
सहकारिता से आत्मनिर्भर भारत की नई कृषि यात्रा Publish Date : 09/02/2026
सहकारिता से आत्मनिर्भर भारत की नई कृषि यात्रा
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
किसान केवल मेहनतकश नहीं है। बल्कि वह सहकारिता की परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। दूध समितियों से लेकर बीज और विपणन तक, किसानों ने जब-जब संगठित होकर काम किया है, उन्होंने बाजार की ताकत को चुनौती दी है। बजट 2026-27 इसी भरोसे को और मजबूत करता है। यह इस बात का संकेत देता है कि भारत की कृषि अब व्यक्तिगत नहीं, समूह की ताकत से आगे बढ़ेगी।
'भारत-विस्तार' जैसी पहल केवल किसान को जानकारी नहीं देगी, बल्कि सहकारी संस्थाओं को ज्ञान और डाटा की ताकत प्रदान करेगी। जब एक ही इलाके के किसान, एफपीओ, सहकारी समिति और स्वयं सहायता समूहं एक साझा डिजिटल मंच पर जुड़ेंगे, तो निर्णय व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक होंगे। इससे लागत घटेगी, उत्पादन सुधरेगा, और सौदेबाजी की ताकत बढ़ेगी।

पशुपालन में प्रस्तावित पशु चिकित्सा ढांचे का विस्तार भी सहकारिता को नई ऊर्जा देगा। दुग्ध सहकारी समितियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, डायग्नोस्टिक सुविधाएं और प्रजनन केंद्र मिलेंगे। इससे दूध उत्पादन बढ़ेगा, उसकी गुणवत्ता सुधरेगी और 'अमूल' जैसे ग्रामीण सहकारी माडलको देश के और हिस्सों में दोहराया जा सकेगा। उच्च मूल्य वाली फसलों नारियल, काजू, कोको, चंदन और अखरोट बादाम के लिए प्रस्तावित विशेष कार्यक्रम 'सहकारी वस्तु क्षेत्र' की नींव रख सकते हैं।
'शी-मार्ट' जैसी पहल सहकारिता को सामाजिक ताकत भी देगी। महिला स्वयं सहायता समूह जब सामूहिक रूप से रिटेल और विपणन संभालेंगे, तो गांवों में पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा, स्थानीय बाजार मजबूत होंगे। बजट यह साफ करता है कि भारत का कृषि क्षेत्र सहकार, तकनीक व आत्मनिर्भरता के त्रिकोण पर खड़ा होगा। जब किसान संगठित, ज्ञान से लैस होगा और बाजार में अपनी शर्तों पर उतरेगा, तब 'सहकारी वस्तु क्षेत्र' कोई दूर का सपना नहीं, बल्कि गांव-गांव की हकीकत बनेंगे।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
