
एआई में वैश्विक ताकत बनता भारत Publish Date : 27/03/2026
एआई में वैश्विक ताकत बनता भारत
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय
एआई अगली औद्योगिक क्रांति है। पूरा विश्य इसके कारनामों से अभिभूत है। भारत इसके महत्व को भांपते हुए एआई महाकुंभ का आयोजन कर रहा है और अमेरिका व चीन के समकक्ष होने का संदेश दे रहा है। यह सम्मेलन बता रहा है कि भारत केबल एआई का उपभोक्ता नहीं, यल्कि निर्माता बनने की दौड़ में अमेरिका और चीन को कड़ी टक्कर दे रहा है।
एआई कंप्यूटर विज्ञान की वह शाखा है, जो मशीनों को इंसानों की तरह सोचने, सीखने, समस्या सुलझाने और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। यह तकनीक डाटा का विश्लेषण करके पैटर्न पहचानती है और उसके आधार पर काम करती है। इसके कई तरह के लाभ हैं, फिर चाहे वे स्वास्थ्य क्षेत्र में हों या कारोबारी क्षेत्र में या फिर जटिल वैज्ञानिक समस्याओं को सुलझाने के मामले में। इसी कारण इसे ऐसी शक्ति कहते हैं, जिसे अपनाने और जिसकेसाथ कौशल विकसित करने वाले भविष्य में आगे रहेंगे। भारत ने 'एआई इम्पैक्ट समिट' के जरिये विश्व स्तर पर अपनी तकनीकी क्षमताओं का लोहा मनवाया है।

नई दिल्ली का एआई सम्मेलन फेवल कूटनीतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह वैश्विक तकनीकी विमर्श में भारत की सक्रिय और दूरदर्शी भूमिका का संकेतक है। यह सम्मेलन स्पष्ट करता है कि भारत एआई को केवल प्रतिस्पर्धा या प्रभुत्व के उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि समावेशी विकास और मानव कल्याण के साधन के रूप में देखता है। आज जब एआई को लेकर विश्व के शक्तिशाली देशों के बीच होड़ तेज हो रही है, तब भारत का यह प्रयास संतुलित और नैतिक दिशा देने की पहल के रूप में सामने आया है। भारत का दृष्टिकोण 'पीपुल, प्लैनेट और प्रोप्रेस' परआधारित है, जिसका अर्थ है कि तकनीक का विकास मानव केंद्रित हो, पर्यावरण के अनुकूल हो और सतत प्रगत्ति को चढ़ावा देने वाला हो।
यह व्यापक एजेंडा दर्शाता है कि भारत तकनीकी शक्ति को केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि इसे सामाजिक न्याय और वैश्विक समानता से जोड़ना चाहता है। विशेष रूप से 'मिनी एआई' को अवधारणा इस सोच को और स्पष्ट करती है। ऐसे मॉडल, जो कम संसाधनों में भी प्रभावी हों, बहुभाषी हों और कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में भी काम कर सकें, वे विकासशील देशों के लिए वरदान सिद्ध हो सकते हैं। इससे जब एआई गांवों, छोटे उद्यमों और स्थानीय भाषाओं तक पहुंचेगा, तभी उसका लोकतंत्रीकरण संभव होगा। भारत एआई के समावेशीइस्तेमाल की वकालत कर यहा है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
