
गन्ने के स्थान पर मक्का की खेती को अपनाने के लाभ Publish Date : 16/02/2026
गन्ने के स्थान पर मक्का की खेती को अपनाने के लाभ
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
1. गन्ने में फंसता है, किसान का पैसा जबकि मक्का में तुरन्त नकद पैसा मिलता है।
गन्ने की फसल में फसल भुगतान
चीनी मिलें 6-12 महीने के बाद गन्ने का भुगतान करती हैं।
मक्का की फसल में भुगतान
मंडी में मात्र 48 घंटे के अन्दर नकद भुगतान किया जाता है।
गन्ने में किसान बिना ब्याज के मिलों को गन्ना देता है, जबकि मक्का में पैसा तुरंत किसान के हाथ में आ जाता है।
2. गन्ने की खेती = घाटे की खेती

खर्च (प्रति एकड़) अधिकः मक्का की तुलना में गन्ने में लागत तीन गुना अधिक लगानी पड़ती है।
मक्का की एक वर्ष में तीन फसलें ली जा सकती हैं।
3. पानी की भारी बचत
पश्चिमी यूपी का भूजल गन्ने की खेती ने लगभग खत्म कर दिया है।
4. मक्का का बाज़ार दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है।
मक्का की मांगः
पोल्ट्री फीड
डेयरी फीड
एथनॉल (बायोफ्यूल)
कॉर्नफ्लेक्स, स्टार्च, बेबी कॉर्न
मक्का अब भविष्य की फसल है।
5. मक्का से ज्यादा मुनाफा

औसतनः
उत्पादनः 25-30 क्विंटल/एकड़
मक्का का एमएसपीः लगभग ₹2200/क्विंटल तक।
जबकि गन्ने में:
एक साल बाद फसल आती है।
गन्ने में शुद्ध बचत मुश्किल से ₹10-15 हजार रूपये प्रति एकड़।
6. मक्का की खेती से किसान आत्मनिर्भर बनता है।
जबकि गन्ने में → किसान चीनी मिल पर निर्भर रहता है।
मक्का → खुला बाजार
कोई मिल का चक्कर नहीं
कोई बकाया नहीं
कोई आंदोलन नहीं
निष्कर्ष
गन्ना किसान को कर्जदार बनाता है, जबकि मक्का किसान को व्यापारी बनाता है। अगर किसान अपनी जमीन, पानी और भविष्य बचाना चाहता है तो उसे गन्ने की खेती के मोह से बाहर से निकलकर मक्का अपनाना ही समझदारी है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
