संयमित आहार साथ जिएं एक स्वस्थ जीवन      Publish Date : 29/10/2026

 संयमित आहार साथ जिएं एक स्वस्थ जीवन

                                                                                                         डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

अपसंस्कृति जन्य आहार-विहार के चलते वर्तमान समय में मानव शरीर निरंतर रोगों का घर बनता जा रहा है। इस स्थिति के चलते रोग एवं रोगी दोनों की संख्या बढ़ती जा रही हैं। आज के मनुष्य ने अनेक अन्वेषण कर अपना जीवन भोगमय बना लिया है और अनेक सुविधाएं जुटाकर वह ऐसे तो ऐश्वर्यशाली हो गया है, किन्तु स्वास्थ्य के विषय में देखा जाए तो वह निरा निर्धन ही है। क्या वह चिंता का विषय नहीं है कि स्वास्थ्य एक दुर्लभ वस्तु हो गई है क्योंकि मनुष्य ने स्वस्थ जीवन के मूल आधार संयमित आहार-विहार का परित्याग कर दिया है।

वर्तमान समय में मनुष्य ने सुख-सुविधा साधन के कारण अपने जीवन में कठोर श्रम करना बिलकुल ही छोड़ दिया है। अ बवह पदयात्रा करना भूल गया है। महात्मा गांधी ने जिस पदयात्रा करने को कसरत की नानी कहा था, वह सपने की बात हो गई है। जिससे पूर्ण व्यायाम होता है वह साइकिल कोने में पड़ी है या घर से विदा हो गई है। कसरत, व्यायाम, ध्यान, प्राणायाम एवं योग का अब जीवनचर्या में कोई स्थान नहीं है। इसका दिखावा अब फैशन में सम्मिलित है।

                              

आज ‘अर्ली टू बेड एंड अर्ली टू राइज’ अर्थात रात को शीघ्र सोओ एवं प्रातः शीघ्र जागो, इससे स्वास्थ्य एवं बुद्धि मिलती है, इस सिद्धांत के ठीक विपरीत लोग रात में देर तक जाग रहे हैं और प्रातः सूर्य के सिर पर चढ़ने पर उठ रहे हैं। इस अपसंस्कृति ने लोगों के शरीर में आलस भर दिया है जिससे तत्परता एवं चंचलता अदृश्य हो रही है। लोगों का वजन बढ़ रहा है, शरीर मोटा हो रहा है। शरीर पर चरबी की परत चढ़ रही है। बच्चे तक इसके आखेट में आ रहे हैं।

कृशकाय एवं बेडौल शरीर वालों की संख्या बढ़ रही है। संतुलित शरीर वाले लोग आज दुर्लभ प्रायः हो रहे हैं। अल्पाहारी के स्थान पर भांति-भांति की दूषित वस्तुएं ठूंस-ठूंस कर खा रहे हैं।

आज मनुष्य अपनी चटोरी जिह्वा के अधीन हो गया है। स्वाद बढ़ाने हेतु नमक, मिर्च, मसाला, रसायन, तली-भुनी वस्तुएं अधिक खा रहे हैं जो भीतर ही भीतर हमारे लिए विष का काम कर रहा है। आधुनिक लोग बैठकर खाने की अपेक्षा खड़े होकर ठूंस-ठूंस कर खा रहे हैं। बफे सिस्टम ने हमें बफैलो बना दिया है। खाने में जलपान एवं भोजन दोनों वस्तुएं एक साथ खा रहे हैं, खाने के बाद चाय, काफी, कुल्फी, आइसक्रीम, बर्फ गोला आदि अहितकारी वस्तुएं खा रहे हैं।

इसके चलते खाई गई वस्तुओं का पाचन शरीर में बिलम्ब से होता है जो शरीर के भीतर सड़ता रहता है और विषाक्त एव्य शरीर में संचित होते रहते हैं। यह सब स्वास्थ्याघाती है।

खाने में मैदा, तेल, घी, नमक एवं शक्कर, कृत्रिम स्वाद एवं रसायन की मात्रा बढ़ गई है जबकि इनकी अधिकता अहितकारी एवं अस्वास्थ्यकर है जिससे पेट एवं पाचन संबंधित रोग बढ़ रहे हैं। खाने में फुजला अर्थात साग, सब्जी, फल-फूल एवं सलाद की मात्रा घट रही है। अचार, चटनी, सॉस की मात्रा बढ़ रही है जबकि फुजला (रेशा, रेशादार) जो स्वास्थ्य के लिये लाभकारी है उसे त्याग रहे हैं या उसकी मात्रा कम कर रहे हैं। यह ठीक नहीं है।

भूख लगने पर भूख से कम खाने की अपेक्षा जब जी चाहा, जो भी वस्तु हो, जी भर कर खा रहे हैं, जबकि शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था में ही अधिक बार आहार की आवश्यकता होती है। चालीस के बाद मात्रा दो बार भोजन एवं एक बार प्रातः जलपान ही पर्याप्त है। पश्चात्ताप में मात्रा एक बार जलपान एवं आगे एक बार भोजन पर्याप्त है। रात्रि में भोजन के स्थान पर दूध अपने आप में पूर्ण आहार है।

आवश्यकता से अधिक कैलोरी (ऊर्जा) वाला आहार एवं कम श्रम शरीर को बेडौल बना रहा है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक मुटियाते जा रहे हैं। यह मोटापा शरीर में रोगों को जन्म देता है। अधिक एवं अनुपयुक्त आहार के कारण किसी-किसी को ठीक से पाचन नहीं हो पाने पर भोजन के पोषक तत्व शरीर को नहीं लग रहे हैं। अधिक मोटापा एवं अधिक कृशकाय शरीर, दोनों स्वास्थ्य के लिए घातक हैं। फास्ट फूड का चलन जोरों पर है पर फास्ट फूड अच्छे स्वास्थ्य को हानि पहुंचाते हैं।

इसमें मैदा, कृत्रिम स्वाद, रसायन, शक्कर एवं तेल की अधिकता होती है। यह पाचन तंत्र को खराब करता है। उत्तेजक शीतापेय एवं मादक पदार्थों का सेवन रोगों को आमंत्रण देता है। बच्चे एवं बड़े चाय, काफी, काफी, चाकलेट, बिस्किट व बाजारू शीत पेयों के दीवाने हो रहे हैं जो किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है।

भोजन पश्चात् सौ कदम चलकर पेशाब कीजिए। इससे मूत्र मार्ग संक्रमित रोग नहीं होंगे और पाचन को बल मिलेगा। भोजन भूख लगने पर ही लें। भूख से कम एवं सादा व सुपाच्य तथा पौष्टिक गुणों से भरपूर भोजन चबा चबाकर कीजिए। प्रातः पानी व दोपहर भोजन के साथ दही या मठा एवं रात को सोने से पूर्व दूध अमृत के समान है। भोजन में सलाद, साग-सब्जी, फल-फूल की मात्रा बढ़ाएं जो अधिक तला भुना एवं मसाले वाला नहीं हो।

बिना पालिश चावल एवं चोकरयुक्त आटा तथा छिलके वाली दाल का उपयोग कीजिए। सप्ताह में एक दिन उपवास करिए। उस दिन मात्रा पानी एवं रसाहार लीजिए। भोजन सदैव भूमि या कुर्सी पर बैठकर आराम से कीजिए, अधिक नमक, शक्कर, तेल घी, मिर्च मसाला व तली भुनी वस्तुएं नहीं खाइए। मैदे से बनी वस्तु, फास्ट फूड, शीतलपेय, चाय, काफी एवं मदिरा का सेवन कम से कम कीजिए।

दोपहर भोजन के पश्चात् तत्काल पदयात्रा या कठोर श्रम ठीक नहीं है। रात्रि भोजन के पश्चात् बर्फ, आइसक्रीम, कुल्फी, चाय, काफी का सेवन मत कीजिए। प्रातः उठते ही चाय न पीकर उपापान अर्थात बासी पानी ही पीजिए। किसी भी शारीरिक वेग को न रोकिए। इन्द्रियों पर संयम रखिए, किसी भी कार्य की अति नहीं कीजिए। हड़बड़ी एवं तनाव से बचने का प्रयास कीजिए, पास से एवं अधिक टीवी कम्प्यूटर एफएम न देखें। अत्यंत तेज एवं कम प्रकाश में न पढ़िए।

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।