दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनता भारत      Publish Date : 22/02/2026

दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनता भारत

                                                                                    प्रोफेसर आर एस सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

भारत सरकार ने दलहन आत्मनिर्भरता मिशन (2025-26 से 2030-31) के तहत ₹11,440 करोड़ के बजट के साथ दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य रखा है। इसका उद्देश्य 2030-31 तक उत्पादन को 350 लाख टन तक पहुँचाना और किसानों के लिए तुअर, उड़द व मसूर की 100% खरीद सुनिश्चित कर आयात पर निर्भरता कम करना है।

दलहन आत्मनिर्भरता की मुख्य बातें:

लक्ष्य: 2030-31 तक 350 लाख टन दलहन उत्पादन और 310 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र।

रणनीति: ‘‘बीज से बाजार तक” (Seed to Market) दृष्टिकोण, क्लस्टर-आधारित खेती, और उच्च उपज वाली किस्मों का उपयोग।

किसान सहायता: 88 लाख मुफ्त बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों का वितरण।

खरीद गारंटी: 4 वर्षों तक नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) द्वारा एमएसपी (MSP) पर 100% खरीद।

प्रभाव: लगभग 2 करोड़ किसानों को लाभ, विदेशी मुद्रा की बचत और कृषि में सुधार।

यह मिशन न केवल भारत को दालों के आयात से मुक्त करेगा, बल्कि ग्रामीण समृद्धि और पोषण सुरक्षा को भी मजबूत करेगा।

यह कोई छिपा सत्य नहीं है कि विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश भारत है। यहां करीब 280 लाख टन दलहन का उत्पादन होता है, जो वैश्विक उत्पादन का करीब 25 फीसदी है। जिस तरह से भारत दाल के उत्पादन में आगे बढ़ रहा है, उसी का नतीजा है कि अब सरकार ने दलहन में 'आत्मनिर्भरता मिशन' की शुरुआत की है, ताकि 2030-31 तक दालों का उत्पादन 350 लाख टन किया जा सके।

ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हम दालों के बड़े उपभोक्ता भी हैं। इतना ही नहीं, न्यूनतम समर्थन मूल्य, यानी एमएसपी पर शत-प्रतिशत खरीदारी सुनिश्चित करने पर भी सरकार जोर दे रही है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके। दालों की सरकारी खरीद का गणित जो लोग नहीं जानते, उनको बता दें कि देश में पहले गेहूं और धान की खरीद तो एमएसपी पर होती थी, लेकिन दलहन व तिलहन के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं थी, पर केंद्र सरकार ने किसानों को आय समर्थन देने के लिए दलहन व तिलहन को एमएसपी पर खरीदने की व्यवस्था की। नतीजतन, बीते आठ वर्षों में दलहन की 75 फीसदी तक उपज सरकारी मूल्यों पर खरीदी जा रही है, जिसका लाभ किसान पा रहे हैं।

                          

सरकारों का यह समझना भी सुखद है कि दालें केवल कृषि उत्पाद नहीं हैं, बल्कि पोषण सुरक्षा, मृदा स्वास्थ्य और ग्रामीण आजीविका की आधार भी हैं। इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्तूबर, 2025 को 11,440 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन के साथ दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत की। इसका लक्ष्य दाल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती के क्षेत्र को 310 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना भी है। इसका एक मकसद यह भी है कि चार वर्षों तक एमएसपी पर तुअर, उड़द और मसूर की शत-प्रतिशतखरीद सुनिश्चित हो।

इसके लिए किसानों के बीच कुल 88 लाख निःशुल्क बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज बांटने की व्यवस्था की गई है। यह सब इसीलिए किया जा रहा है, क्योंकि सरकारें दाल उत्पादन की जरूरत और किसानों की आवश्यकता, दोनों को बखूबी समझ रही हैं। यह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ते भारत का संकेत है।

ऐसे में, यह कहना गलत होगा कि दालों के उत्पादन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। अलबत्ता, पहले से कहीं अधिक गंभीरता दिख रही है। उम्मीद यही है कि जिस तरह से काम किए जा रहे हैं, जल्द ही हम दलहन के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाएंगे। इससे न सिर्फ किसानों को लाभ मिलेगा, बल्कि आम आदमी के पोषण पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।