
कैल्शियम के प्रकार, उपयोग और उनके फायदे Publish Date : 12/04/2026
कैल्शियम के प्रकार, उपयोग और उनके फायदे
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 निधि सिंह
कैल्शियम के प्रकार
- कैल्शियम नाइट्रेट (Calcium Nitrate):
- पानी में पूरी तरह घुलनशील।
- ड्रिप (FBCD) और स्प्रे के लिए उत्तम।
- कैल्शियम + नाइट्रोजन दोनों मिलता है।
कैल्शियम क्लोराइड (Calcium Chloride)
- मुख्यतः फोलियर स्प्रे (छिड़काव) के लिए।
- फलों का फटना (cracking) कम करता है।
कैल्शियम सल्फेट (Gypsum)
- मृदा की सेहत में सुधार के लिए उपयोगी।
- क्षारीय (alkaline) मिट्टी के लिए उपयुक्त।
कैल्शियम कार्बोनेट (Lime)
- अम्लीय (acidic) मिट्टी का pH सुधारने के लिए
चिलेटेड कैल्शियम (Chelated Calcium)
- पौधों को तुरंत उपलब्ध।
- उच्च उत्पादन वाली फसलों के लिए उपयोगी।
कैल्शियम उपयोग करने की विधियाँ-

1. फोलियर स्प्रे (छिड़काव)
- कैल्शियम नाइट्रेट: 5–10 ग्राम/लीटर।
- कैल्शियम क्लोराइड: 3–5 ग्राम/लीटर।
- 10–15 दिन के अंतर से 2–3 स्प्रे।
2. ड्रिप (Fertigation):
- कैल्शियम नाइट्रेट: 2–5 किलो/एकड़ सप्ताह में 1–2 बार।
3. मिट्टी में उपयोग (Soil Application)
- जिप्सम: 50–100 किलो/एकड़।
- लाइम: मिट्टी परीक्षण के अनुसार।
फसल अनुसार उपयोग (उदाहरण)
- सब्जियां (टमाटर, मिर्च, पत्ता गोभी)।
- 20–25 दिन से स्प्रे शुरू करें।
- फल बनने के समय कैल्शियम नाइट्रेट जरूरी।
- मक्का / गन्ना।
वृद्धि अवस्था में ड्रिप के माध्यम से उपयोग-
- कंद फसलें (हल्दी, प्याज)।
- जड़ों की वृद्धि के लिए नियमित उपयोग।
कैल्शियम के फायदे-

- जड़ों की तेज वृद्धि।
- सफेद जड़ों का विकास बढ़ता है।
- फलों की गुणवत्ता सुधार।
- फल मजबूत, भारी और टिकाऊ बनते हैं।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
- फफूंद और सड़न कम होती है।
- फल झड़ना और फटना कम होता है।
- टमाटर में Blossom End Rot रोकता है।
- पौधे की मजबूती बढ़ती है।
- तना और पत्तियां मजबूत होती हैं।
कैल्शियम की कमी के लक्षण
- नई पत्तियां मुड़ जाती हैं।
- पत्तियों के किनारे जल जाते हैं।
- फलों के सिरे पर काले धब्बे।
- जड़ों की वृद्धि कम।
महत्वपूर्ण सुझाव
- कैल्शियम को फॉस्फेट/सल्फेट उर्वरकों के साथ न मिलाएं।
- छिड़काव सुबह या शाम को करें।
- पानी की कमी न होने दें।
- मिट्टी परीक्षण के अनुसार मात्रा तय करें।
निष्कर्ष:
सही समय और सही मात्रा में कैल्शियम देने से फसल की गुणवत्ता, उत्पादन और टिकाऊपन में काफी वृद्धि होती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
