
हरी खादः मृदा स्वास्थ्य की एक कुंजी Publish Date : 03/01/2026
हरी खादः मृदा स्वास्थ्य की एक कुंजी
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
वर्तमान समय में फसलों में रासायनिक उर्वरकों का लगातार बढ़ता उपयोग एक गंभीर समस्या है। रासायनिक उर्वरकों पर अधिक निर्भरता के कारण पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है। इसके अलावा मृदा की उर्वरा शक्ति भी लगातार घटती जा रही है। आने वाले समय में यह समस्या और भी अधिक गंभीर हो जाएगी पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण मृदा में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ में लगातार कमी आ रही है तथा हमारी कृषि योग्य भूमि लगातार बंजर होती जा रही है।
ऐसी स्थिति में खेती में रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग एवं सीमित उपलब्धता को देखते हुये अन्य पर्याय भी उपयोग में लाना आवश्यक हो गया है तभी हम खेती की लागत को कम कर फसलों की प्रति एकड़ उपज को भी बढ़ा सकते हैं, साथ ही मिट्टी की उर्वरा शक्ति को भी अगली पीढी के लिए बरकरार रख सकेंगे। रासायनिक उर्वरकों के पर्याय के रुप में हम जैविक खादों जैसे गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद आदि का उपयोग कर सकते हैं। इनमें हरी खाद का प्रयोग सबसे सरल व अच्छा है। इसमें पशुधन में आई कमी के कारण गोबर की उपलब्धता पर भी हमें निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। अतः हमें हरी खाद के यथासंभव उपयोग पर गंभीरता से विचार कर क्रियान्वयन करना चाहिए।
हरी खाद, मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढाने के लिये एवं फसल उत्पादन हेतु जैविक माध्यम से तत्वों की पूर्ति का वह साधन है जिसमें हरी वानस्पतिक सामग्री को उसी खेत में उगाकर या कहीं से लाकर खेत में मिला दिया जाता है। इस प्रक्रिया को ही हरी खाद देना कहते हैं।भारत में हरी खाद देने की प्रक्रिया पर लम्बे समय से चल रहे प्रयोगों व शोध कार्यों से सिद्ध हो चुका है कि हरी खाद का प्रयोग अच्छे फसल उत्पादन के लिये बहुत लाभकारी है। यदि हम अपने खेतों में हरी खाद का प्रयोग करते हैं तो फसल उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण का भी संरक्षण होता है तथा उत्पादन लागत भी कम होगी। .
रासायनिक उर्वरकों द्वारा मृदा को सिर्फ आवश्यक पोषक तत्व जैसे- नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म तत्वों इत्यादि की पूर्ति तो होती है लेकिन मृदा संरचना उसकी जल धारण क्षमता एवं उसमें उपस्थित सूक्ष्मजीवों की क्रियाशीलता बढ़ाने में रासायनिक उर्वरकों का कोई योगदान नहीं होता है। अतः इन सबकी पूर्ति हेतु हरी खाद का प्रयोग खेत के लिए एक संजीवनी बूटी की तरह काम करता है। हरी खाद की फसल उस फसल को कहते हैं जिसकी खेती मुख्यतः भूमि में पोषक तत्वों को बढ़ाने के साथ-साथ उसमें जैविक पदार्थों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। इसके लिए प्रायः दलहनी एवं अदलहनी फसलों को उनकी हरी अवस्था में मिट्टी में मिला दिया जाता है।

इस क्रिया को हरी खाद देना कहते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ने के साथ-साथ जीवाणुओं की मात्रा एवं क्रियाशीलता में भी बढ़ोत्तरी होती है क्योंकि बहुत सी रासायनिक क्रियाएं जो सूक्ष्मजीवों के लिए आवश्यक होती हैं, हरी खाद में उनकी बढ़ोत्तरी होती है।
हरी खाद की विशेषताएँ
- कम समय में ज्यादा जैवभार प्राप्त होता है।
- रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते हुए खर्च को लगभग ₹2,000/- प्रति हेक्टेयर कम करती है।
- खरपतवारों को पनपने नहीं देती है।
- कीट-व्याधियों के लिए संवेदनशील नहीं है।
- ऊसर भूमि में 4-5 साल लगातार लगाने पर भूमि फसल लगाने योग्य हो जाती है।
- मिट्टी में उपस्थित लाभदायक सूक्ष्मजीवों के लिए खाद्य पदार्थ का काम करता है।
हरी खाद के लिए फसल का चयन
हरी खाद के लिए मुख्यतया दलहनी फसलें ही अधिक लाभदायक होती हैं तथा इसके लिए निम्नलिखित गुणों वाली फसलों का चयन करना चाहिए:-
- कम समय में अधिक वृद्धि हो।
- फसल की जल मांग बहुत कम हो।
- जलवायु की विभिन्न परिस्थितियों जैसे अधिक तापमान, कम तापमान, कम या अधिक वर्षा को सहन करने वाली हो।
- कीटों व रोगों से प्रभावित न हों।
- विभिन्न प्रकार की मृदाओं (क्षारीय, लवणीय) में अच्छी बढ़वार हो।
- फसल की जड़ें अधिक गहराई तक पहुँचें तथा वानस्पतिक वृद्धि, शाखायें व पत्तियां मुलायम हों।
- कम समय में मृदा में विघटित हों।
- पोषक तत्वों की मांग कम हो।
हरी खाद के लाभ
- हरी खाद नत्रजन व कार्बनिक पदार्थों के साथ-साथ मिट्टी में कई पोषक तत्व भी उपलब्ध कराती है।
- हरी खाद के प्रयोग से मृदा में वायु संचार, जल धारण क्षमता में वृद्धि, सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता में वृद्धि के साथ-साथ उसकी उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोत्तरी होती है।
- क्षारीय व लवणीय मृदाओं में भी सुधार होता है क्योंकि हरी खाद अपघटन के बाद पी.एच. मान कम करती हैं।
- मृदा में पोषक तत्वों का संरक्षण एवं एकत्रीकरण कर मृदा की अधोसतह में सुधार होता है।
- नत्रजन का स्थिरीकरण एवं मृदा क्षरण में कमी होती है।
- खरपतवार नियंत्रण होता है।
- फसलों के उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करके धन की बचत कर टिकाऊ खेती कर सकते हैं।
- मिट्टी की भौतिक एवं रसायनिक संरचना अच्छी होती है।
- हरी खाद मिट्टी में गहरी जड़ें विकसित करता है जिसके कारण मिट्टी में वायु संचार अच्छा होता है।
- मिट्टी में उपस्थित लाभदायक सूक्ष्मजीवों के लिए यह खाद्य पदार्थ का काम करता है जो इन्हें खाकर बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं जिससे अपघटन तेजी से होता है इसी किया के दौरान जो पोषक तत्व निकलते हैं उससे मृदा के जैविक गुणों में वृद्धि होती है।
- हल्की तथा भारी दोनों प्रकार की मिट्टियों में कार्बनिक पदार्थ वृद्धि से उपज में वृद्धि के साथ-साथ मिट्टी में हयूमस की मात्रा बढ़ने के कारण जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है।
- हरी खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरक के बढ़ते हुएखर्च को कम किया जा सकता है।
- मुख्य फसल के सहयोगी के रूप में यह अन्य साधनों के लिए मुख्य फसल से प्रतियोगिता नहीं करती है।
हरी खाद उगाने की विधि

सिंचित अवस्थाओं में मानसून आने के 35-45 दिन पूर्व या असिंचित अवस्था में मानसून आने के तुरंत बाद खेत की हल्की जुताई करके हरी खाद की फसल बोना चाहिए। हरी खाद बोने के समय 15-20 कि.ग्रा./हे. नत्रजन तथा 40-50 कि.ग्रा./हे. फास्फोरस देना चाहिए।हरी खाद के लिए फसल की बुवाई करते समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है। यदि बरसात न हो तो 15 दिन के अन्तराल पर एक या दो सिंचाई कर देनी चाहिए जिससे फसल की बढ़वार अच्छी हो तथा फसल के वानस्पतिक भाग मुलायम हों।
फसल को खेत में मिलाते समय यह ध्यान रखें कि फसल कुछ अपरिपक्व अवस्था में हो तथा फूल निकलना प्रारम्भ हो गये हों। इस अवस्था में वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है तथा पौधों की शाखायें व पत्तियां मुलायम होती हैं व फसल का कार्बन नाइट्रोजन अनुपात भी कम होता है।
सनई की फसल में 50-55 दिन बाद एवं ढैंचा की फसल में 45 दिन बाद यह अवस्था आती है। फसल को पलटने के लिए मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से पलटकर फसल को मृदा में अच्छी प्रकार मिला देनी चाहिए। इसके बाद खेत में 5-10 दिन तक 4-5 सें.मी. पानी भरा रहना चाहिए जिससे पौधों का अपघटन तेजी से हो।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
