चश्मा बनवाते समय केवल फ्रेम की सुंदरता न देखें      Publish Date : 25/09/2026

चश्मा बनवाते समय केवल फ्रेम की सुंदरता न देखें

                                                                                                     डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

डॉक्टर की सलाह-

नया चश्मा बनवाते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि चश्मा चेहरे पर कैसा लग रहा है? आंखों का सही नंबर, लेंस और उस पर की जाने वाली कोटिंग की भी अहम भूमिका होती है, समझें वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ से पूरी बात विस्तार सें-

सबसे महंगा चश्मा या लेंस ही अच्छे होने की गारंटी नहीं है। सही चश्मा वही है, जो आपकी जरूरत के मुताबिक हो। सबसे पहले, आंखों की पूरी जांच करवाने के बाद ही नया चश्मा बनवाना चाहिए। खासकर, अगर अचानक दृष्टि कम हो जाए, आंख में दर्द हो, धुंधलापन, नए फ्लोटर्स या चमकते रंग-बिरंगे दिखाई दें, तो आंखों की जांच जरूरी है।

फ्रेम का चुनाव कैसे करें

  • फ्रेम चेहरे पर आराम से फिट रहना चाहिए। फ्रेम बहुत ढीला या टाइट न हो, इससे नाक और कान पर दबाव पड़ता है।
  • आंखें फ्रेम के भीतर सही स्थिति में होनी चाहिए। चेहरे और लेंस के नंबर के अनुसार फ्रेम का आकार चुनें। इससे लेंस की मोटाई और देखने की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।
  • अधिक नंबर होने पर बहुत बड़े फ्रेम से बचें। इसमें लेंस मोटे और भारी हो सकते हैं। प्रोग्रेसिव लेंस के लिए फ्रेम की ऊंचाई पर्याप्त होनी चाहिए। बाइफोकल लेंस और लेंस का ऑप्टिकल सेंटर सही तरीके से मिलना चाहिए।

अपने लेंस को भी जानें

लेंस की पावर का निर्धारण सही नहीं है, तो धुंधला दिखना, आंखों में दर्द, सिरदर्द या चक्कर जैसा महसूस हो सकता है। लेंस का चुनाव जरूरत, फ्रेम, काम, लाइफस्टाइल और बाहरी गतिविधियों के अनुसार करें। नया चश्मा पहनने के बाद लगातार धुंधलापन, सिरदर्द, चक्कर या देखने में असुविधा रहे, तो लेंस की पावर और फिटिंग को दोबारा जांच करवाएं।

सीआर-39 / सामान्य प्लास्टिक: कम से कम नंबर और सामान्य उपयोग के लिए किफायती विकल्प है।

हाई-इंडेक्स: अधिक नंबर में लेंस को पतला व हल्का रखने में मदद। एंटी-रिफ्लेक्टिव कोटिंग लेना इसमें जरूरी है।

सबको हर तरह की कोटिंग की जरूरत नहीं

■ एंटी रिफ्लेक्टिव कोटिंग:  यह लेंस पर पड़ने वाले प्रकाश के परावर्तन और चकाचौंध को कम करती है। रात में ड्राइविंग से होने वाली परेशानी में यह मदद। अधिक स्क्रीन टाइम व नियमित चश्मा पहनने वालों के लिए उपयोगी। लेंस साफ रखना आसान।

■ ब्लू-कट / ब्लू-प्रोटेक्ट कोटिंग:  कंप्यूटर स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट को कम करती है। लंबे समय तक लैपटॉप या मोबाइल स्क्रीन देखने वालों के लिए।

■ यूवी प्रोटेक्शन:  सूर्य की पराबैंगनी किरणों से बचाव में मदद। बाहर अधिक समय बिताने वालों के लिए उपयोगी।

■ स्क्रैच-कोट:  हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं। लेंस पर निकलने वाली छोटी खरोंचों को कम करती है, पर हर स्क्रैच को रोक नहीं। कंप्यूटर पर काम करते समय नहीं धूल, गंदगी वाली, नियमित देखभाल और प्रोटेक्शन इसको ज्यादा जरूरी है।

फोटोक्रोमिक व पोलोराइज्ड लेंस

फोटोक्रोमिक लेंस धूप में अपने आप गहरे रंग के हो जाते हैं। बेसिक फोटोक्रोमिक लेंस भी धूप में पूरी तरह से काम के लिए विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। हालांकि, ड्राइविंग के लिए विशेष फोटोक्रोमिक लेंस भी मिलते हैं। पोलोराइज्ड लेंस चमक, पानी व अन्य सतहों से आने वाली चमक को कम करते हैं। ड्राइविंग और बाहर में बेहतर होते हैं।

■ पॉलीकार्बोनेट:  हल्के होते हैं। टूटने पर आंखों को चोट का खतरा कम होता है। बच्चों, खिलाड़ियों और सक्रिय लोगों के लिए उपयोगी होते हैं।

■ कांच:  यूरोप की तुलना में कम, पर वजन में भारी और आसानी से टूट सकते हैं। सामान्य उपयोग में प्लास्टिक लेंस बेहतर माने जाते हैं।

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।