
सरकार की जिम्मेदारी: NBS को न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट से जोड़ना और सभी आवश्यक तत्वों पर सब्सिडी Publish Date : 07/12/2025
सरकार की जिम्मेदारी: NBS को न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट से जोड़ना और सभी आवश्यक तत्वों पर सब्सिडी
डॉ वीरेन्द्र सिंह गहलान
- आज का विचार: सरकार की जिम्मेदारी: NBS को न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट से जोड़ना और सभी आवश्यक तत्वों पर सब्सिडी
भारतीय किसानों की अनसुनी चीख: सरकार की नाकामी और जनता की सेहत का संकट।
परिचय
भारत का किसान, जो देश की आत्मा है, अपने खेतों में खून-पसीना बहाकर अन्न उगाता है, मगर उसकी पुकार सरकार के कानों तक नहीं पहुंचती। आज का किसान केवल परंपरागत ज्ञान से नहीं चल सकता; उसे सस्ते आदान (बीज, उर्वरक, कीटनाशक), फसलों के उचित मूल्य (न्यूनतम समर्थन मूल्य या MSP), मिट्टी की जांच, उर्वरकों का रासायनिक प्रोफाइल, दवाओं और बीजों की गुणवत्ता जांच, और बीज से प्लेट तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला में गुणवत्ता नियंत्रण चाहिए। इसके अलावा, खेतों में पोषक तत्वों (न्यूट्रिएंट्स) की बैलेंस शीट बनाए रखने के लिए फसल उत्पादन के हर स्तर पर सरकारी प्रयोगशालाओं की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) योजना के साथ-साथ न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट किसानों की आजीविका और उपभोक्ताओं की सेहत के लिए अनिवार्य है, क्योंकि यह मिट्टी की उर्वरता, फसल की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करता है। मगर सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह नाकाम रही है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की विफलता इसका जीता-जागता सबूत है। यह निबंध किसानों की आजीविका और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से उनकी जायज मांगों को सामाजिक, तकनीकी और वैज्ञानिक नजरिए से गहराई से उजागर करता है, और 2025 की नीतियों में सरकार की घोर लापरवाही को बेनकाब करता है।
सामाजिक दृष्टिकोण
किसान भारत का अन्नदाता है, मगर सामाजिक रूप से वह उपेक्षा, आर्थिक तंगी और कर्ज के जाल में फंसा है। जीवन यापन के लिए उसे सस्ते बीज, उर्वरक और कीटनाशक चाहिए, ताकि वह अपने परिवार का पेट पाल सके। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) उसका हक है, जो उसे बाजार के लुटेरों से बचाए। 2025-26 में सरकार ने खरीफ फसलों के MSP में मामूली बढ़ोतरी की, जैसे धान के लिए ₹2,300 प्रति क्विंटल से अधिक, लेकिन यह किसान की लागत भी पूरी नहीं करता। किसान MSP की कानूनी गारंटी मांगता है, मगर सरकार बिचौलियों के सामने घुटने टेक रही है।
न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) योजना कागजों पर उर्वरकों को सस्ता करने का ढोंग करती है, लेकिन भ्रष्टाचार और असमान वितरण ने इसे छोटे किसानों, खासकर महिलाओं और दलित-आदिवासी किसानों के लिए बेकार बना दिया। स्वास्थ्य की दृष्टि से, न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट का अभाव उपभोक्ताओं को कुपोषण की ओर धकेल रहा है, क्योंकि असंतुलित उर्वरक उपयोग से फसलों की पौष्टिकता घट रही है।
सरकार का यह पवित्र दायित्व था कि वह NBS को प्रभावी बनाए और न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट को लागू करे, ताकि किसान की आय स्थिर हो और जनता को पौष्टिक भोजन मिले। मगर सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता ने किसानों को कर्ज के दलदल में धकेल दिया, जिससे आत्महत्याएं बढ़ रही हैं।
2025 के बजट में किसान क्रेडिट कार्ड और ऋण माफी योजनाओं का ढोल पीटा गया, लेकिन ये कागजी शेर साबित हुए। यह सरकार की घोर विफलता है, जो सामाजिक अन्याय को बढ़ावा देती है, किसानों की आजीविका छीनती है और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को खतरे में डालती है। किसान चीखता है: जब हम देश का पेट भरते हैं, तो सरकार हमारी और जनता की सेहत की चिंता क्यों नहीं करती?
तकनीकी दृष्टिकोण
किसान तकनीक को गले लगाने को तैयार है, बशर्ते वह उसकी जेब और जरूरतों के अनुकूल हो। मिट्टी की जांच, उर्वरकों का रासायनिक प्रोफाइल, और बीज-दवाओं की गुणवत्ता जांच जैसी सुविधाएं हर गांव तक पहुंचनी चाहिए। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, जो मिट्टी के पोषक तत्वों की जानकारी देने का वादा करती थी, पूरी तरह फ्लॉप रही।
जांच तो हुई, लेकिन कार्ड्स बंटे नहीं, और किसानों को प्रशिक्षण या सहायता का नामोनिशान नहीं मिला। नतीजा? किसान अब भी अंदाजे से उर्वरक डालता है, जिससे मिट्टी बंजर हो रही है और फसलों की पौष्टिकता घट रही है, जो उपभोक्ताओं के लिए कुपोषण का संकट पैदा कर रहा है।
न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट को लागू करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, जैसे मोबाइल ऐप्स और ड्रोन-आधारित मॉनिटरिंग, जरूरी हैं। 2025 में ड्रोन और सैटेलाइट इमेजिंग का शोर तो है, मगर ग्रामीण इंटरनेट और प्रशिक्षण की कमी ने किसानों को इससे महरूम रखा। बीजों की जांच के लिए योजनाएं हाइब्रिड बीजों पर सब्सिडी देती हैं, लेकिन नकली बीजों का काला बाजार खुलेआम फल-फूल रहा है। ब्लॉकचेन तकनीक से बीज से प्लेट तक की आपूर्ति श्रृंखला पारदर्शी हो सकती है, मगर सरकार की ढिलाई ने इसे सपना बना दिया।
सरकार का कर्तव्य था कि वह डिजिटल इंडिया को कृषि से जोड़कर तकनीकी असमानता खत्म करे, ताकि किसान अपनी आजीविका सुधार सके और उपभोक्ता सुरक्षित, पौष्टिक भोजन पाए। लेकिन सरकार की लापरवाही ने किसानों को निराश किया और जनता की सेहत को जोखिम में डाला।
किसान गुस्से में पूछता है: हमें ऐसी तकनीक चाहिए जो हमारी मेहनत को फल दे और जनता को स्वस्थ भोजन दे, तो सरकार का ढोंग कब तक?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, किसान चाहता है कि उसकी मिट्टी और फसलें स्वस्थ रहें, ताकि उसकी आजीविका बचे और उपभोक्ताओं को पौष्टिक भोजन मिले। मिट्टी की जांच से नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम और सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे जिंक, आयरन) का पता चलता है, जो उर्वरकों के सही उपयोग में मदद करता है। न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट एक वैज्ञानिक हथियार है, जो मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और अतिरिक्तता का हिसाब रखता है, जिससे किसान को सही उर्वरक उपयोग की सलाह मिलती है। यह मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखता है, किसानों की आय को स्थिर करता है, और फसलों की पौष्टिकता बढ़ाकर उपभोक्ताओं की सेहत को बचाता है।
सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से फसलों की पौष्टिकता घटती है, जिससे उपभोक्ताओं में कुपोषण का खतरा बढ़ता है। सॉइल टेस्टिंग लैब्स और मोबाइल सॉइल टेस्टिंग लैब्स के तहत सॉइल हेल्थ मैनेजमेंट योजना मिट्टी की उर्वरता का ढोंग करती है, मगर मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की नाकामी ने इन लैब्स को बेकार साबित किया। NBS योजना उर्वरकों के संतुलित उपयोग का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह बेअसर है। सरकार का कर्तव्य था कि वह सरकारी प्रयोगशालाओं को मजबूत करे और न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट को हर खेत तक पहुंचाए, मगर नकली उर्वरकों और कीटनाशकों का काला बाजार रोकने में उसकी नाकामी ने मिट्टी और फसलों को बर्बाद कर दिया।
बीजों की जांच, जीएमओ टेस्टिंग, और कीटनाशक अवशेषों की जांच खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन सरकारी प्रयोगशालाएं इस मांग को पूरा करने में असमर्थ हैं। बीज से प्लेट तक गुणवत्ता जांच में FSSAI मानक और ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन जैसे प्रोटोकॉल कागजों तक सीमित हैं। 2025 के बजट में उर्वरक सब्सिडी का भारी-भरकम आंकड़ा है, मगर वैज्ञानिक अनुसंधान में निवेश की कमी और सरकारी प्रयोगशालाओं की निष्क्रियता ने बायोटेक्नोलॉजी बीज और न्यूट्रिएंट प्रबंधन को किसानों से दूर रखा।
जलवायु परिवर्तन के दौर में, रेजिलिएंट फसलें विकसित करना जरूरी है, जो न्यूट्रिएंट बैलेंस के साथ किसानों की आय और उपभोक्ताओं की सेहत को बचाए। सरकार की यह घोर नाकामी किसानों की आजीविका और जनता की सेहत को संकट में डाल रही है। किसान चीखता है: जब हमारी मिट्टी मर रही है और जनता कुपोषण का शिकार हो रही है, तो सरकार अपनी जिम्मेदारी से क्यों भाग रही है?
निष्कर्ष
किसान की चीख साफ है: उसे सस्ते आदान, उचित मूल्य, और वैज्ञानिक जांच चाहिए, जो उसकी आजीविका को बचाए और जनता को पौष्टिक भोजन दे। न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट और NBS योजना मिट्टी की उर्वरता और खाद्य गुणवत्ता को सुनिश्चित कर सकती थी, मगर मृदा स्वास्थ्य कार्ड की नाकामी और सरकार की लापरवाही ने किसानों और उपभोक्ताओं का भरोसा तोड़ दिया। सरकार का कर्तव्य था कि वह MSP को कानूनी गारंटी दे, डिजिटल और वैज्ञानिक सुविधाएं गांवों तक पहुंचाए, सरकारी प्रयोगशालाओं को न्यूट्रिएंट बैलेंस शीट के लिए सक्रिय करे, और नकली आदानों पर लगाम लगाए।
मगर उसकी ढिलाई ने किसानों को कर्ज और आत्महत्याओं के रास्ते पर धकेल दिया, और उपभोक्ताओं को कुपोषण की मार झेलने को मजबूर किया। किसान गर्जना करता है: हम देश को खिलाते हैं, अब सरकार हमारी और जनता की सुन ले, वरना यह अनसुनी चीख सड़कों पर गूंजेगी, और देश की खाद्य सुरक्षा का ढांचा चरमराएगा।
लेखक: डॉ. वीरेन्द्र सिंह गहलान, सस्यविद, Ex. Chief Scientist, CSIR-IHBT, Palampur Himachal Pradesh.
