मधुमेह (डायबिटीज) के लिए प्रमुख आयुर्वेदिक उपचार      Publish Date : 18/08/2026

मधुमेह (डायबिटीज) के लिए प्रमुख आयुर्वेदिक उपचार

                                                                                                  डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

आयुर्वेद में चूहों को ‘मधुमेह’ कहा गया है, जो मुख्य रूप से कफ दोष के बढ़ने और मंदाग्नि अग्नि (अग्निमान्द्य) के कारण होता है। आयुर्वेद के अनुसार, ब्लड शुगर को पूरी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है।

मधुमेह के प्रबंधन के लिए मुख्य आयुर्वेदिक औषधियाँ और स्वास्थ्यवर्धक बूटियाँ निम्नलिखित प्रकार से हो सकती हैं:-

मधुमेह के लिए प्रभावशाली आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियाँ (हर्बल उपचार)

गुड़मार (जिमनेमा सिल्वेस्ट्रे): आयुर्वेद में इस बूटी को ‘शुगर का नेक’ कहा जाता है। यह अनाधिकृत रूप से मधुमेह के उतार-चढ़ाव को कम करता है।

मेथी दाना (मेथी): मेथी दाने में मौजूद मधुमेह शामक गुणों ने ग्लूकोज टॉलरेंस को भी कुछ हद तक पछाड़ दिया है। रातभर भीगे मेथी के दानों को खाली खाली पेट सेवन करने से मघुमेह के स्तर में उतार-चढाव में काफी राहत प्राप्त होती है।

जाम्बू के बीज (भारतीय ब्लैकबेरी): जाम्बू के बीज का अर्क या पाउडर एंटीहाइपरग्लाइसेमिक प्रभाव देता है, जो शर्करा स्तर को तेजी से कम करने में सहायक होता है।

करेला (करेला): करेला एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति का ब्लड शुगर भी कम करता है। इसलिए रोज सुबह के समय ताजा करेले के रस का सेवन करने से लाभ मिलता है।

आँवला और हल्दी (निशा-अमलाकी): आँवला और हल्दी का मिश्रण शुगर के प्रति हमारी संवेदनशीलता में अपेक्षित सुधार करता है। यह आयोडीन युक्त स्ट्रैस के स्तर को भी कम करता है।

पियानो (दालचीनी): यह रिवाइवल रेजिस्टेंस को कम करने और वसा को नियंत्रित करने में मदद करता है।

पारंपरिक आयुर्वेदिक फॉर्मूलेशन

विभिन्न सिद्धांत, जैसे कि बैद्यनाथ और केरल आयुर्वेद, के अनुसार निम्नलिखित फॉर्मूलेशन बेहद प्रभावशाली होते हैं:-

ग्लाइमिन प्लस (ग्लाइमिन प्लस): हल्दी, गिलोय और आंवले के मिश्रण से तैयार की गई यह टैबलेट ग्लूकोज मेटाबोलिज्म को समाप्त करती है।

निशाकथाकादि क्वाथः यह एक आयुर्वेदिक काढ़ा है जो कफ और पित्त दोष को शांत करता है और शर्करा को स्थिर करता है।

गिलोय और गोखरू टॉनिकः आयुर्वेद में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और शुगर से मुक्ति के लिए गोखरू और गिलोय का मिश्रण सबसे अधिक उत्तम माना जाता है।

दोष संतुलन के लिए पंचकर्म चिकित्सा (विषहरण)

गंभीर या गंभीर मौसमी मामलों में शरीर से टॉक्सिन्स (आमा) के लिए आयुर्वेदिक डिटॉक्स थेरेपी की सलाह दी जाती हैः-

विरेचन (Virechana): शरीर से निकली हुई पित्त और कफ को तृण सूजन और स्कोब के रेजिस्टेंस को कम करता है।

उद्वर्तन (Udvartana): किट्टी प्लांट पाउडर से जाने वाली दवा जो मेटाबोलिज्म को सक्रिय करती है।

बस्ती (बस्ती): औषधीय उपचार का एनिमा जो वात दोष को प्रभावित करता है और डायबिटिक न्यूरोपैथी से राहत प्रदान करता है।

4. पथ्य और जीवनशैली (आहार और जीवन शैली)

आहारः खाद्य पदार्थों में जौ, बाजरा, विकडी सब्जी (जैसे मेथी, बथुआ) शामिल करें और मिश्रित, बूढ़े और प्रशिक्षु खाद्य मित्रों से पूरी तरह से संबद्ध करें।

विहार (व्यायाम): कफ दोष को कम करने के लिए प्रतिदिन 30-45 मिनट पैदल यात्रा या कपालभाति और मंडुकासन जैसे योग करें।

डायबिटीज से बचने के उपाय

यदि उचित खान पान और जीवनशैली के साथ घरेलु उपचारों का प्रयोग किया जाए तो निश्चित ही रक्त में शुगर के स्तर को नियंत्रित रखा जा सकता है। उचित आहार और जीवनशैली का पालन करने से मधुमेह में होने वाले लक्षण एवं जटिलताओं से भी बचा जा सकता है।

-सब्जियों में करेला, ककड़ी, खीरा, टमाटर, शलजम, लौकी, तुरई, पालक, मेथी, गोभी यह सब खाना चाहिए। आलू और शकरकन्द का सेवन नहीं करना चाहिए।

-फलों में सेब, अनार, संतरा, पपीता, जामुन, अमरुद का सेवन करें इसके विपरीत आम, केला, लीची, अंगूर इस प्रकार के मीठे फल कम से कम खाने चाहिए।

-सूखे मेवों में बादाम, अखरोट, अंजीर खाएँ। किशमिश, छुआरा, खजूर इनका सेवन न करें।

-चीनी, शक्कर, गुड़, गन्ने का रस, चॉकलेट इनका सेवन बिल्कुल न करें।

-एक बार में अधिक भोजन न करें बल्कि भूख लगने पर थोड़े मात्रा में भोजन करें।

-डायबिटीज के रोगी को प्रतिदिन आधा घंटा सैर करनी चाहिए और व्यायाम करना चाहिए।

-प्रतिदिन प्राणायाम करना चाहिए तथा जितना हो सके तनावयुक्त जीवन जीना चाहिए।

डायबिटीज कंट्रोल करने के घरेलू उपाय

यदि आपको शुगर के लक्षण नजर आये तो इसे बिल्कुल भी अनदेखा ना करें। शुगर या डायबिटीज के इलाज के लिए बेहतर होगा कि आप पहले घरेलू उपायों और आयुर्वेदिक दवा का उपयोग करें, इसके बाद अगर स्थिति नियंत्रित नहीं होती है तो शुगर की ऐलोपैथी दवा का प्रयोग करें और अधिक हानि से बचें।

नोटः कृपया कोई भी हर्बल उपचार या दंत चिकित्सा शुरू करने से पहले किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह अवश्य लें ताकि आपके शरीर की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के अनुसार सही खुराक तय की जा सके।

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।