उपजाऊ भूमि, पैदावार भरपूरः मृदा के पीएच तथा लवणता का प्रबन्धन      Publish Date : 14/04/2026

उपजाऊ भूमि, पैदावार भरपूरः मृदा के पीएच तथा लवणता का प्रबन्धन

                                                                                  प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

समस्या की पहचान कैसेः क्या अपाकी भूमि की स्थिति वास्तव में खराब होती जा रही है? तो आपके खेत की मृदा की सेहत में सुधार करने के लिए हम आपको ऑर्गेनिक रेमेडीज के तौर पर तीन प्रभावी तरीकों के बारे में जानकारी प्रदान करने जा रहें हैं। अतः आप समस्त किसान भाईयों से हमारा यह अनुरोध है कि आप इन तरीको को ध्यानपूर्वक पढ़कर इन्हें प्रयोग कर लाभ उठाएं-

     मृदा की गुणवत्ता के आधार पर मिट्टी का वर्गीकरणः

भूमि का प्रकार

मृदा का पीएच मान

लवणता (ईसी)

उपजाऊ (सामान्य)

क्षारयुक्त (Saline)

चोपण (Alkaline)

6.5-7.0

7.0 से कम

7.5 से अधिक

2.5 से कम

2.5 से अधिक

2.5 से कम

              

भूमि का आदर्श पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए, क्योंकि इस पीएच मान वाली मिट्टी से लगभग समस्त प्रमुख एवं सूक्ष्म पोषक तत्व हमारे फसलीय पौधों को सुगमता से प्राप्त होते हैं।

                                      

यदि आपके खेत की मिट्टी का ई.सी. का स्तर 2.5 ऊपर आता है तो यह आपके लिए एक चेतावनी भरा संकेत होता है।

क्योंकि यदि मृदा का ईसी 2.5 से अधिक आता है तो इससे आपके खेत की मिट्टी का खारापन बढ़ता है और इसके फलस्वरूप फसल के उत्पादन में गिरावट आने लगती है।

सिंचाई और मिट्टी के खारापन में सम्बन्ध

अधिक सिंचाई करना भी खेत की मिट्टी के खारेपन में वृद्वि करता है, क्योंकि फसलों को अत्याधिक पानी देने अर्थात फसलों की अधिकता से सिंचाई करने और पानी में उच्च टीडीएस होने के चलते मिट्टी की संरचना भी खराब हो जाती है।

जिप्सम का उचित उपयोगः

गर्मी के मौसम में खेत की गहरी जुताई करने और उसमें जिप्सम (4-5 टन प्रति एकड़) की दर से प्रयोग करने पर सोडियम को मिट्टी से बाहर निकालने में पर्याप्त सहायता प्राप्त होती है।

साथी ही खेत में अमोनियम सल्फेट और सिंगल सुपर फॉस्फेट का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए।

समाधानः

अपने खेत में जैविक खाद एवं बैक्टीरिया के उपयोग को बढ़ाएं: जैविक खाद, हरित खाद और नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम आदि के विलायक जीवाणुओं का उपयोग कर आप अपने खेतों की उर्वरता को काफी हद तक बढ़ा सकते हैं।  

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।