गन्ने में ‘चाबुक कानी’ रोग और इसका नियंत्रण      Publish Date : 02/04/2026

गन्ने में ‘चाबुक कानी’ रोग और इसका नियंत्रण

                                                                                          प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

सावधान- गन्ने में ‘चाबुक कानी’ रोग का समय पर नियंत्रण करें और पाएं अच्छी पैदावार-

सम्मानित किसान बन्धुओं, इस समय गन्ने की फसल में ‘चाबुक कानी’ (Sugarcane Whip Smut) नामक फफूंद जनित रोग का प्रकोप बड़े पैमाने पर देखने को मिल रहा है। यदि इस रोग को अनदेखा किया गया या इसके प्रति लापरवाही बरती गई तो आपके गन्ने के उत्पादन में भारी कमी आ सकती है।

रोग की पहचान:

                                

  • गन्ने के शीर्ष (शेंड) से काले रंग का, चाबुक जैसा लंबा और मुड़ा हुआ भाग बाहर निकलता है।
  • शुरुआत में यह चाबुक एक सफेद पतले आवरण से ढका हुआ होता है, जो बाद में फटकर काली धूल (फफूंद के बीजाणु) आदि के माध्यम से हवा के द्वारा फैलता है।
  • रोग से प्रभावित गन्ने की वृद्धि रुक जाती है और उसका डंठल (कांडी) छोटा रह जाता है।

रोग नियंत्रण के उपायः

1. पत्तियाँ (पाचट) हटानाः जैसे ही रोगग्रस्त चाबुक के लक्षण खेत में दिखाई दे, उसे प्लास्टिक बैग में सावधानी से एकत्र कर काटें और खेत के बाहर ले जाकर जलाकर नष्ट कर दें।

ध्यान रखें: चाबुक को खुले में झटका न दें, क्योंकि ऐसा करने से इसके कण पूरे खेत में फैल जाते हैं।

2. गन्ने के बीज (सेट) का चयनः सदैव रोगमुक्त खेत से ही बीज का चयन करें।

3. बीज उपचारः गन्ने की बुवाई से पहले बीज को उचित फफूंदनाशक से उपचारित अवश्य ही करें।

4. उचित फसल चक्र (Crop Rotation): एक ही खेत में बार-बार गन्ना लगाने से बचें, और उचित फसल चक्र अपनाएँ।

समय पर पहचान और सही प्रबंधन ही अच्छी पैदावार की कुंजी है!

संक्षेप में:

                              

  • नई पत्तियों के किनारों पर व्यवस्थित मोज़ाइक स्वरूप।
  • शिराओं के समांतर संकरे हरिमाहीन धब्बे।
  • पुरानी पत्तियों पर परिगलन।
  • पुरानी पत्तियों में लाल रंग के भाग।
  • अवरुद्ध विकास तथा बंजर डंठल।

लक्षण:

इस रोग के सर्वाधिक लक्षण छोटे पौधों पर दिखाई देते हैं। संक्रमित पौधों में सामान्य हरे रंग में बीच-बीच में हल्के हरे से पीले रंग के विशेष मोज़ाइक स्वरूप के धब्बे विकसित होते हैं। कभी-कभी मोज़ाइक स्वरूप शिराओं के समांतर बढ़ते हुए संकरे हरिमाहीन या परिगलित धब्बों से उभर आते हैं। कुछ मामलों में, धारियाँ छोटी डंठलों में भी देखी जाती हैं। बाद में, पत्तियों में सामान्य हरिमा हीनता दिखाई देती है तथा धारियां बड़ी होती जाती हैं और अधिक संख्या में दिखाई देने लगते हैं। जैसे-जैसे पौधे परिपक्व होते हैं, पत्तियों के किनारे पर आंशिक लालिमा या परिगलन होता है। संक्रमण के समय पर निर्भर करते हुए, पौधे बहुत अधिक छोटे रह जाते हैं अथवा पूरी तरह बंजर हो जाते हैं।

वैज्ञानिक सिफारिशें

जैविक नियंत्रण

खेतों में तथा उसके समीप विषाणु के संभावित धारकों, जैसे खरपतवारों को नियंत्रित रखें। माहू की जनसंख्या पर निगरानी तथा नियंत्रण रखें क्योंकि ये स्वस्थ पौधों को भी विषाणु से संक्रमित कर देते हैं।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा समवेत उपायों का प्रयोग करना चाहिए, जिसमें रोकथाम के उपायों के साथ जैविक उपचार, यदि उपलब्ध हो, का उपयोग किया जाए। माहू की जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशकों का प्रयोग न करें क्योंकि यह तरीका अप्रभावी सिद्ध हो चुका है।

यह किससे हुआ

माहू विषाणु को खाने से फैलाते हैं तथा कुछ ही दिनों में स्वस्थ पौधों को भी संक्रमित कर देते हैं। एक पौधे से दूसरे पौधे तक मशीनों द्वारा प्रसार भी संभव है, विषाणु चोटों के द्वारा पत्तियों में प्रवेश कर सकते हैं। चाकू व अन्य औज़ारों द्वारा मशीनी प्रसार संभव नहीं है, क्योंकि विषाणु पौधों के ऊतकों से बाहर अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता।

निवारक उपाय

  • प्रतिरोधक प्रजातियों को उगायें।
  • प्रमाणित स्रोतों के रोग-मुक्त बीजों को लगायें।
  • माहू (एफ़िड) पर पलने वाले लाभकारी कीटों की अच्छी संख्या सुनिश्चित करें।
  • संक्रमित पौधों की संख्या की निगरानी रखें।
  • पौधों को क्षति तथा चोटों से बचाएं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।