गैंदा की खेती वैज्ञानिक विधि से      Publish Date : 11/03/2026

         गैंदा की खेती वैज्ञानिक विधि से

                                                                            प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

कम लागत में ज्यादा मुनाफा

गेंदा भारत का एक अत्यंत लोकप्रिय फूल है, जिसे लगभग हर किसान पहचानता है। यह फूल न केवल धार्मिक और सामाजिक कार्यों में उपयोग होता है, बल्कि कम लागत और कम समय में अधिक मुनाफा देने वाली फसल के रूप में भी जाना जाता है। किसानों के लिए यह एक ऐसी फसल है, जिससे वे कम निवेश में अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।

गेंदा की खेती करना आसान है, बाजार में इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है और त्योहारों के समय इसका दाम और भी बढ़ जाता है। सही जानकारी, सही समय और सही तकनीक अपनाकर किसान गेंदा की खेती से प्रति एकड़ अच्छा लाभ कमा सकते हैं।

आज की अपनी इस ब्लॉग पोस्ट में हम गेंदा की खेती की जानकारी, गेंदा की खेती कैसे करें, गेंदा की खेती का समय, हाइब्रिड गेंदा की खेती, कोलकाता गेंदा की खेती, जाफरी गेंदा की खेती और जंगली गेंदा की खेती करने का समय जैसे सभी महत्वपूर्ण विषयों को विस्तार से विचार करेंगे। अब आगे हम गेंदा की खेती का पूरा वैज्ञानिक और व्यावहारिक विवरण क्रमबद्ध तरीके से जानेंगे।

फसल का परिचय :

गेंदा की खेती का वर्णन:

गेंदा एक मौसमी फूल वाली फसल है, जो भारत में खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसमों में उगाई जा सकती है। यह फूल पीले, संतरी, सुनहरे और गहरे पीले रंगों में पाया जाता है, जो देखने में बहुत आकर्षक होता है।

गेंदा की खेती लोकप्रिय है क्योंकि

• इसकी खेती करना अपेक्षाकृत आसान है।
• कम समय में फसल तैयार हो जाती है।
• लागत कम और मुनाफा अधिक है।
• बाजार में पूरे साल मांग रहती है।

भारत में गेंदा की खेती का महत्व

भारत में गेंदा का उपयोग:

• पूजा पाठ और धार्मिक कार्यक्रमों में।
• शादी विवाह और सामाजिक आयोजनों में।
• मंदिरों और सजावट के कार्यों में।
• कीटों को आकर्षित कर अन्य फसलों की सुरक्षा के लिए।

महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश गेंदा उत्पादन करने वाले देश के प्रमुख राज्य हैं। दशहरा और दीवाली के समय इसकी मांग सबसे अधिक होती है।

गेंदा के स्वास्थ्य लाभ और उपयोग:

गेंदा के फूलों के उपयोग

गेंदा केवल सजावटी फूल नहीं है, इसके कई उपयोग हैं:

• धार्मिक उपयोग

• सजावट और माला निर्माण

• औषधीय उपयोग

• कॉस्मेटिक उद्योग में

• प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में

गेंदा के औषधीय लाभ:

• आंखों के लिए लाभकारी
• त्वचा रोगों में उपयोग
• सूजन कम करने में सहायक
• एंटी बैक्टीरियल गुण

कृषि में उपयोग

गेंदा की खेती सब्जियों के साथ करने पर कीटों को आकर्षित कर मुख्य फसल को नुकसान से बचाती है।

वैज्ञानिक वर्गीकरण: Scientific Classification

• Kingdom – Plantae
• Division – Angiosperms
• Class – Dicotyledonae
• Order – Asterales
• Family – Asteraceae
• Genus – Tagetes

जलवायु और तापमान:

उपयुक्त जलवायु:

गेंदा की खेती के लिए गर्म और समशीतोष्ण जलवायु सबसे अच्छी मानी जाती है।

आवश्यक तापमान:

• बुवाई के समय तापमान 25 से 35 डिग्री सेल्सियस
• फूल आने के समय तापमान 28 से 32 डिग्री सेल्सियस

वर्षा आवश्यकता

• 100 से 150 सेंटीमीटर वर्षा पर्याप्त होती है
• जल जमाव से बचाव जरूरी है

मिट्टी की आवश्यकता:

उपयुक्त मिट्टी

गेंदा की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन सबसे अच्छा परिणाम अच्छी जल निकास वाली उपजाऊ मिट्टी में मिलता है।

मिट्टी का पीएच मान

  • पीएच 6.5 से 7.5 उपयुक्त
  • अधिक अम्लीय या खारी मिट्टी अनुपयुक्त

किस्म अनुसार मिट्टी

• फ्रैंच गेंदा हल्की मिट्टी में अच्छा बढ़ता है
• अफ्रीकी गेंदा जैविक पदार्थ युक्त मिट्टी में बेहतर होता है

बीज और किस्में:

गेंदा की खेती में सही बीज और उपयुक्त किस्म का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण होता है। अच्छी किस्म का बीज लेने से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है, फूल बड़े और आकर्षक आते हैं तथा प्रति एकड़ उत्पादन और मुनाफा दोनों बढ़ जाते हैं। भारत में गेंदा की खेती के लिए मुख्य रूप से अफ्रीकी गेंदा, फ्रैंच गेंदा, हाइब्रिड गेंदा, कोलकाता गेंदा और जाफरी गेंदा की किस्में प्रचलित हैं।

गेंदा की प्रमुख किस्मों का वर्गीकरण

गेंदा की खेती का वर्णन करते समय किस्मों को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है:-

• अफ्रीकी गेंदा

• फ्रैंच गेंदा

इनके अलावा उन्नत और क्षेत्र विशेष की किस्में भी उपलब्ध हैं।

अफ्रीकी गेंदा की खेती:

अफ्रीकी गेंदा की खेती बड़े आकार के फूलों और अधिक उत्पादन के लिए जानी जाती है। इसके पौधे लंबे और मजबूत होते हैं।

मुख्य विशेषताएं:


• पौधे की ऊंचाई लगभग 80 से 90 सेंटीमीटर
• फूल आकार में बड़े और गोल
• रंग पीला, गहरा पीला, सुनहरा और संतरी
• फसल अवधि थोड़ी लंबी
• बाजार में मांग अधिक

प्रमुख किस्में:


• Giant Double African Orange
• Giant Double African Yellow
• Crown of Gold
• Chrysanthemum Charm
• Golden Age
• Cracker Jack

अफ्रीकी गेंदा की खेती व्यावसायिक स्तर पर बहुत लाभदायक मानी जाती है, खासकर त्योहारों के मौसम में।

फ्रैंच गेंदा की खेती:

फ्रैंच गेंदा की खेती छोटे किसानों और जल्दी फसल लेने वालों के लिए उपयुक्त होती है। यह किस्म जल्दी तैयार हो जाती है।

मुख्य विशेषताएं:


• पौधे छोटे कद के
• फूल आकार में छोटे लेकिन संख्या अधिक
• रंग पीला, संतरी, लाल जंग और महोगनी
• जल्दी फूल देने वाली किस्म
• कम समय में बाजार योग्य फसल

प्रमुख किस्में:


• Rusty Red
• Butter Scotch
• Red Borcade
• Star of India
• Lemon Drop

फ्रैंच गेंदा की खेती सीमित भूमि वाले किसानों के लिए अच्छी रहती है।

पूसा गेंदा की उन्नत किस्में:

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित पूसा गेंदा की किस्में उच्च गुणवत्ता और अच्छे उत्पादन के लिए जानी जाती हैं।

Pusa Basanti Gainda

• पौधे की ऊंचाई लगभग 58 से 60 सेंटीमीटर
• पत्तियां गहरे हरे रंग की
• फूल सल्फर पीले और दोहरे
• लंबे समय तक फूल देने वाली किस्म

Pusa Narangi Gainda

• फूल आने में 125 से 136 दिन
• पौधे की ऊंचाई लगभग 73 सेंटीमीटर
• फूल संतरी रंग के, घने और दोहरी परत वाले
• प्रति एकड़ ताजे फूलों की पैदावार लगभग 140 क्विंटल

व्यावसायिक गेंदा की खेती के लिए यह सबसे भरोसेमंद किस्म मानी जाती है।

हाइब्रिड गेंदा की खेती:

हाइब्रिड गेंदा की खेती आधुनिक और अधिक लाभ देने वाली प्रणाली है।

हाइब्रिड किस्मों के लाभ:

• एकसमान पौध वृद्धि

• फूल आकार में बड़े और आकर्षक

• अधिक उत्पादन प्रति एकड़

• रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर

• बाजार में ऊंचा भाव

हाइब्रिड गेंदा की खेती उन किसानों के लिए उपयुक्त है जो फूलों की खेती को व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं।

कोलकाता गेंदा की खेती:

कोलकाता गेंदा की खेती मुख्य रूप से पूर्वी भारत में लोकप्रिय है, लेकिन अब पूरे देश में इसकी मांग बढ़ रही है।

विशेषताएं:
• फूल बहुत बड़े और मोटे
• रंग गहरा संतरी
• माला और सजावट के लिए सबसे पसंदीदा
• त्योहारों में अधिक मांग

कोलकाता गेंदा की खेती से किसानों को अच्छा बाजार मूल्य मिलता है।

जाफरी गेंदा की खेती:

जाफरी गेंदा की खेती धार्मिक और पारंपरिक उपयोग के लिए की जाती है।

मुख्य विशेषताएं:
• फूल सुगंधित
• पूजा और मंदिरों में अधिक उपयोग
• स्थानीय बाजार में अच्छी मांग
• मध्यम आकार के फूल

जंगली गेंदा की खेती करने का समय

जंगली गेंदा की खेती सामान्यतः कम देखभाल वाली फसल के रूप में की जाती है।

जंगली गेंदा की खेती करने का समय
• बुवाई का सर्वोत्तम समय बरसात का मौसम
• जून से जुलाई के बीच बोनी
• प्राकृतिक रूप से रोग प्रतिरोधक

यह किस्म सीमांत किसानों के लिए उपयोगी होती है।

सही किस्म का चयन क्यों जरूरी है:-

गेंदा की खेती की जानकारी के अनुसार
• सही किस्म से उत्पादन बढ़ता है
• फूलों की गुणवत्ता अच्छी मिलती है
• बाजार में बेहतर दाम मिलता है
• लागत के मुकाबले मुनाफा अधिक होता है

क्षेत्र, मौसम और बाजार मांग के अनुसार किस्म का चयन करना गेंदा की खेती में सफलता की कुंजी है।

बीज दर:

प्रति एकड़ बीज मात्रा:

• 600 से 800 ग्राम बीज प्रति एकड़

बीज उपचार:

• एजोसपीरियम 200 ग्राम
• 50 मिली धान का चूरा
• बुवाई से पहले बीज उपचार जरूरी

भूमि की तैयारी:

खेत की तैयारी

2 से 3 गहरी जुताई
• मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए

जैविक खाद:

• अंतिम जुताई में 250 क्विंटल रूड़ी की खाद
• अच्छी तरह सड़ा गोबर खाद मिलाएं

बुवाई विधि:

गेंदा की खेती में सही बुवाई विधि अपनाना बहुत जरूरी है, क्योंकि इसी पर पौधों की बढ़वार, फूलों की गुणवत्ता और प्रति एकड़ उत्पादन निर्भर करता है। गेंदा की खेती सामान्यतः पनीरी विधि से की जाती है, जिससे पौधे मजबूत बनते हैं और रोग का खतरा कम होता है।

गेंदा की खेती का समय:

गेंदा की खेती साल में लगभग कभी भी की जा सकती है, लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए सही समय का चयन जरूरी है।

मौसम अनुसार बुवाई का समय:
• खरीफ मौसम में बुवाई का समय
मध्य जून से मध्य जुलाई

• रबी मौसम में बुवाई का समय
मध्य सितंबर से मध्य अक्टूबर

• जायद मौसम में बुवाई का समय
फरवरी से मार्च

जंगली गेंदा की खेती करने का समय
बरसात की शुरुआत सबसे उपयुक्त मानी जाती है क्योंकि इसमें कम देखभाल की जरूरत होती है।

हाइब्रिड गेंदा की खेती
हाइब्रिड किस्मों की बुवाई मुख्य रूप से सितंबर से अक्टूबर के बीच करने पर अधिक फूल प्राप्त होते हैं।

नर्सरी तैयार करने की विधि:

गेंदा की खेती में पहले नर्सरी तैयार की जाती है, फिर खेत में रोपाई की जाती है।

नर्सरी बेड की तैयारी
• नर्सरी बेड का आकार
3 मीटर लंबा और 1 मीटर चौड़ा

• मिट्टी को भुरभुरा करें
• अच्छी तरह सड़ा हुआ गोबर खाद मिलाएं
• बेड को हल्का ऊँचा रखें ताकि पानी न रुके

बीज बोने की विधि:
• बीजों को नर्सरी बेड पर हल्के हाथ से छिड़कें
• ऊपर से बारीक मिट्टी या गोबर खाद की पतली परत डालें
• हल्की सिंचाई करें ताकि नमी बनी रहे

बीज की गहराई:

• गेंदा के बीज बहुत छोटे होते हैं
• बीज को ज्यादा गहराई में नहीं दबाना चाहिए
• बीज की उचित गहराई
लगभग 1 से 1.5 सेंटीमीटर

गहरी बुवाई से अंकुरण प्रभावित होता है, इसलिए सतही बुवाई सबसे बेहतर रहती है।

पौध रोपाई का सही समय:

• जब पौधों की ऊंचाई
10 से 15 सेंटीमीटर हो जाए

• पौध की उम्र
लगभग 25 से 30 दिन

इस अवस्था में पौधे खेत में रोपाई के लिए पूरी तरह तैयार होते हैं।

पौध दूरी (प्रति एकड़):

उचित दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषक तत्व मिलते हैं।

किस्म अनुसार दूरी

• फ्रैंच गेंदा की खेती
35 सेंटीमीटर × 35 सेंटीमीटर

• अफ्रीकी गेंदा की खेती
45 सेंटीमीटर × 45 सेंटीमीटर

सही दूरी रखने से
• पौधे झाड़ीदार बनते हैं
• फूलों का आकार बड़ा होता है
• रोग और कीट कम लगते हैं

रोपाई की विधि:

• शाम के समय रोपाई करना सबसे अच्छा रहता है
• रोपाई के बाद तुरंत हल्की सिंचाई करें
• पौधों की जड़ों को नुकसान न पहुंचे इसका ध्यान रखें

टॉपिंग या पिंचिंग:

गेंदा की खेती में यह एक बहुत महत्वपूर्ण तकनीक है।

फसल जब 30 से 45 दिन की हो जाए

• पौधे के ऊपरी सिरे को हल्का काट दें

पिंचिंग के फायदे
• पौधे झाड़ीदार बनते हैं
• अधिक शाखाएं निकलती हैं
• फूलों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ती है
• प्रति एकड़ उत्पादन में वृद्धि होती है

बुवाई से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव:

• खेत में जल जमाव बिल्कुल न होने दें
• रोपाई के बाद 7 से 10 दिन तक पौधों की नियमित निगरानी करें
• कमजोर या रोगग्रस्त पौधों को तुरंत निकाल दें
• अच्छी गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें

खाद और उर्वरक प्रबंधन:

गेंदा की खेती में अच्छा फूल, बड़ा आकार और अधिक पैदावार पाने के लिए संतुलित खाद और उर्वरक प्रबंधन बहुत जरूरी है। सही समय पर सही मात्रा में खाद देने से पौधे स्वस्थ रहते हैं और फूलों की गुणवत्ता बेहतर होती है।

मिट्टी जांच का महत्व

  1. गेंदा की खेती शुरू करने से पहले मिट्टी की जांच कराना बहुत लाभकारी पाया गया है।
  2. मिट्टी जांच से यह पता चलता है कि खेत में कौन सा पोषक तत्व कम या ज्यादा है।
  3. मिट्टी की रिपोर्ट के आधार पर उर्वरकों की मात्रा घटाई या बढ़ाई जा सकती है।

जैविक खाद का उपयोग

  1. गेंदा की खेती में जैविक खाद का उपयोग करने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है।
  2. जैविक खाद मिट्टी को भुरभुरा बनाती है और जल धारण क्षमता बढ़ाती है।

प्रति एकड़ जैविक खाद मात्रा
• 250 क्विंटल अच्छी तरह सड़ी हुई रूड़ी की खाद
• गोबर की खाद को अंतिम जुताई के समय खेत में अच्छी तरह मिला दें

रासायनिक उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा (प्रति एकड़)

उर्वरक की मात्रा

• यूरिया 70 किलोग्राम
• एस एस पी 100 किलोग्राम
• म्यूरेट ऑफ पोटाश 53 किलोग्राम

पोषक तत्वों की मात्रा

• नाइट्रोजन 32 किलोग्राम
• फास्फोरस 16 किलोग्राम
• पोटाश 32 किलोग्राम

खाद देने की विधि

  1. पूरी फास्फोरस और पोटाश की मात्रा खेत की अंतिम तैयारी के समय दें।
  2. नाइट्रोजन की पूरी मात्रा एक साथ न दें।
  3. नाइट्रोजन को दो बराबर भागों में बांटकर दें।

नाइट्रोजन देने का समय
• पहला भाग रोपाई के 15 से 20 दिन बाद
• दूसरा भाग कली बनने की अवस्था में

हाइब्रिड गेंदा की खेती में खाद प्रबंधन

  1. हाइब्रिड गेंदा की खेती में पोषक तत्वों की आवश्यकता थोड़ी अधिक होती है।
  2. जैविक खाद के साथ संतुलित रासायनिक उर्वरक देना जरूरी है।
  3. समय पर खाद देने से फूलों का आकार बड़ा और रंग चमकदार बनता है।

सूक्ष्म पोषक तत्वों का महत्व

  1. गेंदा की खेती में जिंक, आयरन और बोरॉन जैसे सूक्ष्म तत्व भी जरूरी होते हैं।
  2. यदि पत्तियां पीली पड़ने लगें या फूल छोटे बनें तो सूक्ष्म तत्वों की कमी हो सकती है।

उपाय
• जिंक सल्फेट 10 किलोग्राम प्रति एकड़
• या कृषि विशेषज्ञ की सलाह से घोल बनाकर छिड़काव करें

सिंचाई प्रबंधन:

सिंचाई समय

• रोपाई के तुरंत बाद
• कली बनने से कटाई तक अत्यंत जरूरी

गर्मी के मौसम में

• 4 से 5 दिन के अंतराल पर सिंचाई

खरपतवार नियंत्रण:

निराई गुड़ाई

• आवश्यकता अनुसार 2 से 3 बार
• खेत साफ रखें

कीट और रोग प्रबंधन:

गेंदा की खेती में कीट और रोग यदि समय पर नियंत्रित न किए जाएं, तो फूलों की गुणवत्ता और पैदावार दोनों पर सीधा असर पड़ता है। नीचे प्रमुख कीट, रोग और उनके प्रभावी नियंत्रण को संक्षेप में बताया गया है।

प्रमुख कीट और उनका नियंत्रण

1. मिली बग

लक्षण
• पत्तों, तनों और नई शाखाओं पर सफेद रूई जैसा पदार्थ
• पत्तों पर चिपचिपा पदार्थ
• बाद में काली फफूंद दिखाई देना

नियंत्रण
• डाइमैथोएट 2 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव
• अत्यधिक प्रकोप पर 7 से 10 दिन बाद दोबारा स्प्रे

2. थ्रिप्स

लक्षण
• पत्तों का रंग बदलना
• पत्तों का मुड़ना और गिरना
• फूलों का आकार छोटा रह जाना

नियंत्रण
• प्रति एकड़ 20 पीले स्टिकी ट्रैप लगाएं
• फिप्रोनिल 1.5 मिली प्रति लीटर पानी में छिड़काव
• जैविक विकल्प के रूप में आज़ार्डिरैक्टिन 3 मिली प्रति लीटर

प्रमुख रोग और उनका नियंत्रण

1. पत्तों पर धब्बा रोग:

लक्षण
• पत्तों के नीचे सफेद या भूरे धब्बे
• पुराने पत्तों से शुरुआत
• पत्तों का झड़ना

नियंत्रण
• खेत में जल जमाव न होने दें
• खेत को साफ और हवादार रखें
• घुलनशील सल्फर 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर
10 दिन के अंतराल पर 2 बार छिड़काव

2. उकठा रोगः

लक्षण
• तने पर पानी जैसे धब्बे
• पौधों का अचानक गिर जाना
• नर्सरी में अधिक नुकसान

नियंत्रण
• अच्छी जल निकास वाली मिट्टी का प्रयोग
• कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 25 ग्राम या
कार्बेंडाजिम 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर
खालियों में डालें

रोकथाम के सामान्य उपाय

• खेत में पानी खड़ा न होने दें
• संतुलित खाद और उर्वरक का प्रयोग करें
• रोगग्रस्त पौधों को तुरंत हटा दें
• समय समय पर फसल का निरीक्षण करें
• आवश्यकता अनुसार ही रसायनों का प्रयोग करें

फसल अवधि:

गेंदा की खेती कम समय में तैयार होने वाली फसल है, इसलिए यह छोटे और मध्यम किसानों के लिए बहुत लाभदायक मानी जाती है। किस्म और मौसम के अनुसार इसकी फसल अवधि अलग अलग होती है।

किस्म के अनुसार फसल अवधि

• फ्रैंच गेंदा की खेती
फसल अवधि लगभग 45 से 50 दिन
यह जल्दी फूल देने वाली किस्म है और कम समय में बाजार के लिए तैयार हो जाती है

• अफ्रीकी गेंदा की खेती
फसल अवधि लगभग 60 से 75 दिन
इसके फूल बड़े आकार के होते हैं और उत्पादन अवधि लंबी रहती है

• हाइब्रिड गेंदा की खेती
फसल अवधि लगभग 55 से 70 दिन
इसमें फूल एकसमान आते हैं और तुड़ाई ज्यादा समय तक चलती है

कटाई विधि:

कटाई का सही समय:

  1. गेंदा की कटाई तब करें जब फूल पूरी तरह विकसित हो जाएं।
  2. अधखिले या बहुत अधिक खुले फूल न तोड़ें, इससे बाजार भाव कम मिलता है।
  3. कटाई के लिए सुबह या शाम का समय सबसे उपयुक्त होता है।

कटाई की विधि:

  1. फूलों को हाथ से या साफ धार वाले औजार से तोड़ें।
  2. डंठल को नुकसान न पहुंचाएं ताकि अगली तुड़ाई प्रभावित न हो।
  3. तुड़ाई से एक दिन पहले हल्की सिंचाई करने से फूलों की गुणवत्ता बेहतर रहती है।

कटाई की आवृत्ति

  1. पहली कटाई के बाद 7 से 10 दिन के अंतराल पर लगातार तुड़ाई की जा सकती है।
  2. नियमित कटाई से अधिक फूल और लंबी अवधि तक उत्पादन मिलता है।

कटाई के बाद देखभाल

  1. ताजे फूलों को छायादार स्थान पर रखें।
  2. पैकिंग के लिए बांस की टोकरी या गनी बैग का उपयोग करें।
  3. फूलों को जल्दी बाजार भेजें, क्योंकि गेंदा लंबे समय तक भंडारण योग्य नहीं होता।

उत्पादन प्रति एकड़:

औसत पैदावार

• बारिश में 200 से 225 क्विंटल प्रति एकड़
• सर्दी में 60 से 70 क्विंटल प्रति एकड़

बाजार भाव और मुनाफा:

बाजार मूल्य

• सामान्य समय 8 से 15 रुपये प्रति किलो
• त्योहारों में 20 से 30 रुपये प्रति किलो

प्रति एकड़ मुनाफा:

• कुल लागत लगभग 30000 से 40000 रुपये
• शुद्ध लाभ 80000 से 150000 रुपये तक

भंडारण:

गेंदा एक ताजा फूल वाली फसल है, इसलिए इसका लंबे समय तक भंडारण करना संभव नहीं होता। सही भंडारण से फूलों की ताजगी, रंग और बाजार मूल्य कुछ समय तक बनाए रखा जा सकता है।

उचित भंडारण के मुख्य बिंदु:

• गेंदा के फूलों को कटाई के तुरंत बाद छायादार और ठंडी जगह पर रखें
• फूलों को बांस की टोकरी या गनी बैग में हल्के हाथ से भरें
• भंडारण स्थान पर हवा का अच्छा संचार होना चाहिए
• फूलों पर पानी न गिरने दें, इससे सड़न बढ़ती है
• अधिक गर्मी और सीधी धूप से फूल जल्दी मुरझा जाते हैं

अल्पकालीन भंडारण अवधि

• सामान्य तापमान पर 1 से 2 दिन तक
• ठंडी और नमी रहित जगह पर 2 से 3 दिन तक

परिवहन के लिए सावधानियां

• फूलों की पैकिंग हल्की और हवादार रखें
• लंबी दूरी के लिए सुबह या शाम के समय परिवहन करें
• त्योहारों के समय तुरंत मंडी भेजना अधिक लाभकारी रहता है

विभिन्न सरकारी योजनाएं:

प्रमुख योजनाएं:-

• राष्ट्रीय बागवानी मिशन
• प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
• राज्य बागवानी विभाग की सब्सिडी

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।