
ऊर्जा संकट से जूझता विश्व Publish Date : 12/05/2026
ऊर्जा संकट से जूझता विश्व
प्रो0 आर. एस. सेंगर
राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच दो सप्ताह से जारी युद्ध विराम को जिस तरह यकायक अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाया, उससे वे अपने कदम पीछे खींचते हुए दिखे। उन्होंने युद्ध विराम विस्तार की घोषणा ऐसे समय की, जब इस्लामाबाद में होने वाली दूसरे दौर की शांति वार्ता को लेकर संशय कायम था। गत दिवस इस संशय के बादल छंटे और दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच दूसरे दौर की वार्ता की संभावना भी बढ़ी, लेकिन अंतिम क्षणों में इस संभावना ने दम तोड़ दिया। ईरान ने पहले दौर की वार्ता विफल होने के बाद जिस प्रकार अमेरिका से बात करने से इन्कार किया था, उससे यही लग रहा था कि वह अपने बंदरगाहों की अमेरिकी नाकेबंदी खत्म किए बिना न तो होर्मुज समुद्री मार्ग खोलने के लिए तैयार होगा और न ही वार्ता के लिए। अब जब तक ईरान और अमेरिका के बीच कोई ठोस समझौता नहीं होता, तब तक पश्चिम एशिया संकट और साथ ही ऊर्जा संकट खत्म होने के आसार नहीं।
अमेरिका और ईरान के बीच पहले दौर की वार्ता इसलिए विफल हुई थी, क्योंकि ईरान न तो यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम से पीछे हटने को तैयार था और न ही होर्मुज पर अपना आधिपत्य छोड़ने के लिए। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती किं युद्ध विराम विस्तार के बाद भी होर्मुज बंद है। अमेरिकी नाकेबंदी के पहले वहां से इक्का-दुक्का जो जहाज निकल पा रहे थे, अब वे भी नहीं निकल पा रहे हैं। ईरान अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने की शर्त रखने के साथ ही इस पर अड़ा है कि वह होर्मुज से निकलने वाले जहाजों को अपनी निगरानी में निकलने देगा और उनसे फीस भी वसूलेगा।
यह किसी को स्वीकार नहीं हो सकता- न तो अमेरिका को और न ही खाड़ी देशों को, क्योंकि होर्मुज स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है। होर्मुज से विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की ढुलाई होती है। उसके बाधित होने से भारत समेत एशियाई देशों को ही ऊर्जा संकट का सामना नहीं करना पड़ रहा है। संकट का असर अमेरिका समेत पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। हालांकि अमेरिका के पास अपने तेल एवं गैस भंडार हैं, लेकिन होर्मुज से ऊर्जा आपूर्ति ठप हो जाने से तेल और गैस के दाम उसके यहां भी बढ़ रहे हैं। उसके मुकाबले कहीं अधिक विश्व के अन्य देशों को कहीं गंभीर ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ रहा है। चूंकि ईरान यह समझ रहा है कि वह होर्मुज बाधित कर विश्व के देशों को अमेरिका पर इसके लिए दबाव डालने में सक्षम हो सकता है कि वह टकराव से पीछे हटे, इसलिए उसने भी कठोर रवैया अपना लिया है। उसके इसी रवैये से दूसरे दौर की वार्ता नहीं हो सकी।
ईरान अमेरिकी हमलों के जवाब में खाड़ी देशों में उसके ठिकानों को निशाना बनाने में भी सक्षम है। अमेरिका की समस्या यह है कि वह ईरान के हमलों का पूरी तरह प्रतिकार करने में सक्षम नहीं दिख रहा। इससे अमेरिकी सैन्य अड्डों वाले खाड़ी के देशों में भी बेचैनी है।

यह स्पष्ट है कि होर्मुज खुलने में जितना विलंब होगा, ऊर्जा संकट उतना ही गहराएगा। इस संकट के चलते अमेरिका ईरान को नए सिरे से निशाना बनाने के लिए बाध्य तो हो सकता है, लेकिन ट्रंप के लिए उसके खिलाफ ऐसा करना आसान नहीं। शायद यही कारण है कि वे कभी ईरान को तबाह करने की धमकी देते हैं और कभी उससे समझौते की उम्मीद जताते हैं। वे बीते 10-12 दिनों में न जाने कितनी बार अपने बयान बदल चुके हैं। उनके बार-बार बदलते और विरोधाभासी बयानों से विश्व को यही संदेश जा रहा है कि वे पश्चिम एशिया में उपजे संकट का समाधान करने की स्थिति में नहीं। इस सबके बीच ईरान ने दावा करना शुरू कर दिया है कि उसने होर्मुज से निकलने वाले जहाजों से वसूली शुरू कर दी है। पता नहीं सच क्या है, लेकिन होर्मुज बाधित रहने से ऊर्जा संकट गंभीर रूप लेता जा रहा है। यदि मौजूदा यथास्थिति में अमेरिका पीछे हटता है तो इससे उसकी फजीहत तो होगी ही, युद्ध में हुई क्षति की भरपाई के नाम पर ईरान होर्मुज से निकलने वाले जहाजों की वसूली करने में भी सक्षम हो सकता है। इससे भी तेल और गैस के दाम बढ़ जाएंगे।
होर्मुज पर ईरान के दबदबे से उसके और खाड़ी देशों के बीच भी टकराव बढ़ना तय है। ट्रंप ने अनिश्चितकाल के से लिए युद्धविराम को चाहे जिन कारणों बढ़ाया हो, लेकिन उसके पीछे उनकी मजबूरी ही दिखती है। एक बड़ी मजबूरी तो ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए अमेरिकी संसद की अनुमति है। अमेरिकी कानून के तहत यदि राष्ट्रपति किसी देश के खिलाफ युद्ध छेड़ते हैं तो उन्हें 60 दिनों के अंदर संसद सेअनुमति लेनी होती है। यह अवधि 1 मई को खत्म हो रही है। समस्या यह है कि उन्हें संसद की अनुमति मिलना कठिन है। खुद ट्रंप समर्थकों के साथ वहां का बड़ा राजनीतिक वर्ग युद्ध के पक्ष में नहीं। माना जा रहा है कि इसी के चलते ट्रंप ने युद्धविराम बढ़ाने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और वहां के सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर के इस कथित आग्रह की आड़ ली कि युद्धविराम जारी रखा जाए। पाकिस्तान भी इसके लिए व्याकुल है कि किसी तरह अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो जाए। ऐसा न होने पर उसकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी, क्योंकि युद्ध फिर से शुरू होने की स्थिति में उसे सऊदी अरब के साथ हुए समझौते के तहत उसके साथ और ईरान के खिलाफ खड़ा होना होगा। वह ऐसा नहीं चाहेगा, क्योंकि उसकी ईरान से दुश्मनी होजाएगी। अमेरिका-ईरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता जब भी हो और उसका जो भी परिणाम हो, होर्मुज का खुलना जरूरी है, क्योंकि खाड़ी के देशों के पास अपना तेल और गैस निर्यात करने का और कोई आसान रास्ता नहीं।
होर्मुज के विकल्प के रूप में जिन जमीनी रास्तों की संभावनाएं टटोली जा रही हैं, उनका निर्माण होने में वर्षों लग सकते हैं। वैसे इन वैकल्पिक मार्गों पर काम शुरू कर दिया जाए तो बेहतर, क्योंकि इसका ठिकाना नहीं कि पश्चिम एशिया में फिर कब नया संकट खड़ा हो जाए। वैसे भी ईरान इस ताक में है कि उसका होर्मुज पर किसी न किसी तरह आधिपत्य हो जाए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
