काली मिट्टी के पीएच और क्षारीयता का राज      Publish Date : 03/04/2026

  काली मिट्टी के पीएच और क्षारीयता का राज

                                                           प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 निधि सिंह एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

काली मिट्टी को पत्थर बनने से पहले ही हो जाना चाहिए सावधान- मिट्टी के पीएच और क्षारीयता का जाल को समझना अति आवश्यक होता है।

समस्त किसान भाई खेती करने के दौरान अपने खेत में खून-पसीना एक कर देते हैं, लेकिन अगर खेत की मिट्टी ही उनका साथ देने को तैयार न हो तो ऐसे में वह करें भी तो क्या करें? आजकल बिना सोचे-समझे रासायनिक खादों का जो लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे हमारी मिट्टी का स्वास्थ्य पूरी तरह से बिगड़ चुका है। ऐसे में मिट्टी का पीएच और निरंतर बढ़ती क्षारीयता (Salinity) वर्तमान समय की खेती के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुके हैं। अगर आपकी जमीन पत्थर की तरह सख्त होने लगी है, तो समझ लीजिए कि यह आपके लिए खतरे की एक घंटी बज चुकी है।

                                   

आज के समय में उपजाऊ मिट्टी की पहचान यह है कि मृदा का पीएच 6.5 से 7.0 के बीच होना चाहिए। अगर किसी कारण के चलते यह सीमा पार हो जाती है, तो आप चाहे कितनी भी महंगी खाद का प्रयोग क्यों न कर लें, उसका पूरा लाभ फसल को कभी भी नहीं मिल पाता है। जरूरत से ज्यादा सिंचाई और खारे पानी के उपयोग करने से हमारे खेतों की मिट्टी का दम भी अब घुटने लगा है। जब मिट्टी का EC (इलेक्ट्रिकल कंडक्टिविटी) 2.5 से ऊपर चला जाता है, तो इससे हमारी फसलें सचमुच जलने लगती है और आपकी पैदावार का मूल्य भी मिट्टी के भाव के समान ही हो जाता है।

इस समस्या का सबसे प्रभावशाली और मजबूत उपाय यह है कि आप के द्वारा गर्मी के मौसम में खेतों की गहरी जुताई करना। खेत की मिट्टी जब धूप से गर्म होती है, तो उसके कई दोष भी कम होने लगते हैं। इसके बाद प्रति एकड़ 4-5 टन जिप्सम का प्रयोग अपने खेत में करना वाहिए। जिप्सम का प्रयोग करना खेत की मिट्टी के लिए किसी अमृत से कम नहीं होता है। यह मिट्टी में मौजूद अतिरिक्त सोडियम को बाहर निकालता है और मिट्टी को फिर से ढीला व भुरभुरा बना देता है। जब मिट्टी भुरभुरी होती है, तो उसमें पौधों की जड़ें गहराई तक जाती हैं और फसल तेजी से बढ़ती है।

                                

इसके लिए केवल रासायनिक खादों के पीछे ही नहीं भागना चाहिए, बल्कि मिट्टी की संरचना में यथोचित सुधार करने के लिए अमोनियम सल्फेट और सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) आदि के जैसी खादों के उपयोग को भी बढ़ावा देना चाहिए। यह खादें मिट्टी के रासायनिक संतुलन को उचित बनाए रखने में मदद करती हैं। साथ ही गोबर की खाद और हरी खाद का उपयोग बढ़ाकर यदि जैविक कार्बन को सुरक्षित रखा जाए, तभी आपकी खेती की उपज भी अधिक टिकाऊ बन सकेगी। क्योंकि मिट्टी बचेगी तभी तो किसान खुशहाल बनेगा, इसलिए अभी जागिए और अपनी मिट्टी की जांच अवश्य ही कराएं, ताकि आवश्यकता के अनुसार ही आप उसमें खादों का प्रयोग कर सकें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।