पोषण, और जलवायु-संवेदनशील और कम साक्षरता वाले क्षेत्रों को बेहतर मजबूती मिलती है। आय, रोज़गार और सेवाओं का यह लगातार प्रवाह बहुआयामी प्रभाव उत्पन्न करता है, जिससे ग्रामीण आजीविका मज़बूत होती है तथा समावेशी एवं सतत् गरीबी उन्मूलन को बढ़ावा मिलता है।
भावी गतिविधियां
विकसित भारत /2047 की दृष्टि से, भारत एक टेक्नोलॉजी से उन्नत, सस्टेनेबल और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्थी पशुथन क्षेत्र की कल्पना करता है। 2047 तक, दुग्ध उत्पादन 600 मिलियन टन, अंडा उत्पादन 588 बिलियन और मांस उत्पादन 27 मिलियन टन तक पहुंचने का लक्ष्य है। प्रति व्यक्ति दुग्ध की उपलब्धता दोगुनी होकर 1 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति दिन होने का अनुमान है और गायों और भैंसों की औसत उत्पादकता बढ़कर 5,500 किलो और सो पशु प्रति वर्ष हो जाएगी। हमारा लक्ष्य 2047 तक भारत को सभी प्रमुख पशुधन रोगों से मुक्त करना है। इससे हमारे किसानों के लिए नए बाज़ार खुलेंगे, खाद्य सुरक्षा में सुधार होगा, और एक वैश्विक लीडर के रूप में भारत की स्थिति मज़बूत होगी। इस विज़न को साकार करने के लिए, उद्यमिता विकास, टेक्नोलॉजी-आधारित और ट्रेसेबल पशुपालन, मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण, और आहार और चारे में आत्मनिर्भरता पर ध्यान दिया जाएगा। उद्यमिता को बढ़ावा देने से आय सृजन में गुणक प्रभाव होगा, जिससे किसानों के घर-घर गुणवत्तापूर्ण सेवाएं सुनिश्चित होंगी। पशुपालन क्षेत्र में स्टार्टअप की सहायता करने और इनक्यूबेशन सुविधाएं प्रदान करने से आत्मनिर्भरता के साथ-साथ ही देश के युवाओं को रोज़गार मिलेगा और आय में भी वृद्धि होगी।
निष्कर्ष
पिछले दस वर्षों में उत्पादन में हुई वृद्धि जीवीए में बढ़त और बेहतर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की वजह से भारत के पशुधन क्षेत्र में लगातार बदलाव देखने को मिला है। दुग्ध, मांस और अंडे के उत्पादन में वृद्धि से पोषण सुरक्षा और ग्रामीण रोज़गार बढ़ा है। जीवीए में ज़बरदस्त बढ़ोतरी कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र में इस क्षेत्र के बढ़ते महत्व को दिखाती है और ग्रामीण आजीविका को स्थिर करने में पशुधन की भूमिका को उजागर करती है। पशुधन छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच का कार्य करता है और रोज़गार के वैकल्पिक अवसर पैदा करता है और वैश्विक बाज़ारों में भारत की स्थिति को मज़बूत करता है। भारत के पशुधन क्षेत्र के बढ़ते निर्यात से यह पता चलता है कि उभरते ग्लोबल अवसरों का पूरा फायदा उठाने के लिए एक जैसे गुणवत्ता मानक, रोग-मुक्त क्षेत्र और उत्पादों में विविधता की आवश्यकता है। आगे बढ़ते हुए, यह आवश्यक है कि टेक्नोलॉजी, जेनेटिक्स और जलवायु-अनुकूल तरीकों में निवेश के रास्ते बनाए जाएं ताकि चारे की उपलब्धता, रोगों पर नियंत्रण और लगातार उत्पादन और उत्पादकता सुनिश्चित हो सके, जिससे यह गति बनी रहे और मज़बूत हो।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
