एआई को आदत नहीं ताकत बनाएं      Publish Date : 24/03/2026

        एआई को आदत नहीं ताकत बनाएं

                                                                                    प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय

इसमें कोई दो राय नहीं कि एआई की मदद से घंटों के काम मिनटों में पूरे हो रहे हैं, लेकिन हर बात पर एआई का सहारा, हमारी सोचने की क्षमता को भी छीन रहा है। हमें याद रखना होगा कि स्मार्ट टूल्स ध्यान करने की सलाह दे सकते हैं, हमारे बदले ध्यान कर नहीं सकते। मानसिक शांति के लिए, “डिजिटल माइंडफुलनेस” का अभ्यास बेहद जरूरी है।

एआई आपका असिस्टेंट है। यह असिस्टेंट आपके दिन की योजना बना सकता है, आपके ईमेल को संक्षेप में लिख सकता है और आपके कामों को रफ्तार दे सकता है। पर क्या एआई सब कुछ है? मेरा मानना है कि एआई आपको ध्यान करने की सलाह दे सकता है, लेकिन वह आपके लिए ध्यान नहीं कर सकता। ध्यान तो आपको ही करना होगा।

अगर एआई तकनीक और हमारे डिजिटल उपकरण हमारी जगह ध्यान भी कर सकते, तो मेरे पास “माइंडफुलनेस” के बेहतरीन आंकड़े होते। हर कोई ध्यान के हर सत्र में मौजूद होता और शायद हर किसी को “आंतरिक शांति” का गोल्ड मेडल मिल जाता। हममें से अधिकांश लोगों की तरह मैंने यही सीखा है कि हमारे उपकरण कितने भी स्मार्ट क्यों न हो जाएं, वे हमारे हिस्से के “महसूस” करने वाले काम नहीं कर सकते। जिन कामों से हमारी भावनाएं, हमारी प्रेरणाएं जुड़ी होती हैं, वे काम हमारे स्मार्ट उपकरण नहीं कर सकते।

                               

वे हमारी सांसें धीमी नहीं कर सकते या यह याद नहीं. दिला सकते कि हमारे लिए क्या जरूरी है। वह काम आज भी, सौभाग्य से, इंसान के हिस्से ही है।

तकनीक संग ऐसा हो रिश्ता

तकनीक के साथ हमारा ऐसा रिश्ता होना चाहिए, जो थकाने की बजाय हमारा सहायक हो। आइए तकनीकी उपकरणों के इस्तेमाल से जुड़ी एक संतुलित दिनचर्या बनाने की कोशिश करते हैं। मैं इसे “माइंडफुल टेक रूटीन” कहता हूं। एक ऐसी दिनचर्या, जो स्पष्टता बढ़ाने के लिए एआई का उपयोग करे, उसे और उलझाने के लिए नहीं।

एआई ने आधुनिक जीवन को काफी कुछ बदला है। जैसे, नोशन एआई प्रोजेक्ट्स को व्यवस्थित कर सकता है। “ग्रामरली” आपके लेखन को निखारता है। आपकी कॉफी ठंडी होने से पहले चैटजीपीटी आपके 80 प्रतिशत ईमेल्स के ड्राफ्ट तैयार कर देता है, लेकिन, इस शक्ति की छिपी हुई कीमत भी चुकानी पड़ती हैः निरंतर उत्तेजना। हम न केवल अपने काम, बल्कि सोच को भी बाहर ठेके पर देने लगे हैं।

हम टैब्स और नोटिफिकेशन के बीच कूदते रहते हैं और दोपहर 2 बजे तक हमारा दिमाग उस ब्राउजर विंडो की तरह लगता है, जिसमें बहुत सारे टैब खुले हैं। एआई खलनायक नहीं है, चुनौती यह है कि हम इसे कैसे उपयोग करते हैं? लक्ष्य “डिजिटल मिनिमलिज्म” यानी तकनीक का कम इस्तेमाल नहीं, बल्कि डिजिटल माइंडफुलनेस है। हम तकनीक का उपयोग विवेक से करें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।