
औषधीय पौधों का जटिल रसायन विज्ञान Publish Date : 08/02/2026
औषधीय पौधों का जटिल रसायन विज्ञान
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
हाल के दशकों में, औषधीय पौधों और जैविक प्रणालियों के विश्लेषण हेतु उन्नत तकनीकों की मांग में लगातार वृद्धि हुई है। मेटाबोलोमिक्स एक शक्तिशाली वैज्ञानिक विषय के रूप में उभरा है, जो जैविक अनुसंधान के साथ विश्लेषणात्मक तकनीकों के एकीकरण पर प्रकाश डालता है। जैविक मॉडलों के साथ सुस्थापित विश्लेषणात्मक विधियों का अनुप्रयोग प्राकृतिक उत्पाद रसायनज्ञों के लिए अत्यधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है, जिससे जैव सक्रिय पादप यौगिकों की एक विस्तृत श्रृंखला की खोज संभव हुई है। इस प्रगति ने पारंपरिक पृथक्करण प्रक्रियाओं के स्थान पर तीव्र और कम श्रम-गहन विकल्प प्रदान करके प्राकृतिक उत्पाद अनुसंधान को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया है। मेटाबोलोमिक्स पौधों, सूक्ष्मजीवों, पशुओं और मनुष्यों सहित विविध स्रोतों से प्राप्त मेटाबोलाइट्स के व्यापक विश्लेषण और परिमाणीकरण पर केंद्रित है जो उनकी रासायनिक संरचनाओं और जैविक कार्यों के बारे में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
प्राकृतिक उत्पाद अनुसंधान में मेटाबोलोमिक्स के एकीकरण ने इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया है और फाइटोकैमिकल जांच के लिए एक व्यापक ढांचा प्रदान किया है। उन्नत कीमोमेट्रिक तकनीकों के साथ संयुक्त होने पर, मेटाबोलोमिक्स अत्याधुनिक विश्लेषणात्मक प्लेटफार्मों के माध्यम से फाइटोकैमिकल्स का लक्षित और अलक्षित, दोनों प्रकार से पता लगाना संभव बनाता है। यह दृष्टिकोण शोधकर्ताओं को जैविक नमूने के भीतर मेटाबोलाइट स्पेक्ट्रम का एक समग्र अवलोकन प्रदान करता है, जिससे कुशल और उच्च-रिज़ॉल्यूशन प्रोफाइलिंग संभव हो पाती है।

डेटा अधिग्रहण और कम्प्यूटेशनल विश्लेषण में नव प्रगति ने मेटाबोलोमिक्स को वनस्पति उत्पादों के गुणवत्ता नियंत्रण और फाइटोकैमिकल फिंगरप्रिंटिंग में एक आवश्यक उपकरण बना दिया है। अनुसंधान केवल विशिष्ट मेटाबोलाइट्स पर ध्यान केंद्रित करने से अलक्षित मेटाबोलोमिक्स को अपनाने की ओर बढ़ रहा है, जहाँ अधिकतम जानकारी प्राप्त करने के लिए बड़े पैमाने के डेटा को व्यवस्थित रूप से प्रबंधित किया जाता है। यह दृष्टिकोण न केवल विभिन्न शारीरिक स्थितियों में पादप चयापचय को समझने के लिए मूल्यवान है बल्कि किसी भी फेनोटाइपिक परिवर्तन से पहले व्यक्तिगत चिकित्सा के विकास में भी भूमिका निभाता है। रोगी के अद्वितीय चयापचय प्रोफाइल का विश्लेषण करके, मेटाबोलोमिक्स दवा उपचारों के प्रति व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं की भविष्यवाणी करने में सहायक हो सकता है।
मेटाबोलोमिक्स तकनीकों के तेज़ी से विकास ने औषधीय पौधों और पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के प्रति दृष्टिकोण को नाटकीय रूप से बदल दिया है। ये प्रगति जैवसक्रिय घटकों के वैज्ञानिक सत्यापन को सुगम बनाती हैं, जिससे शीघ्र पहचान और लक्षण-निर्धारण संभव होता है। अपनी प्रगति के बावजूद, यह क्षेत्र पादप मेटाबोलोम की जटिलता से जूझ रहा है। मेटाबोलाइट संरचना, प्रचुरता और स्थिरता में व्यापक विविधता किसी भी एक तकनीक का उपयोग करके मेटाबोलोम विश्लेषण को पूर्ण करने के लिए एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करती है। परिणामस्वरूप, 'मेटाबोलोमिक्स' का प्रयोग प्रायः 'मेटाबोलिक प्रोफाइलिंग' के साथ एकांतर रूप से किया जाता है, जो आमतीर पर विशिष्ट मेटाबोलाइट वर्गों पर केंद्रित होता है, क्योंकि अज्ञात यौगिकों की उपस्थिति के कारण वास्तव में व्यापक मेटाबोलाइट पहचान अभी भी दुर्लभ है।
मेटाबोलोमिक्स, किसी नमूने की संपूर्ण उपापचयी संरचना की जाँच के लिए विश्लेषणात्मक रसायन विज्ञान और अभिकलनात्मक विश्लेषण का संयोजन करता है। विश्लेषणात्मक पक्ष में, एलसी-एमएस, यूपीएलसी-एमएस/एमएस, सीई-एमएस (अवाष्पशील उपापचयी पदार्थों के लिए), और जीसी-एमएस जैसी तकनीकों का उपयोग एक साथ पृथक्करण और पहचान के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त, विलयन-अवस्था और ठोस-अवस्था एनएमआर स्पेक्ट्रोस्कोपी (1D और 2D) दोनों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, जिसमें एलसी-एनएमआर उपापचयी पदार्थों के परिमाणीकरण और लक्षण-निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
हमारा शोध समूह हिमालयी औषधीय पौधों, जैसे- एकोनिटम हेटेरोफिलम, अचिरांथेस बिडेंटाटा, फ्रिटिलारिया सिरोसा, नार्दोस्ताचिस जटामांसी, ट्रिलियम गोवनियानम, सिसाम्पेलोस पैरेरा, नार्सिसस टैज़ेटा, रुमेक्स प्रजातियाँ और जैंथोक्सिलम प्रजातियाँ, का अध्ययन करने के लिए हाइफनेटेड और संबंधित विश्लेषणात्मक तकनीकों का उपयोग करता है। अल्ट्रा-परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी-आयन मोबिलिटी-क्याड्डूपोल टाइम-ऑफ-लाइट टैंडम मास स्पेक्ट्रोमेट्री (यूपीएलसी-आईएम- क्यूटीओएफ-एमएस/एमएस) और यूएचपीएलसी- पीडीए/ईएलएसडी) आइसोमेरिक मेटाबोलाइट्स के पृथक्करण, मेटाबोलाइट प्रोफाइलिंग और जटिल फाइटोकैमिकल मिश्रणों के संरचनात्मक लक्षण वर्णन के लिए हमारे कार्य में एक प्रमुख मंच है। इसके साथ ही, यूपीएलसी-क्यूटीओएफ-एमएस/एमएस का उपयोग लक्षित और अलक्षित मेटाबोलाइट विश्लेषण के लिए किया जाता है, जबकि जीसी-एमएस वाष्पशील घटकों और सगंध तेलों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।

यूएचपीएलसी-ईएलएसडी कम यूवी अवशोषण वाले मेटाबोलाइट्स, जैसे स्टेरॉयडल और ट्राइटर्पेनोइडल सैपोनिन, का सटीक परिमाणीकरण संभव बनाता है। पृथक यौगिकों की संरचना को स्पष्ट रूप से समझने के लिए 1D/2D एनएमआर स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, एचपीएलसी यूपीएलसी-यूवी/डीएडी डिटेक्टर का उपयोग सुदृढ़ मानकीकरण और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए किया जाता है। इन हाइफनेटेड तकनीकों का केमोमेट्रिक दृष्टिकोणों के साथ एकीकरण, फाइटोकैमिकल विविधता के गुणात्मक और मात्रात्मक दोनों मूल्यांकन को सक्षम बनाता है और मेटाबोलाइट प्रोफाइल कोजैविक गतिविधियों से भी जोड़ता है। ये एकीकृत विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण हिमालयी औषधीय पौधों की रासायनिक विविधता और जैविक प्रासंगिकता के ठोस प्रमाण प्रदान करके उनके पारंपरिक उपयोग के वैज्ञानिक आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अभिकलनात्मक पक्ष में सांख्यिकीय और बहुभिन्नरूपी उपकरणों के माध्यम से बड़े डेटासेट का प्रबंधन और व्याख्या करना शामिल है। मुख्य घटक विश्लेषण (पीसीए), वैच लर्निंग सेल्फ ऑर्गनाइजिंग मैप्स (बीएल-एसओएम), और विभिन्न विभेदक विश्लेषण विधियों (जैसे, पीएलएस-डीए, ओपीएलएस-डीए) जैसी तकनीकों का उपयोग डेटा की जटिलता को कम करने और रासायनिक पहचान प्रदान करने के लिए किया जाता है।
ये सांख्यिकीय विधियां
डिस्क्रिमिनेशन मानचित्र और स्कोर प्लॉट उत्पन्न करती हैं, जो विश्लेषणात्मक डेटा जैसे एनएमआर में रासायनिक बदलाव या एमएस में द्रव्यमान-से-आवेश अनुपात के साथ सहसंबंधित होते हैं। इसके अलावा, कीमोमेट्रिक उपकरण शोधकर्ताओं को वर्णक्रमीय आंकड़ों को जैविक गतिविधि से सहसंबंधित करके प्रमुख और गौण, दोनों प्रकार के जैवसक्रिय घटकों की पहचान करने में सक्षम बनाते हैं। यह एकीकृत दृष्टिकोण जैवसक्रियता-निर्देशित मेटाबोलाइट खोज को सुगम बनाता है, जिससे रासायनिक प्रोफाइल और औषधीय प्रभावों के बीच संबंधों की गहरी समझ संभव होती है।
संक्षेप में, मेटाबोलोमिक्स एक बहु-विषयक और एकीकृत विज्ञान है जो जैविक प्रणालियों के रासायनिक क्षेत्र का व्यापक रूप से अन्वेषण करने के लिए क्रोमैटोग्राफी, स्पेक्ट्रोस्कोपी, कम्प्यूटेशनल विश्लेषण और जैवपरीक्षणों का सम्मिश्रण करता है जो इसे आधुनिक प्राकृतिक उत्पाद अनुसंधान में एक आधारभूत तकनीक बनाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
