
कृषि – पारंपरिक, पुनर्जननशील और सतत् प्रथाएँ Publish Date : 03/11/2025
कृषि – पारंपरिक, पुनर्जननशील और सतत् प्रथाएँ
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं शालिनी शर्मा
भारत की पारंपरिक बुद्धिमत्ता और ग्रामीण समृद्धि को पुनर्जीवित करने वाली पशु-केंद्रित कृषि प्रणाली
भारत सदियों से ऐसा देश रहा है जहाँ कृषि केवल आजीविका नहीं बल्कि जीवन का एक तरीका रही है — जो प्रकृति, पशुओं और समुदाय के साथ गहराई से जुड़ी रही है। लेकिन हाल के दशकों में, रासायनिक-आधारित, बाह्य इनपुट पर निर्भर खेती ने इस विरासत को बाधित कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी का ह्रास, जल संकट, किसानों पर कर्ज का बोझ और जनस्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। इस संकट के बीच, एक पशु-आधारित पुनर्जननशील कृषि प्रणाली एक ऐसे मॉडल के रूप में उभरी है जो आर्थिक रूप से व्यवहार्य, पारिस्थितिक रूप से संतुलित और ग्रामीण सशक्तिकरण का आधार है।
यह प्रणाली तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित है:
1. पशु कृषि के केंद्र में हों, न कि केवल एक सहायक के रूप में।
2. जीवित मिट्टी, जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं से समृद्ध हो, बिना कृत्रिम इनपुट के।
3. बंद-लूप स्थिरता, जहाँ कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता और हर तत्व पुनर्जनन करता है।
बाह्य निवेश के बिना आर्थिक व्यवहार्यता
इस प्रणाली में किसी बाहरी निवेश की आवश्यकता नहीं होती। पशुओं को शेड में नहीं रखा जाता, बल्कि दिनभर वे स्वतंत्र रूप से चरते हैं और रात में खेत में दो लोहे के खूंटों के बीच बंधी रस्सी से बांधे जाते हैं। हर सुबह रस्सी को 6–7 फीट आगे बढ़ा दिया जाता है, जिससे गोबर और मूत्र सीधे खेत में जमा होते हैं। इससे महंगे खाद और श्रम की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। इसके अलावा, मूत्र स्वाभाविक रूप से खरपतवार और मिट्टी-जनित रोगों को नियंत्रित करता है, जिससे कीटनाशक या शाकनाशी की जरूरत नहीं पड़ती।
इस प्रणाली में दूध बेचा नहीं जाता। बछड़ों को संपूर्ण दूध पीने दिया जाता है, जिससे उनमें 100% प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है और उनका विकास तेज़ होता है। मादा बछड़े 18–20 महीने की आयु में 100% गर्भधारण करती हैं, बिना कृत्रिम गर्भाधान के। तीसरे बछड़े के बाद पशु को बेच दिया जाता है, और इन बिक्री से प्राप्त आय ही अगली खेती के लिए निवेश बन जाती है। इस प्रकार, यह प्रणाली शून्य लागत और आत्म-निवेशी कृषि चक्र स्थापित करती है, जो छोटे और सीमांत किसानों के लिए पूरी तरह से उपयुक्त है।
पशु-मिट्टी समन्वय से जल आत्मनिर्भरता

इस प्रणाली की एक विशेषता है — बिना सिंचाई के मिट्टी में नमी बनाए रखना। गोबर के विघटन से मिट्टी में छोटे-छोटे छिद्र बन जाते हैं। वर्षा के समय पानी इन छिद्रों से रिसकर लगभग 15 फीट नीचे तक पहुँच जाता है। यह जल वाष्प के रूप में पौधों की जड़ों तक पहुँचता है और पूरी फसल अवधि में नमी बनाए रखता है। यह "जीवित मिट्टी" केवल पशुओं की सतत उपस्थिति और जैविक पदार्थ के कारण बनती है, जो भारत के जल संकट का स्वाभाविक समाधान प्रस्तुत करती है।
पर्यावरण और जलवायु स्थिरता पर प्रभाव
इस प्रणाली का पर्यावरणीय प्रभाव अत्यंत गहरा है। गोबर और मूत्र मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाते हैं, जिससे मिट्टी का क्षरण रुकता है। रासायनिक इनपुट की अनुपस्थिति में मिट्टी के सूक्ष्मजीव पुनर्जीवित होते हैं, और हवा रसायनों के अवशेषों से मुक्त रहती है। चूँकि पशु प्रतिदिन नई जगह पर बाँधे जाते हैं, इसलिए किसी प्रकार का रोग फैलाव या दुर्गंध नहीं होती — इस प्रकार मिट्टी, जल और वायु स्वच्छ रहते हैं, जो स्वच्छ भारत मिशन की भावना से पूरी तरह मेल खाते हैं।
यह कृषि प्रणाली जलवायु परिवर्तन के प्रति भी अत्यधिक लचीली (Climate Resilient) है। मिट्टी की उर्वरता और जल धारण क्षमता बढ़ाकर यह सूखे और तापमान उतार-चढ़ाव से फसलों की रक्षा करती है। साथ ही, यह देशी नस्लों का संरक्षण करती है और जैव विविधता को सशक्त बनाती है, जिससे भारत की पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान प्रणाली को नया जीवन मिलता है।
अन्य किसानों पर प्रभाव और स्वीकृति

देश के विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में, किसान इस प्रणाली में गहरी रुचि दिखा रहे हैं। इसकी सरलता, शून्य लागत और प्राकृतिक परिणाम किसानों की आर्थिक स्थिति को बदल रहे हैं। प्रदर्शन स्थलों पर 100 से अधिक किसान एक साथ आकर प्रशिक्षण और अनुभव साझा कर रहे हैं। अनेक एनजीओ और स्थानीय संस्थाएँ इस प्रणाली के प्रचार-प्रसार में सहयोग दे रही हैं।
जहाँ-जहाँ इस प्रणाली को अपनाया गया है, वहाँ किसानों ने निम्नलिखित सकारात्मक परिवर्तन देखे हैं:
- बिना रासायनिक खाद के मिट्टी की उत्पादकता में वृद्धि।
- नमी-संरक्षित मिट्टी के कारण फसल हानि में कमी।
- पशुपालन से नई आय का स्रोत।
- पशुओं और मनुष्यों में बेहतर स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधकता।
- आत्मनिर्भरता और खेती के प्रति गर्व की भावना का विकास।
यह प्रणाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थिरता प्रदान करती है। युवा किसान जब खेती को लाभदायक और आत्मनिर्भर देखते हैं, तो वे भी इस क्षेत्र में बने रहते हैं। इस प्रकार यह प्रणाली भारत की पशु-आधारित कृषि परंपरा के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम बनती है।
राष्ट्रीय और वैश्विक लक्ष्यों से सामंजस्य
यह मॉडल भारत की कई राष्ट्रीय योजनाओं से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है:
किसान आय दोगुनी मिशन: शून्य इनपुट लागत और पशुओं की बिक्री से आय।
मृदा स्वास्थ्य मिशन: जैविक समृद्धि के माध्यम से मिट्टी का पुनरुद्धार।
जल संरक्षण अभियान: प्राकृतिक रिसाव और भूमिगत जल भंडारण।
आत्मनिर्भर भारत: पूर्णतः स्वावलंबी और स्थानीय रूप से प्रबंधित खेती प्रणाली।
स्वच्छ भारत मिशन: पशुओं की गतिशीलता और मूत्र-आधारित प्राकृतिक स्वच्छता।
यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप भी है, विशेष रूप से जलवायु कार्रवाई, भूमि जीवन, भूख समाप्ति और स्वास्थ्य जैसे लक्ष्यों से।
निष्कर्ष:
यह पशु-केंद्रित पुनर्जननशील कृषि प्रणाली केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन कृषि बुद्धिमत्ता का पुनरुत्थान है — जो 21वीं सदी की स्थिरता, खाद्य सुरक्षा और जलवायु चुनौतियों का सबसे सशक्त समाधान प्रस्तुत करती है। इसकी आर्थिक व्यवहार्यता, पारिस्थितिक संतुलन और सामाजिक सशक्तिकरण इसे राष्ट्रव्यापी प्रसार के लिए आदर्श मॉडल बनाते हैं।
ऐसी प्रणाली की मान्यता भारत की कृषि विरासत को सम्मान देगी, संघर्षरत किसानों के लिए आशा का संदेश बनेगी, और दुनिया को यह दिखाएगी कि भारत अपनी अमर परंपराओं से ही सतत कृषि का नेतृत्व कर सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
