
मानव के बिना कोई भी मशीन अधूरी Publish Date : 25/02/2026
मानव के बिना कोई भी मशीन अधूरी
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं इ0 कार्तिकेय
अभी तक ऐसा कोई भी प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है कि एआई ऐसे मौलिक विचार उत्पन्न कर सके, जो कि मानव मस्तिष्क की कल्पना से परे हो-
हम दशकों से दुनिया के दिग्गज गणितज्ञ 20वीं सदी के महान विद्वान पॉल एडस द्वारा पेश की गई जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पर हाल ही में, हार्माेनिक नामक एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) स्टार्टअप ने इस चुनौती को स्वीकार कर गणित की दुनिया में हलचल मचा दी है। हार्माेनिक ने दावा
किया है कि उसकी एआई तकनीक ‘अरस्तू’ ने ओपनएआई की नवीनतम तकनीक ‘जीपीटी-5.2 प्रो’ के साथ मिलकर ‘एर्डोस समस्या’ का समाधान खोज लिया है।
कंप्यूटर वैज्ञानिकों और गणितज्ञों के लिए एडॉस समस्या का समाधान इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि एआई अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां वह वास्तविक शैक्षणिक शोध करने में भी सक्षम है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर टेरेंस ताओ ने कहा कि एआई मुझे एक ऐसे चतुर छात्र की तरह लगता है, जिसने परीक्षा के लिए सब कुछ रट लिया है, पर उसे अवधारणा की गहरी समझ ही नहीं है। इसके पास पृष्ठभूमि की इतनी अधिक जानकारी रहती है कि यह वास्तविक समझ होने का ढोंग कर सकता है। इस बहस ने तकनीक की दुनिया में एआई की प्रगति के बीच दो शाश्वत सवालों को फिर से जिंदा कर दिया है कि क्या एआई ने वास्तव में कुछ मौलिक व विलक्षण कर दिखाया है? या उसने केवल उस बुद्धिमत्ता को दोहराया है, जो पहले ही प्रतिभावान मनुष्यों द्वारा रची जा चुकी थी? इन सवालों के उत्तर ही यह तय करेंगे कि एआई आने वाले समय में विज्ञान और अन्य क्षेत्रों की तस्वीर किस तरह बदलेगा।

जैक्सन लेबोरेटरी के प्रोफेसर डॉ. डेरिया उनुतमाज का मानना है कि आधुनिक एआई प्रणालियां अब उस स्तर पर पहुंच चुकीं हैं, जहां वे ऐसी परिकल्पनाएं या प्रयोग सुझा सकती हैं, जिन पर उन्होंने या उनके साथियों ने पहले कभी विचार तक नहीं किया था। जीपीटी 5 की गणितीय क्षमताओं को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चाओं का बाजार तब गर्म हुआ, जब बीते अक्तूबर में ओपनएआई के केविन वेइल ने यह दावा किया कि उनकी तकनीक ने गणित की कई पेचीदा ‘एर्डोस समस्याओं’ को हल कर दिया है। दरअसल, ये समस्याएं ऐसे जटिल अनुमान या प्रश्न होते हैं, जो गणितीय क्षेत्र की सीमाओं को चुनौती देते हैं और जिनका लक्ष्य किसी अवधारणा को सही या गलत साबित करना होता है। वेइल ने दावा किया था कि जीपीटी-5 ने ऐसी 10 पहेलियों को सुलझाने में सफलता पाई है, जो दशकों से दुनिया भर के विद्वानों के लिए चुनौती बनी हुई थीं। वहीं, मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के गणितज्ञ थॉमस ब्लूम ने स्वीकार किया कि एआई ने एक ऐसा शोध पत्र ढूंढ निकाला, जिसे खोजना उनके लिए नामुमकिन था।
करीब 18 महीने पहले, ओपनएआई और गूगल जैसी कंपनियों ने ‘रिइन्फोर्समेंट लर्निंग’ नामक तकनीक के माध्यम से अपने सिस्टम को निखारना शुरू किया। इस प्रक्रिया में एआई व्यापक ‘ट्रायल एंड एरर’ (प्रयास और त्रुटि) की प्रक्रिया के माध्यम से व्यवहार करना सीखता है। इसका परिणाम यह निकला कि ये सिस्टम अब गणित, विज्ञान और कंप्यूटर प्रोग्रामिंग जैसे क्षेत्रों में समस्याओं का तार्किक समाधान ढूंढने में सक्षम हो गए हैं। इसी कड़ी में ब्रिटेन के दो गणितज्ञों, केविन बैरेटो और लियाम प्राइस ने जीपीटी-5 का उपयोग कर एक ऐसी समस्या को हल कर दिया, जो अब तक अनसुलझी थी। इसके बाद उन्होंने हार्माेनिक के एआई सिस्टम ‘अरस्तू’ का उपयोग करके उस समाधान की पुष्टि की। जीपीटी-5 के विपरीत, अरस्तू एक विशिष्ट कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा का उपयोग करके यह प्रमाणित करता है कि उत्तर सही है या गलत।

हालांकि, जहां कुछ विशेषज्ञ इन एआई प्रणालियों के प्रदर्शन की सराहना कर रहे हैं, वहीं अन्य उतने उत्साहित नहीं हैं। इस संदर्भ में डॉ. ताओ का कहना है कि यह समाधान उन पद्धतियों पर आधारित था, जो पहले से ही व्यापक रूप से ज्ञात थीं। डॉ. ब्लूम इस प्रगति से प्रभावित तो दिखे, पर उन्होंने एक जरूरी प्रश्न भी उठाया कि अभी तक कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिला है कि एआई ऐसे मौलिक विचार पैदा कर सकता है, जो मानव मस्तिष्क की कल्पना से परे हों।
फोटोरूम
यह एक एआई आधारित एप व वेब टूल है, जो पूरी तरह स्वचालित बैकग्राउंड रिमूवल की सुविधा देता है। इससे मैन्युअल एडिटिंग की जरूरत बहुत कम हो जाती है। इसमें बैकग्राउंड को सॉलिड कलर, कस्टम इमेज या एआई से बनाए गए नए दृश्य में बदला जा सकता है। यह एकसाथ कई फोटो पर काम करने यानी बैच प्रोसेसिंग को सपोर्ट करता है, जो बड़े उत्पाद सूची के लिए फायदेमंद है। इसके अलावा, बड़े बिजनेस और वेबसाइट्स के लिए इसका एपीआई भी उपलब्ध है, जिससे फोटोरूम को सीधे अपने सिस्टम से जोड़ा जा सकता है। यह ‘बिना किसी आधुनिक कौशल’ के पेशेवराना अंदाज में दिखने वाली तस्वीरें तैयार करता है।
बावजूद इसके, वैज्ञानिकों का मानना है कि एआई एक शक्तिशाली और तेजी से विकसित होता शोध उपकरण बन चुका है। हालांकि, डॉ. उत्तमाज यह भी स्वीकार करते हैं कि एक मानवीय सहयोगी के बिना यह मशीन अधूरी है। आज भी एक अनुभवी शोधकर्ता की आवश्यकता है, जो एआई को निर्देश दे सके, उसे समझा सके कि उसे क्या खोजना है और परोसी गई सूचनाओं के अंबार में से सही जानकारी को अलग कर सके।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
