
बदलती जलवायु का आधुनिक कृषि पर दुष्प्रभाव Publish Date : 25/01/2026
बदलती जलवायु का आधुनिक कृषि पर दुष्प्रभाव
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
आज पूरी दुनिया पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हो रहा है। जलवायु में होने वाले यह परिवर्तन ग्लेशियर व आर्कटिक क्षेत्रों से लेकर उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों तक को प्रभावित कर रहे हैं। इसका प्रभाव अलग-अलग रूप में कहीं ज्यादा तो कहीं कम महसूस किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन एक ऐसा कारक है, जिससे प्रभावित होकर कृषि अपना स्वरूप बदल सकती है तथा इस पर निर्भर लोगों की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। जलवायु परिवर्तन से विभिन्न प्रकार के परिवर्तन देखे जा रहे हैं।
बाढ़ का प्रभाव
भारत में मौसम बदलाव के एक प्रमुख प्रभाव के रूप में बाढ़ को देखा जा रहा है। देश का बहत बड़ा क्षेत्र बाढ की विभीषिका को झेलता आ रहा है। प्रन्तु विगत दो दशकों से बाढ़ के स्वरूप, प्रवृत्ति व आवृत्ति में व्यापक परिवर्तन देखा जा रहा है। ऐसे बदलाव के चलते कृषि, स्वास्थ्य, जीवनयापन आदि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। मौसम में हो रहे बदलाव ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया की तीव्रता व स्वरूप को बदल दिया है और बाढ़ की भयावहता आपदा के रूप में दिखाई दे रही है। प्रमुख परिवर्तन इस प्रकार रहे:
- वर्षा के क्रम में परिवर्तन आए हैं। वर्षा के समय, कुल वर्षा, वर्षा की क्रमबद्धता में बदलाव स्पष्ट दिखता है।
- बाढ़ त्वरित रूप में तेज गति से आने लगी है। बांधों के टूटने व अन्य कारणों से आकस्मिक बाढ़ भी आती रहती है।
- छोटी नदियां भी बाढ़ को विकराल करने में सहयोगी बन रही हैं।
- बड़ी झील, ताल, पोखरे आदि की निरंतर कम होती संख्या की वजह से पानी को ठहरने की जगह नहीं मिलती।
सूखा का प्रभाव
मौसम बदलाव का दूसरा प्रमुख प्रभाव सूखा के रूप में देखा जा सकता है। तापमान वृद्धि एवं वाष्पीकरण की दर तीव्र होने के परिणामस्वरूप सूखाग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है। मौसम बदलाव के चलते वर्षा समयानुसार नहीं हो रही है, और उसकी मात्रा में भी कमी आई है। बहुत से क्षेत्र जो पहले उपजाऊ थे, आज बंजर होते चले जा चले हैं, वहां की उत्पादकता समाप्त हो रही है। पेड़-पौधों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। भारत में 1955 से 2000 के बीच करीब 2-3 लाख हेक्टेयर खेती तथा वन भूमि आवासीय उपयोग में आ चुकी है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के अनुसार मात्र एक डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में वृद्धि से भारत में 40 से 50 लाख टन गेहूँ की कम उपज का अनुमान है। यदि जलवायु परिवर्तनों को समय रहते कम करने तथा खाद्यान्न उपलब्धता बढ़ाने हेतु प्रभावी कदम नही उठाए गए तो शहरी गरीबों पर इसका गंभीर असर पड़ेगा और कुपोषित बच्चों की संख्या और भी अधिक बढ़ जाएगी।
जलवायु परिवर्तन का फसलों पर प्रभाव
कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के जो संभावित प्रभाव दिखने वाले हैं, वह मुख्य रूप से दो प्रकार के दिखाई दे सकते हैं। एक तो क्षेत्र आधारित, दूसरा फसल आधारित अर्थात विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न फसलों पर अथवा एक ही क्षेत्र की प्रत्येक फसल पर अलग-अलग प्रभाव पड़ सकता है।
गेहूँ और धान हमारे देश की प्रमुख खाद्य फसलें हैं। इनके उत्पादन पर जलवायु परिवर्तन का बहुत प्रभाव पड़ता है:
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वर्ष |
मौसम |
तापमान वृद्धि (सें.ग्रे.) |
वर्षा में परिवर्तन (प्रतिशत) |
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न्यूनतम |
अधिकतम |
न्यूनतम |
अधिकतम |
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2020 |
रबी |
1.08 |
1.54 |
1.95 |
4.36 |
|
— |
खरीफ |
0.87 |
1.12 |
1.81 |
5.10 |
|
2050 |
रबी |
2.54 |
3.18 |
9.22 |
3.82 |
|
— |
खरीफ |
1.81 |
2.37 |
7.18 |
10.52 |
|
2080 |
रबी |
4.14 |
6.31 |
24.83 |
4.50 |
|
— |
खरीफ |
2.91 |
4.62 |
10.1 |
15.18 |
गेहूँ उत्पादन पर प्रभाव
- अध्ययनों में पाया गया है कि यदि तापमान 2° से.ग्रे. के करीब बढ़ता है तो गेहूँ की उत्पादकता में भारी कमी आएगी। जहाँ उत्पादकतो ज्यादा है (उत्तरी भारत में) वहां कम प्रभाव दिखेगा लेकिन जहां कम उत्पादकता है वहां ज्यादा प्रभाव दिखेगा।
- प्रत्येक 1° से.ग्रे. तापमान बढ़ने पर गेहूँ का उत्पादन 4-5 करोड़ टन कम होता जाएगा। इसके लिए यदि किसान बुआई का समय सही कर लें तो उत्पादन की गिरावट 1-2 टन कम हो सकती है।
धान उत्पादन पर प्रभाव
- हमारे देश में कुल फसल उत्पादन में 42.5 प्रतिशत हिस्सा धान की खेती का है।
- तापमान वृद्धि के साथ-साथ धान के उत्पादन में गिरावट आने लगेगी।
- अनुमान है कि 2° से.ग्रे. तापमान वृद्धि से धान की उत्पादकता 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम हो जाएगी।
- देश का पूर्वी हिस्सा धान उत्पादन से ज्यादा प्रभावित होगा।
- धान वर्षा आधारित फसल है, इसलिए जलवायु परिवर्तन के साथ बाढ़ और सूखे की स्थितियां बढ़ने पर इस फसल का उत्पादन गेहूँ की अपेक्षा ज्यादा प्रभावित होगा।
जलवायु परिवर्तन से केवल फसलों का उत्पादन ही नहीं प्रभावित होगा वरन् उनकी गुणवत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अनाज में पोषक तत्वों और प्रोटीन की कमी पाई जाएगी जिसके कारण संतुलित भोजन लेने पर भी मनुष्यों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा।
जल संसाधन पर प्रभाव
पृथ्वी पर इस समय 140 करोड़ घन मीटर जल है। इसका 97 प्रतिशत भाग खारा पानी है, जो कि समुद्र में स्थित है। मनुष्य के हिस्से में कुल 136 हजार घन मीटर जल ही बचता है। पूर्व में गाँव के तालाब, पोखरे, कुंओं आदि जलस्तर बनाए रखने में मददगार होते थे। किसान अपने खेतों में अधिक से अधिक वर्षा जल का संचय करता था, ताकि जमीन की आर्द्रता व उपजाऊपन बना रहे। परन्तु अब बिजली से ट्यूबवेल चलाकर और कम दामों में बिजली की उपलब्धता से किसानों ने अपने खेतों में जल का संरक्षण करना छोड़ दिया।
मिट्टी पर प्रभाव
कृषि के अन्य घटकों की तरह मिट्टी भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रही है। रासायनिक खादों के प्रयोग से मिट्टी पहले ही जैविक कार्बन रहित हो रही थी, अब तापमान बढ़ने से मिट्टी की नमी और कार्यक्षमता प्रभावित होगी।
रोग व कीट पर प्रभाव
जलवायु परिवर्तन से कीट व रोगों पर जबरदस्त प्रभाव पड़ता है। तापमान, नमी तथा वातावरण की गैसों से पौधों, फफूँद तथा अन्य रोगाणुओं के प्रजनन में वृद्धि तथा कीटों और उनके प्राकृतिक शत्रुओं के अंतर्संबंध में बदलाव आदि दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे। गर्म जलवायु कीट पंतगों की प्रजनन क्षमता में वृद्धिहेतु सहायक होती है। लम्बे समय तक चलने वाले बसंत, गर्मी व पतझड़ के मौसम में अनेक कीटों की प्रजनन संख्या अपना जीवन रखते हैं। हवा के रूख में बदलाव से हवा-जनित कीटों में वृद्धि पूरा करती है। जाड़ों में में कहीं व छुपकर ये लार्वा को बचाए के साथ-साथ जीवाणुओं और फंगस में भी वृद्धि होती है। इनको नियंत्रित करने के लिए अधिक से अधिक मात्रा में कीटनाशक प्रयोग किए जाएंगे जो अन्य बीमारियों को बढ़ावा देंगे। जानवरों में बीमारियां भी समान रूप से बढ़ेंगी।
जैव विविधता पर प्रभाव
सूखा, लवणता आदि से जमीन की उर्वरता समाप्त होने का असर पेड़-पौधों के स्वास्थ्य अथवा पुनः उगने की क्षमता पर पड़ता है। इनके नष्ट होने से उस क्षेत्र में रहने वाले मनुष्यों व जानवरों पर भारी संकट आ जाता है क्योंकि यह उनके लिए महत्वपूर्ण संसाधन हैं। इससे वहां रहने वालों की गरीबी व खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है।
ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन कैसे कम हो सकता है
कृषि क्षेत्र से होने वाले ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन कम करने का सबसे प्रभावी माध्यम है जैविक खेती। अनेक अध्ययनों व प्रक्षेत्र परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि जैविक कृषि अपनाकर इन नुकसानदायक गैसों के उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है।
- जैविक खेती ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम कर सकती है।
- जैविक खेती मिट्टी में कार्बन को अवशोषित कर सकती है।
उपरोक्त दोनों बिन्दुओं पर जैविक खेती का अनेक क्षेत्रों में परीक्षण किया जा चुका है और आंकड़े बताते हैं कि ऐसा निश्चित तौर पर होता है।
आधुनिक कृषि की तुलना में जैविक खेती से ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम मात्रा में होता है। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र हो या सूखाग्रस्त क्षेत्र, स्थाई या जैविक कृषि से प्रति हेक्टेयर ज्यादा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। विशेषकर यदि पारंपरिक बीजों का इस्तेमाल किया जाए तो और बेहतर परिणाम देखे जा सकते हैं। मिट्टी में कार्बन के एकत्रीकरण को जैविक खेती बहुत हद तक कम कर देती है।
नाइट्रोजन की भूमिका
आधुनिक कृषि में सबसे ज्यादा ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन रासायनिक उर्वरकों द्वारा होता है। विश्व में रासायनिक उर्वरक की खपत 2005 में 90.86 करोड़ टन थी। जबकि इसको तैयार करने में 90 करोड़ टन फॉसिल फ्यूल (डीजल आदि) जलाया गया, जो जलवायु परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैविक खेती, नाइट्रोजन के लिए आत्मनिर्भर हैं अर्थात इसमें पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन की उपलब्धता रहती है। मिश्रित खेती के साथ जानवरों के गोबर से तैयार खाद व फसल अवशेषों से तैयार खाद पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन उत्पन्न करती है। इस प्रकार नाइट्रस ऑक्साइड जैसी खतरनाक गैस के उत्सर्जन को जैविक खेती ही कम कर सकती है, क्योंकि इनके उत्सर्जन का मुख्य स्रोत रासायनिक उर्वरक हैं। विविधतापूर्ण खेती, जैविक खाद, फसल चक्र, हरी खाद और दलहनी फसलें भी नाइट्रस आक्साइड के उत्सर्जन को बहुत कम करने की क्षमता रखती है।
मिथेन का उत्सर्जन
कुल ग्रीनहाऊस गैसों में मिथेन का प्रतिशत 14 है, जिसमें दो तिहाई हिस्सा कृषि द्वारा उत्सर्जित होता है। जैविक अथवा स्थाई कृषि अपनाकर इसके प्रभाव को भी कम किया जा सकता है। जानवरों की देशी प्रजातियां इसमें इसमें बहुत मददगार हैं। विशेषकर दुधारू गायों से व से व जानवरों के छोटे बच्चों से मिथेन का उत्सर्जन कम होता है। जानवरों के गोबर के समुचित उपयोग से भी मिथेन उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है। धान के खेतों से निकलने वाली मिथेन गैस के लिए नई उन्नत प्रजातियां, जिसमें खेत में पानी का जमाव कम करना पड़े, उचित होंगी। कम पानी वाले धान की खेती लाभदायक होगी।
कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन
जैविक खेती, कार्बन को मिट्टी में अवशोषित करती है। मिट्टी के क्षरण से कार्बन का नुकसान होता है, जो सीधे मिट्टी की उत्पादकता पर प्रभाव डालता है। जैविक खादों व खेती की विविधता से मिट्टी में कार्बन का उचित अनुपात बना रहता है। खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से लोगों को अपने खान-पान के तौर-तरीकों में भी बदलाव लाना होगा, जिससे रसायन आधारित खेती में कमी आए और जलवायु परिवर्तन के दृष्टिकोण से कृषि को सुरक्षित किया जा सके।
फसल चक्र व खेत का तंत्र
- फसलों की उन्नतशील किस्मों को बढ़ावा ।
- फसल चक्र में बहुवर्षीय वृक्षों का सामंजस्य।
- पौधों की क्यारियों के बीच जमीन पर फैलने वाली फसलें।
- खेती का आत्मनिर्भर तंत्र विकसित करना।
पोषक तत्व व खाद प्रबंधन
- खेत में नाइट्रोजन को बढ़ाना।
- फसल की आवश्यकता के अनुरूप ही खाद डालना।
- नाइट्रोजन का इस्तेमाल फसल तैयार होने पर तथा मिट्टी की क्षमता के अनुरूप करना।
- ज्यादा नाइट्रोजन का उपयोग न करना।
- जुताई व फसल अवशेषों का प्रबन्धन।
- कम जुताई या जुताई नहीं करना।
खेतों में देशी खाद व नाइट्रोजनजनित पौधे लगाने से मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ती है और नाइट्रोजन का पुनर्चक्रीकरण होता रहता है। अध्ययनों से यह ज्ञात हुआ आ है कि आधुनिक खेती की तुलना में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जैविक खेती में 36% कम होता है। रसायन आधारित खेती में लागत अधिक है और जलवायु परिवर्तन के लिए नुकसान भी अधिक है, जबकि जैविक खेती में लागत भी कम है और नुकसान भी कम है।
पशु प्रबंधन, चरागाह व चारे की उपलब्धता
- प्रजनन व उत्पादकता बढ़ाने हेतु
- दुधारू पशुओं में प्रजनन द्वारा कार्यक्षमता बढ़ाना
- देशी नस्लों को बढ़ावा
- चरागाह में दलहनी फसलें लगाना
- गोबर का उचित प्रबंधन करना (बायोगैस या खाद बनाकर)
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के कुछ उपाय
भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन से होने वाले प्रभावों को कम करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे, जिनमें कुछ मुख्य इस प्रकार हैं:
फसल उत्पादन हेतु नई तकनीकों का विकास
फसलों के सुरक्षित व समुचित उत्पादन हेतु ऐसी किस्मों की खेती को बढ़ावा देना होगा जो नई फसल प्रणाली व नए मौसम के अनुकूल हों। इसके लिए ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा जो अधिक तापमान, सूखा और पानी भराव होने पर भी सफलतापूर्वक उत्पादन कर सके। आने वाले समय में ऐसी किस्मों की जरूरत होगी जो कि उर्वरक और सूर्य-विकिरण उपयोग के मामले में अधिक कुशल हों।
सस्य तकनीकियों में परिवर्तन
नई फसल और नए मौसम के अनुसार हमें बुआई के समय में भी बदलाव लाना होगा, ताकि तापमान का प्रभाव कम हो। मिश्रित खेती व इंटरक्रापिंग अपनाकर जलवायु परिवर्तन से निपटा जा सकता है।
खेतों में जल का संरक्षण
तापमान वृद्धि के साथ-साथ धरती पर मौजूद नमी समाप्त होती जाएगी। ऐसे में खेती के लिए नमी का संरक्षण करना और वर्षा जल को एकत्र कर सिंचाई हेतु वर्षा जल को एकत्र क हेतु उपयोग में लाना आवश्यक होगा। जीरो टिलेज या शून्य जुताई जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर पानी के अभाव से निपटा जा सकता है। शून्य जुताई के कारण धान और गेहूँ गेहूँ की खेती में पानी की मांग में कमी देखी गई है, जबकि उपज में बढ़ोतरी हुई है और उत्पादन लागत 10 प्रतिशत तक कम हो गयी है। इसी प्रकार ऊंची उठी क्यारियों में रोपाई करना भी एक बेहतर तकनीक है, जिसमें पानी के उपयोग की क्षमता बढ़ जाती है। जलभराव कम होता है, खरपतवार कम आते हैं, लागत कम लगती है व लाभ ज्यादा होता है।
समेकित कृषि
आज खेती की सबसे बड़ी मांग यही है। जलवायु परिवर्तन के दृष्टिकोण से खेतों में विविधता तथा फसलों के साथ वृक्षों व जानवरों का संयोजन बहुत मायने रखता है। अध्ययनों में भी यह पाया गया कि जहां समग्रता थी, वहां नुकसान का प्रतिशत कम रहा, जबकि जहां एकल फसलें अथवा केवल पशुओं पर निर्भरता थी, वहां नुकसान ज्यादा हुआ। खेती में समग्रता किसान को आत्मनिर्भर बनाती है, बाजार पर उसकी निर्भरता कम होती है तथा कठिन समय में भी उसकी खाद्य सुरक्षा बनी रहती है। क्योंकि एक अथवा दो गतिविधियों के नुकसान से पूरी प्रक्रिया नष्ट नहीं होती। आज जलवायु परिवर्तन से होने वाले कृषि के नुकसान को कम करने के साथ ही कृषि द्वारा गैसों के उत्सर्जन मैं कमी लाने में भी समेकित कृषि मददगार साबित हो सकती है। इस प्रकार जैविक अथवा स्थायी कृषि को अपनाकर कृषि द्वारा होने वाले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को भी कम किया जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
