
धरती की खिसकती प्लेटों की चालः जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण Publish Date : 10/02/2026
धरती की खिसकती प्लेटों की चालः जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य
- वैज्ञानिकों ने महासागरीय प्लेटों और वायुमंडल के बीच होने वाले कार्बन के आदान-प्रदान पर रखी करीबी नजर
पृथ्वी के आज तक के इतिहास में जलवायु ने कई बार अत्याधिक ठंड़े आइसहाउस से लेकर बेहद गर्म ग्रीन हाउस तक की अवस्थाओं की यात्रा को तय किया है। अब तक वैज्ञानिक इन परिवर्तनों को मुख्य रूप से वायुमंडलीय कार्बन डाई-ऑक्साइड के उतार-चढ़ाव को जोड़ते रहे हैं, परन्तु हाल में सामने आया एक अध्ययन बताता है कि इस कार्बन का स्रोत और उसको नियंत्रित करने वाली शक्ति कहीं अधिक जटिल है।
धरती की सतह के नीचे खिसकती टेक्टोनिक प्लेटें जलवायु परिवर्तन में पहले कहीं अधिक बड़ी भूमिका निभा रही हैं। विशेष रूप से वह स्थान जहाँ यह प्लेटें अलग होती हैं। जर्नल कम्युनिकेशन, अर्थ एंड एनवायरमेन्ट में प्रकाशित इस नए शोध में वैज्ञानिकों ने बताया है कि पृथ्वी की टेक्टोनिक्स प्लेटों ने गत 540 मिलियन वर्षों में वैश्विक जलवायु को किस प्रकार का आकार प्रदान किया है। अध्ययन के अनुसासर कार्बन केवल वहीं नहीं निकलता है जहाँ टैक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराती हैं, बल्कि यह ऐसे क्षेत्रों में भी एक बड़ी भूमिका निभाता है जहाँ प्लेटें एक-दूसरे से दूर खिसकती हैं। जहाँ टेक्टोनिक प्लेटें आपस में मिलती हैं, वहाँ ज्वालामुखियों की कतारें बनती हैं, जिन्हें ज्वालामुखीय चॉप कहते हैं। इन ज्वालामुखियों से जुड़ी पिघलन प्रक्रिया चट्टानों में लम्बे समय से बन्द कार्बन को मुक्त कर वायुमंड़ल में छोड़ती हैं। शोध के अनुसार ऐसे क्षेत्र जहाँ टेक्टोनिक प्लेटें फैलती हैं भूगर्भीय समय में पृथ्वी के कार्बन चक्र को चलाने में कहीं अधिक महत्वपूर्ण कारक रहे हैं।
समुद्र की तलछट की है महल्वपूर्ण भूमिका

उक्त मॉडलों की सहायता से शोधकर्ताओं ने पिछले 540 मिलियन वर्षों में पृथ्वी के प्रमुख ग्रीन हाउस एवं आइस हाउस कालखंड़ों के बारे में भविष्यवाणी की है।
ग्रीनहाउस के दौर में जब पृथ्वी अत्याधिक गर्म थी कार्बन का उत्सर्जन, उसके अवशोषण से भी अधिक रहा है।
इसके विपरीत आइस हाउस काल के दौरान महासागरों के द्वारा कार्बन को तलछट में कैद करने की प्रक्रिया हावी रही, जिससे वायुमंडलीय कार्बन डाई-ऑक्साइड का स्तर कम हुआ है और वैश्विक ठंड़ बढ़ी है।
समुद्री सूक्ष्म जीवों ने कार्बन उत्सर्जन पर प्रभाव
इतिहास में ज्वालामुखीय चापों से निकलने वाले कार्बन को सबसे बड़ा स्रोत माना गया है, परन्तु शोध बताता है कि यह भूमिका मुख्य रूप से पिछले 120 मिलियन वर्षों में ही प्रमुख रूप से हुई है। इस घटना का प्रमुख कारण लैक्टिक कैल्सिफायर्स नामक एक समुद्री सूक्ष्म जीव है, जो घुले हुए कार्बन को केल्साइट में परिवर्तित कर समुद्र के तम पर जमा कर देते हैं। यह जीव लगभग 200 मिलियन वर्ष पूर्व विकसित हुए थे और करीब 150 मिलियन वर्ष पहले महासागरों में व्यापक रूप से फैल गए थे। इन्हीं जीवों के कारण बाद के काल में ज्वालामुखीय चॉपों से निकलने वाला कार्बन अधिक दिखाई देता है। इससे पहले, मध्य-सागरीय रिज और महाद्वीपीय दरारों से निकलने वाला कार्बन वायुमुड़ल पर अधिक प्रभाव छोड़ता था।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
