गेंदा की खेती से किसान को होता है अधिक लाभ      Publish Date : 02/06/2026

गेंदा की खेती से किसान को होता है अधिक लाभ

                                                                            प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा

यदि आप एक ऐसी नकदी फसल की चाह रखते हैं कि जिसमें लागत, मेहनत तो न्यूनतम और मुनाफा हो बहुत अच्छा हो तो आज हम आज के अपने इस लेख में आपको बताने जा रहे हैं गेंदा की खेती के बारे में, जिसमें आपकी लगात तो बहुत कम आती है, परन्तु मुनाफा अधिक होता है।

भारत में पिछले कुछ सालों से पारंपरिक खेती जैसे गेहूं, धान और गन्ने की तुलना में बागवानी और फूलों की खेती करना, किसानों के लिए एक अत्यधिक मुनाफे का सौदा बनता जा रहा है। ऐसे में यदि हम फलों की खेती के बारे में बात करें तो फूलों की दुनिया में गेंदा एक ऐसी सदाबहार फसल है, जिसकी मांग बाजार में साल के बारह महीने निरंतर ही बनी रहती है। चाहे शादियों का सीजन हो, दीवाली-दशहरा जैसे बड़े त्योहार हों, राजनीतिक रैलियां हों या रोजमर्रा के धार्मिक अनुष्ठान, गेंदे के फूलों के बिना कोई भी आयोजन लगभग अधूरा माना जाता है।

                          

बाजार में इसकी लगातार बनी रहने वाली मांग और बेहद कम समय में तैयार होने की खूबी के कारण ही इसे किसानों के लिए नकद नारायण या पीला सोना भी कहा जाता है। ऐसे में अगर आप भी एक किसान हैं और अगर आप भी कम जमीन, सीमित सिंचाई संसाधनों और न्यूनतम लागत के साथ भारी मुनाफा देने वाली किसी फसल की तलाश में हैं, तो गेंदे की कमर्शियल खेती आपके लिए सबसे उत्तम ऑप्शन हो सकता है, क्योंकि मात्र 3 महीने के भीतर यह फसल किसानों को इंवेस्ट की गई राशि से कई गुना अधिक मुनाफा देना शुरू कर देती है।

गेंदा की खेती शुरूआत कैसे करें?

गेंदा की खेती की शुरूआत करने के लिए सबसे पहले आपको सही समय और सही सीजन का चुनाव करना होता है। गेंदे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी खेती साल में तीन बार खरीफ (जून-जुलाई), रबी (सितंबर-अक्टूबर) और जायद (फरवरी-मार्च) के मौसम में आसानी से की जा सकती है। इसकी खेती की शुरुआत करने के लिए सबसे पहले खेत की अच्छी तरह से दो से तीन बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा कर लिया जाता है और उसमें पर्याप्त मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद या केंचुआ खाद मिलाकर पाटा चलाकर खेत की तैयारी कर ली जाती है, जिससे खेत समतल हो जाता है।

इसके बाद बुवाई के लिए उन्नत किस्मों के बीज का चुनाव किया जाता है। वहीं, अधिक मुनाफे के लिए आप अफ्रीकन गेंदा की किस्मों जैसे पूसा नारंगी, पूसा बसंती, या फ्रेंच गेंदा और हाइब्रिड कलकत्ती लड्डू किस्मों का चुनाव भी कर सकते हैं।

इसके बाद बीज की सीधी बुआई करने के स्थान पर हमेशा गेंदा की पहले नर्सरी तैयार करनी चाहिए। जैसे एक एकड़ या बीघे के अनुपात में ऊंचे बेड बनाकर बीजों की बुवाई कर दी जाती है और बीज की बुवाई करने के तुरंत बाद एक हल्की सिंचाई आवश्यक रूप से कर देनी चाहिए। इसके बाद लगभग 25 से 30 दिनों के बाद जब नर्सरी के पौधे 4 से 5 पत्ती वाले और करीब 10-15 सेंटीमीटर लंबे हो जाएं, तो वह मुख्य खेत में रोपाई के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं। इस दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि पौधों की रोपाई हमेशा शाम के समय (धूप ढलने के बाद) करनी चाहिए, जिससे कि पौधे मुरझाएं नहीं।

इन तथ्यों का भी रखें ध्यान

साथ ही इसका भी ध्यान दें कि खेत में कतार से कतार और पौधे से पौधे की दूरी 45×45 सेंटीमीटर या 60×45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए, जिससे फूलों के विकास के लिए पर्याप्त स्थान मिल सके। वहीं, रोपाई के तुरंत बाद खेत में हल्की सिंचाई जरूरी करनी चाहिए। इसके साथ ही फसल की अच्छी ग्रोथ के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करके खर- पतवार नियंत्रण भी करते रहना चाहिए। इसके बाद जब पौधे रोपाई के बाद करीब 40-45 दिन बीत जाएं, तब उनके ऊपरी मुख्य सिरे को 2-3 सेंटीमीटर तोड़ देना चाहिए, जिसे कृषि विज्ञान में पिंचिंग या शीर्ष कर्तन भी कहा जाता है। ऐसा करने से पौधे में बगल से अधिक शाखाएं निकलती हैं और जितनी शाखाएं अधिक होंगी, फूल भी उतने ही अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं।

एक बीघे में लागत और उत्पादन

                       

लागत:- 1 बीघा खेत में बीज, नर्सरी की तैयारी, खेत की जुताई, गोबर व रासायनिक खाद (डीएपी या पोटाश), कीटनाशक, सिंचाई और तुड़ाई की मजदूरी आदि सबको मिलाकर कुल 8000 से 12000 रुपये तक का खर्च आ जाता है।

उत्पादन:- वहीं, अगर बात उत्पादन की जाए तो वैज्ञानिक और मॉडर्न तरीके से देखरेख करने पर 1 बीघे से लगभग 15 से 20 क्विंटल (1500 से 2000 किलोग्राम) तक हाई क्वालिटी वाले ताजे फूलों का उत्पादन होता है।

एक बीघे में कितना होता है प्रॉफिट?

गेंदा फूल का बाजार भाव पूरी तरह से डिमांड और सीजन पर निर्भर करता है। आम दिनों में या ऑफ-सीजन में इसका थोक भाव 30 से 40 रुपये प्रति किलोग्राम आसानी से मिल जाता है. वहीं, त्योहारों (दीवाली, दशहरा) और शादियों के सीजन के दौरान यही भाव बढ़कर 80 रूपये से लेकर 120 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाता है। अगर एक सुरक्षित और न्यूनतम औसत भाव 40 रुपये प्रति किलोग्राम भी मानकर चल जाए, तो 1 बीघे से प्राप्त 15 क्विंटल (1500 किलो) फूलों को बेचने पर कुल आमदनी 1500x40 = 60,000 रूपये तक की हो जाती है। इस प्रकार यदि कुल आमदनी में से अधिकतम लागत 10,000 रुपये को घटा भी दें, तो किसानों को मात्र 90 दिनों के भीतर 1 बीघे से 50,000 रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हो जाता है। वहीं, अगर आपकी फसल बिल्कुल त्योहारों के सटीक समय पर बाजार में पहुंचती है, तो यही मुनाफा 80,000 रूपये से लेकर 1,00,000 प्रति बीघा तक भी जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।