
न्यायपालिका में एआइ की भूमिका Publish Date : 13/03/2026
न्यायपालिका में एआइ की भूमिका
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय
यह सर्वथा उचित है और समय की मांग के अनुरूप भी कि इंडिया एआइ इंपैक्ट शिखर सम्मेलन के अवसर पर न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को लेकर भी एक सत्र का आयोजन किया गया। इसमें इस पर विचार किया गया कि मशीनी दक्षता किस प्रकार भारत की न्याय व्यवस्था को मजबूत कर सकती है। चूंकि इस कार्यक्रम में विधिवेत्ताओं के साथ ला फर्मों के विधि विशेषज्ञों ने भी भाग लिया, इसलिए यह आशा की जाती है कि आने वाले समय में न्यायिक तंत्र में एआइ का उपयोग और बढ़ेगा एवं उससे आम लोगों को लाभ भी मिलेगा।
जब जीवन के हर क्षेत्र में एआइ का उपयोग हो रहा है, तब फिर न्यायपालिका के क्षेत्र में भी ऐसा होना चाहिए। वैसे तो सीमित स्तर पर न्यायिक तंत्र में एआइ का उपयोग हो रहा है, लेकिन अभी इसका आकलन किया जाना शेष है कि उसके वांछित परिणाम मिल पा रहे हैं या नहीं? वर्तमान में ई-कोर्ट परियोजना के तहत न्यायिक तंत्र में एआई आधारित कई तरह के टूल्स उपयोग में लाए जा रहे हैं। जैसे मशीन लर्निंग टूल अदालती फैसलों का अंग्रेजी से क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करता है। इसके माध्यम से हजारों निर्णयों को विभिन्न भाषाओं में अनूदित किया गया है।

एक अन्य टूल फाइलों का विश्लेषण करने, प्रासंगिक कानूनों और उदाहरणों को खोजने में मदद करता है। इसी तरह कुछ, उच्च न्यायालयों में ऐसे टूल प्रयोग हो रहे हैं, जो गवाहों के बयानों को सीधे डिजिटल टेक्स्ट में बदलने का काम करते हैं। न्यायिक तंत्र में एआइ को उपयोग इस तरह होना चाहिए कि लोगों को समय पर न्याय मिलने की संभावनाएं बढ़ें। निःसंदेह एआइ निर्णय देने का काम नहीं कर सकती और न ही उससे ऐसा कोई काम लिया जाना चाहिए। मानवीय विवेक का स्थान एआइ नहीं ले सकती, लेकिन उसका इतना सहयोग तो लिया ही जा सकता है, जिससे कागजी कार्रवाई का बोझ कम हो।
अनुसंधान, विश्लेषण और डाटा संग्रह का काम भी एआइ के जरिये हो सकता है। इस सबके साथ ही यह भी समझा जाना चाहिए कि न्यायिक तंत्रः में एआइ का इस्तेमाल तभी प्रभावी होगा, जब अपेक्षित न्यायिक सुधार भी किए जाएंगे। यह आवश्यक है कि तारीख पर तारीख के सिलसिले पर विराम लगे। इसी तरह जनहित याचिकाओं के नाम पर फालतू की याचिकाओं पर लगाम लगना भी जरूरी है। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि हर क्षेत्र में सुधार हो रहे हैं, लेकिन आवश्यक हो चुके बुनियादी न्यायिक सुधार आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे हैं।

इसी का नतीजा है कि जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में लंबित मुकदमों का अंबार बढ़ता जा रहा है। करोड़ों लंबित मुकदमे केवल करोड़ों लोगों को हताश निराश ही नहीं कर रहे, बल्कि देश की प्रगति में बाधक भी बन रहे हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
