
एआइ जगत को दिशा देने की कोशिश Publish Date : 11/03/2026
एआइ जगत को दिशा देने की कोशिश
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं इं0 कार्तिकेय
नई दिल्ली में आरंभ एआइ प्रभाव शिखर सम्मेलन कूटनीतिक मोर्चे पर ही एक मील का पत्थर नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीतिक पुनर्संरचना 'का प्रतीक भी है। यह शिखर सम्मेलन भारत की इस भावना को दर्शाता है कि वह इस उभरती हुई तकनीक से जुड़े विमर्श को प्रभावित कर उसे संमावेशी एवं लोकतांत्रिक बनाना चाहता है। इस आयोजन के माध्यम से भारत. एआइ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से जुड़ी चर्चा को सुरक्षा एवं प्रतिस्पर्धात्मक लाभकी अमूर्त चिंताओं से इतर उसके प्रभाव की ओर मोड़ना चाहता है। जैसे कि कौन इससे लाभान्वित हो रहा है और कौन नहीं और कौन इस खेल के नियम निर्धारित कर रहा है?
इससे पहले एआइ संबंधी आयोजन विकसित देशों में हुए और पहली बार वैश्विक दक्षिण में ऐसा शिखर सम्मेलन हो रहा है। प्रतीकात्मक रूप से भी यह बड़ा परिवर्तन है। पूर्व के आयोजनों में चर्चा का केंद्र मुख्य रूप से एआइ माडलके विकास और जोखिमों पर केंद्रित रहा। इस दृष्टि से भारत की मेजबानी में यह आयोजन अलग कहानी कहने जा रहा है। भारत एआइ परिचालन को एक तकनीकी मुद्दे से परे विकास संबंधी पहलू के रूप में पुनर्परिभाषित करने के प्रयास में लगा है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'मानवता के लिए एआइ' वाले उस मंत्र को ही दर्शाता है कि किसी तकनीक का उद्देश्य निजी पूंजी को बढ़ाने के बजाय व्यापक सार्वजनिक हितों की पूर्ति का होना चाहिए।

भारत. का एजेंडा तीन मानक स्तंभों पर आधारित है। ये तीन स्तंभ हैं पीपल, यानी लोग, प्लैनेट यानी पृथ्वी और प्रोग्रेस यानी प्रगति। इन तीन स्तंभों को व्यावहारिक दृष्टि से सात विषयगत 'चक्रों' में विभक्त किया गया है। ये सात चक्र हैं-कंप्यूटिंग और डाटा तक पहुंच का लोकतंत्रीकरण, सामाजिक प्रभाव के लिए एआइ, सुरक्षित और विश्वसनीय एआइ, विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखलाओं में एआइ, कृषि और खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा एवं ग्लोबल साउथ के लिए एआइ। यह दृष्टिकोण एआइ को समावेशन और स्थायित्व के दायरे में एक रणनीतिक विकल्प के तौर पर रेखांकित करता है।
इस क्रम में मिनी एआइ पर भी जोर दिया जा रहा है। मिनी एआइ से तात्पर्य ऐसे माडल से है, जो उपयोग में सुगम होने के साथ ही किफायती एवं बहुभाषी भी हों। खासतौर से कमजोर कनेक्टिविटी वाले परिदृश्य में भी प्रभावी रूप से कार्य कर सकें। ऐसी दृष्टि के साथ भारत यह जताना चाहता है कि नवाचार अनिवार्य रूप से बड़े पैमाने और अत्याधुनिक प्रप्णालियों तक ही सीमित नहीं रह सकता। इसकेनई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में जारी इंडिया एआइ इंपैक्ट समिट आइएएनएसबजाय उसकी दृष्टि उपयोगिता को केंद्र में रखती है। इसमें पूर्वानुमानित सार्वजनिक स्वास्थ्य माडल, जलवायु के प्रति अनुकूल कृषि और डिजिटलीकृत सेवाओं का वितरणं महत्वपूर्ण हैं। इससे एआइ केवल कारपोरेट कौशल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि राज्य की क्षमताओं को सुदृढ़ करने का एक उपकरण बन जाती है। इस तरह यह एक ओर विकास संबंधी व्यावहारिकता बन जाती है तो दूसरी ओर भू-राजनीतिक स्थिति का पर्याय।

भारत की आकांक्षा केवल वैश्विक एआइ मानकों के अनुपालक बनने तक सीमित नहीं है, वह उनमें सक्रिय सहभागी भी बनना चाहता है। करीब 30 लाख से अधिक एआइ पेशेवरों और दुनिया के तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम के दम पर नई दिल्ली का मानना है कि उसके पास इस विमर्श को दिशा देने के लिए आवश्यक जनसांख्यिकीय एवं उद्यमशील शक्ति मौजूद है। इस संदर्भ में जब सैम आल्टमैन जैसे एआंइ क्रांति के अग्रदूतयह कहें कि भारत में फुल स्टैक एआइ लीडर बनने की भरपूर संभावनाएं हैं तो यह उसी धारणा को मजबूत करता है कि यह देश उभरती अर्थव्यवस्थाओं के एक व्यापक गठबंधन को नेतृत्व दे सकताः है। विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों का इस सम्मेलन से जुड़ाव इसकी बहुपक्षीय दिशा को भी दर्शाता है।समग्रता में देखा जाए तो भारत एआइ परिदृश्य पर स्वयं को पश्चिम के नवाचार केंद्रों और वैश्विक दक्षिण की परिचालन संबंधी आवश्यकताओं, अमेरिकी नेतृत्व वाले उद्यमशील इकोसिस्टम और सरकारी नियंत्रण वाले चीन के व्यापकता से परिपूर्ण तंत्र के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित करने में लगा है।
एआइ संचालन से जुड़ी एक राह भारत की व्यापक विदेश नीति के रुझान को भी दर्शाती है। अलग-थलग पड़े बिना रणनीतिक स्वायत्तता को बनाएं रखना इस नीति के मूल में है। तकनीकी राष्ट्रवाद के इस दौर में ऐसा रुख रवैया न केवल विश्व के शक्ति केंद्रों से जुड़े रहने, बल्कि अफ्रीका, दक्षिण पूर्वीएशिया और दक्षिण अमेरिकी देशों की आवाज को बुलंद करने की गुंजाइश भी. देता है। वैश्विक स्तर प्रर भारत के स्वर भी उसकी घरेलू नीतियों से भी मेल खा रहे हैं। इस दिशा में कल्याणकारी ढांचे, स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि परामर्श और डिजिटल गवर्नेस की दिशा में एआइ से जुड़ी पहल भारत के दावों को ठोस आधार प्रदान करती है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि भारत केवल तकनीकी समावेशन का उपदेश ही नहीं दे रहा, बल्कि उसे अमल में भी ला रहा है।
महत्वाकांक्षाओं को सदैव वास्तविकंता की कसौटियों का भी सामना करना पड़ता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की तकनीकी क्षमताएं अभी सीमित हैं। सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला के लिए विदेश पर निर्भरता तकनीकी संप्रभुता को सवालों के घेरे में खड़ा करती है। इसके अलावा एल्गोरिदम संबंधी पूर्वाग्रह से लेकर निजी डाट्ा संरक्षण जैसे प्रश्न भी हैं। ऐसे में यदि भारत वैश्विक स्तर पर एआइ की विश्वसनीयता की मांग को लेकर मुखर होता है तो उसे घरेलू मोर्चे पर भी नियामकीय अनकूलता प्रदर्शित करनी होगी। इसलिए यह एआइ शिखर सम्मेलन भारत के समक्ष चुनौतियां और अवसरू दोनों प्रदान करता है।
भारत यदि इसमें सफल होता है तो वह एआइ से जुड़ी भू-राजनीति को भी नए सिरे से संतुलित करने में सक्षम हो सकता है। इतना तो तय है कि भारत इस एआइ एक्सप्रेस में केवल एक डिब्बे में जगह पाने से संतुष्ट नहीं होने वाला। वह इंजन का हिस्सा भी बनना चाहता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
