डिजिटल सुरक्षा को बनाना होगा 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का अनिवार्य अंग      Publish Date : 19/02/2026

डिजिटल सुरक्षा को बनाना होगा 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का अनिवार्य अंग

                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं इंजीनियर कार्तिकेय

हाल में दुनिया भर के डिजिटल ढांचे को हिला देने वाली घटनाओं की एक श्रृंखला ने हमारी सभ्यता के सबसे बड़े नवाचार (क्लाउड कंप्यूटिंग) की अंतर्निहित कमजोरियों को उजागर किया है।

अमरीका और यूरोप की प्रमुख क्लाउड सेवाओं में आई अचानक गड़बड़ियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक पल में रोक दिया। हजारों वेबसाइट, एयरलाइंस के रियल-टाइम नेटवर्क, बैंकिंग प्लेटफॉर्म, यहां तक कि अस्पतालों के डिजिटल सिस्टम और कई सरकारी पोर्टल्स घंटों तक निष्क्रिय रहे। यह केवल एक तकनीकी रुकावट नहीं थी, बल्कि यह आने वाले डिजिटल युग के लिए एक गहरी मूक चेतावनी थी। भारत भी इन घटनाओं से अछूता नहीं हैं। हम दुनिया की तेजी से डिजिटल हो रही अर्थव्यवस्थाओं में अग्रणी हैं, जो इस खतरे से अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित हो सकते है। यही कारण है कि क्लाउड आउटेज की ये घटनाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम एक ऐसे डिजिटल भविष्य के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है, जहां तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर स्वयं सबसे बड़ी और अप्रत्याशित चुनौती बन सकती है।

                             

आज दुनिया की करीब 80 प्रतिशत डिजिटल सेवाएं और डेटा केवल तीन या चार वैश्विक निगमों के सर्वर जैसे अमेजन (एडब्ल्यूएस), गूगल (जीसीपी) और माइक्रोसॉफ्ट (ऐशर) व क्लाउडफ्लेर नेटवर्क प्रदाता पर निर्भर हैं।

साइबर हमले का स्वरूप मौलिक रूप से बदल गया है। पहले साइबर हमले वेबसाइटों या व्यक्तिगत सर्वरों को निशाना बनाते थे। आज हमलों का लक्ष्य पूरी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर है। रूस-यूक्रेन और इजरायल-हमास संघर्षों के दौरान दुनिया ने देखा कि डिजिटल युद्ध कैसे रियल-टाइम जंग का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। यह सिद्ध हो चुका है कि डिजिटल हमला अब केवल जासूसी या डेटा चोरी तक सीमित नहीं रहा। इसका उद्देश्य दुश्मन राष्ट्र के महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को निष्क्रिय करना भी है।

भविष्य में भारत पर भी युद्ध या हमला जमीन की जगह, डेटा और क्लाउड नेटवर्क पर होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। भारत की आर्थिक स्थिरता, सामरिक संचार, बिजली ग्रिड, ट्रैफिक नियंत्रण, रक्षा उत्पादन, उपग्रह प्रबंधन, ये सब डिजिटल नेटवर्क और क्लाउड से जुड़े हैं। इन पर किया गया एक सफल क्लाउड हमला, देश की आपूर्ति श्रृंखला, वित्तीय बाजारों और सैन्य संचार को एक साथ निष्क्रिय कर सकता है, जिससे राष्ट्रीय प्रतिक्रिया क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। ऐसे में क्लाउड आउटेज या क्लाउड पर हमला अब केवल तकनीकी जोखिम नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भारी और अप्रत्याशित खतरा है।

                              

क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर को अब राष्ट्रीय सुरक्षा परिसंपत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत को प्राथमिकता के आधार परयह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी महत्वपूर्ण सेवाएं केवल एक या दो विदेशी क्लाउड कंपनियों पर निर्भर न हों। मल्टी क्लाउड मॉडल और हाइब्रिड क्लाउड रणनीतियां भविष्य में अनिवार्य होंगी। दूसरा महत्वपूर्ण कदम है सॉवरेन क्लाउड नेटवर्क, जैसे हम अपनी ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा की रक्षा करते हैं, वैसे ही डिजिटल सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य अंग बनाना होगा। घरेलू सॉवरेन क्लाउड नेटवर्क में निवेश बढ़ाना होगा।

तीसरा कदम है विशेषज्ञ मानव संसाधन का निर्माण, भारत को तत्काल पांच से सात लाख उच्च-स्तरीय साइबर विशेषज्ञों की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों में साइबर सुरक्षा और डेटा सुरक्षा को मुख्य विषय बनाना और सरकारी-निजी भागीदारी से विशिष्ट कौशल विकास कार्यक्रम चलाना होगा। चौथा कदम एआइ सुरक्षा और मानक है। एआइ आधारित क्लाउड सिस्टम में त्रुटि या हैकिंग का प्रभाव वैश्विक होगा। इस क्षेत्र में भारता को स्वदेशी शोध, मानक विकसित करने और नियामक उपाय स्थापित करने होंगे। डिजिटल सुरक्षा केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्तरदायित्व है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।