
विभिन्न फसलों के बीज बदलने का उचित समय Publish Date : 28/10/2025
विभिन्न फसलों के बीज बदलने का उचित समय
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य
‘‘गेंहूँ-जौ और चने का बीज तीन और मक्का-सरसों का बीज दो साल में बदलें, लगातार एक ही किस्म की बुवाई करने से रोग प्रतिरोधकता और अंकुरण क्षमता कम हो जाती है।’’
कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि अनुसंधान केन्द्र और बीज निगम आदि से ही बीज खरीदना चाहिए।
उचित बीज का चयन करने पर फसल का उत्पादन 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
कृषि कार्य में बीज की किस्म और फसलें प्रायः सम्बन्धित क्षेत्र के फसलीय मौसम, उस क्षेत्र की मृदा की उर्वरता और जलवायु आदि कारकों के आधार पर चयन किया जाता है। जलवायु परिवर्तन, वर्षा के पैटर्न में बदलाव बौर तापमान उतार-चढ़ाव के जैसी वर्तमान परिस्थितियों के चलते यदि पर्यावरण बदलता है तो पुरानी किस्में उतनी अनुकूल नहीं रहती हैं। नए प्रकार की जलवायु के अनुरूप ही नई किस्में अधिक उपयोगी सिद्व होती हैं।
क्हने का अर्थ है कि मिट्टी, खाद और मेहनत बीज के सही होने पर ही रंग लाती हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि यदि आपका बीज सही होगा तो आपकी उपज भी 20 से लेकर 25 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। बार-बार पुराने या मिलावटी बीज की बुवाई करने से बीज की आनुवांशिक शुद्व भी कम हो जाती है। इसके लिए प्रत्येक 3-4 वर्ष में बीज बदलना चाहिए और प्रमाणित बीज की ही बुवाई करनी चाहिए।
गेंहूँ, जौ और चना आदि के बीज के अंकुरण क्षमता यदि 85 प्रतिशत से कम हो जाती है तो वह बीज अनुपयोगी माना जाता है। अतः इनका बीज तीन साल बाद और मक्का और सरसों का बीज देा वर्ष में बदल देना चाहिए।

एक ही प्रकार का बीज का उपयोग करने के हैं यह दो हानियां
अनुवांशिकः बीज कमजोर होता है, दाने का रंग, आकार बदल जाता है। गेंहूँ की किस्म पीबीडब्ल्यू-343 में यदि एचडी-2967 मिलाया जाए तो पौधा खराब हो जाता है।
गुणवत्ताः बीज की कोशिकाओं में ऑक्सीकरण एवं एंजाइम क्रियाओं की कमी हो जाती है। भंड़ारण सही न तो कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा कम हो जाती है। नमी एवं तापमान के प्रभाव से झिल्ली टूटने लगती है। इलेक्ट्रोलाइट रिसाव बढ़ जाता है। इससे अंकुरण कम और धीमी गति से होता है, इससे पौधे छोटे और पतले निकलते हैं।
किस फसल का बीज कितने समय में बदले
स्वपरागी फसलें: गेंहूँ, जौ और चना का बीज प्रति दो से तीन वर्ष बाद बदलें।
परपरागी फसलें: मक्का, सरसों और सूरजमुखी का बीज प्रत्येक दो से तीन वर्ष बाद बदलें।
संकर किस्मः हाइब्र्रिड मक्का, कपास, धान का बीज प्रत्येक वष नया ही लेना चाहिए।
सिंथेटिक बीजः मक्का, ज्वार बीज प्रत्येक तीन वर्ष के बाद बीज बदलना उचित है।
समिश्रित बीजः बाजार, ज्वार का बीज प्रत्येक दो से तीन वर्ष में बदलें।
बीज के माध्यम से होने वाले रोग और फसलों पर इसका प्रभावः

गेंहूँः गेंहूँ में लगने वाले करनाल बंट रोग में दाने काले और बदबूदार हो जाते हैं। रस्ट रोग पत्तियों, तनों और बालियों पर पीले/काले रंग के धब्बे बन जाते हैं। वहीं स्मट रोग में दाने ही नहीं बन पाते हैं अैर काली धूल जैसे बीजाणु दिखाई देते हैं।
रोग रोधी किस्में: राज-3077 किस्म समय पर अथवा देर से बुवाई करने, हल्की से मध्यम लवणीय/क्षारीय मिट्टी के लिए एक उपयुक्त किस्म हैं। राज-3765 एवं राज-3777 अधिक तापमान एवं रोगों के प्रति संवेदनशील हैं। यह किस्में सामान्य और बहुत देर से बोने के लिए उपयुक्त हैं। राज-4037, राज-4043 और राज-4079 किस्में विशेष रूप से गर्म क्षेत्रों के लिए अनुकूल किस्में हैं।
जौः लूज स्मट रोग में जौ की बालियां पूरी तरह से काली पड़ जाती हैं। कवर्ड स्मट रोग में दानों पर काली परत बन जाती है। पत्ती झुलसा रोग में पत्तियां सूखकर भूरी औश्र धब्बेदार हो जाती है
बुवाई करने के लिए उपयुक्त किस्में: आर.डी.-2552 किस्म खारे पानी के अनुकूल होती है। आर.डी.-2668 उद्योग के लिए, दो पंक्तियों में बुवाई की जाने वाली किस्म है। किस्म राजकिरण सूत्रकृमि (सूक्ष्म कीटों) के लिए प्रतिरोधी किस्म है।
बीज के असली एवं नकली होने की पहचानः
असली बीज सीलबंद पैकेट में मिलता है। पैकेट पर कंपनी का नाम सहित कपनी का लोगो, बैच नंबर और कंपनी का रिजष्टर्ड ऐड्रेस आदि पैकेट पर अंकित होता है। जबकि नकली बीज बक्सर ढीले या खुले बोरे या नकली लोगों में बेचे जाते हैं।
बीज अधिनियम के अनुसार किसी भी अधिसूचित किस्म अथवा प्रजाति के बीज के थैले या पैकेट पर लेबल का होना आवश्यक है। टैग पर फसल और किस्म का नाम, अंकुरण प्रतिशत (प्रायः 85 प्रतिशत), शुद्वता (98 प्रतिशत), नमी (12 प्रतिशत), पैकिंग और इसकी वैद्यता तिथि का उल्लेख होता है।
टैग या पैकेट की सील टूटी हुई हो तो बीज पर भरोसा नहीं करना चाहिए। बीज को खरीदते समय उसका बिल जरूर लेना चाहिए। यदि पैकेट में बीज खराब निले तो इसके लिए आप बीज निरीक्षक, उपभोक्ता फोरम में शिकायत कर सकते हैं। बीज नकली हो तो आप धोखाधड़ी का मामला भी दर्ज करा सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
