हरड़ का सेवन करने से प्राप्त लाभ      Publish Date : 03/08/2026

        हरड़ का सेवन करने से प्राप्त लाभ 

                                                                                                    डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

हरीतकी त्रिफला के तीन अवयवों में एक होता है। आयुर्वेद में हरीतकी औषधि के लिए बहुत उपयोग किया जाता है। हरीतकी न सिर्फ औषधि के लिए नहीं बल्कि सेहत और सौन्दर्य के लिए भी बहुत लाभकारी होता है। हरीतकी का फल, जड़ और छाल सबका उपयोग किया जाता है।

हरीतकी को हरड़ भी कहते हैं। निघण्टुओं में सात प्रकार की हरीतकी का वर्णन मिलता है। स्वरूप के आधार पर इसकी सात जातियाँ हैं-1. विजया, 2. रोहिणी, 3. पूतना, 4. अमृता, 5. अभया, 6. जीवन्ती तथा 7. चेतकी लेकिन वर्तमान में यह तीन प्रकार की ही मिलती है। जिसको लोग अवस्था भेद से एक ही वृक्ष के फल मानते हैं। वैसे तो हरीतकी सभी जगह मिल जाता है। शायद आपको पता नहीं कि हरड़  बहुत तरह के गुणों वाला औषधीय वृक्ष होता है। हरड़ 24-30 मी तक ऊँचा, मध्यम आकार का, शाखाओं वाला पेड़ होता है। इसके पत्ते सरल,  चमकदार, अण्डाकार और भाला के आकार होते हैं। इसके फल अण्डाकार अथवा गोलाकार, 1.8-3.0 सेमी व्यास या डाइमीटर के और पके हुए अवस्था में पीले से नारंगी-भूरे रंग के होते हैं। फलों के पीछले भाग पर पांच रेखाएं पाई जाती हैं।

                                    

हरीतकी मधुर और कड़वा होने से पित्त; कड़वा व कषाय होने से कफ तथा अम्ल, मधुर होने से वात दोष को नियंत्रित करने में मदद करती है। इस प्रकार देखा जाय तो यह तीनों दोषो को कम करने में सहायता करती है। यह रूखी, गर्म, भूख बढ़ाने वाली, बुद्धि को बढ़ाने वाली, नेत्रों के लिए लाभकारी, आयु बढ़ाने वाली, शरीर को बल देने वाली तथा वात दोष को हरने वाली है।

यह कफ, मधुमेह, बवासीर (अर्श), कुष्ठ, सूजन, पेट का रोग, कृमिरोग, स्वरभंग, ग्रहणी, विबंध (कब्ज़), आध्मान, व्रण, थकान, हिचकी, गले और हृदय के रोग, कामला (पीलिया), शूल (दर्द), प्लीहा व यकृत् के रोग, पथरी, मूत्रकृच्छ्र और मूत्रघातादि (मूत्र संबंधी) रोगों को दूर करने में मदद करती है।

हरड़ का फल अल्सर के लिए हितकारी और प्रकृति से गर्म होती है। हरीतकी का फल सूजन, कुष्ठ, अम्ल या एसिडिटी तथा आंखों के लिए लाभकारी होती है। हरड़ में पांचों रस हैं लेकिन तब भी सेहत के लिए गुणकारी होती है। इसलिए एक ही हरीतकी को विभिन्न तरह के रोगों के लिए प्रयोग किया जाता है।

हरीतकी का सेवन करने के लाभ

आयुर्वेद में हरड़ या हरीतकी का बहुत महत्व है। छोटे से हरड़ में सेहत के बहुत से स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होते होते हैं। हमारे आयुर्वेदिक विशेषज्ञ आपको जानकारी देने जा रहे है कि हरीतकी या हरड़ कितने रोगों में फायदेमंद साबित होती है।

हरड़ का सेवन करने का तरीका हर रोगों के लिए अलग-अलग होता है। हरड़ को उबालकर खाने से दस्त होना बंद होता है तो भूनकर खाने से त्रिदोषहर, भोजन के साथ हरड़ खाने से बुद्धि बढ़ती है, भोजन के बाद सेवन करने से खाने से जो पेट संबंधी समस्याएं होती है उससे राहत मिलती है।

हरीतकी से सफेद बालों को काला करे

श्रेष्ठ हरीतकी के लक्षण- जो हरीतकी नई, मधुर, पुष्ट, गोल, भारी, जल में डूबने वाली लाल रंग की, तोड़ने में गुड़ के समान टूटने वाली, थोड़ी-सी कड़वी, अधिक रस वाली, मोटी छाल वाली, स्वयं पक कर गिरने वाली तथा लगभग 22-25 ग्राम (2 कर्ष) वजन की होती है, वह हरीतकी ही श्रेष्ठ मानी जाती है।

अप्रशस्त हरीतकी-जो हरीतकी कीड़ों के द्वारा खाई हुई, आग से जली हुई, पानी या कीचड़ में पड़ी हुई, ऊसर भूमि या बंजर भूमि में पैदा होती है। यह हरीतकी फटी हुई होती है। अप्रशस्त हरीतकी का सेवन या इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए।

सिरदर्द में हितकारी है हरीतकी

आजकल की तनावभरी जिंदगी में सिरदर्द आम बीमारी हो गई है। हरड़ की गुठली को पानी के साथ पीस कर सिर में लेप लगाने से आधा सिर दर्द से छुटकारा दिलाने में सहायता करती है।

रूसी को करे कम हरीतकी

शायद आपको पता नहीं कि रूसी होने के कारण भी बाल झड़ते हैं। हरड़ को इस तरह से प्रयोग करने पर रूसी आना रोक सकते हैं। आम बीज चूर्ण और छोटी हरीतकी चूर्ण को समान मात्रा में लेकर दूध में पीसकर सिर पर लगाने से रूसी कम हो जाती है।

नेत्र विकार या आँख के बीमारी में हरीतकी

अक्सर दिन भर कंप्यूटर पर काम करने से आँखों में जलन और दर्द जैसी समस्याएं होने लगती है। रोज हरड़ का इस तरह से इस्तेमाल करने पर आँखों को आराम मिलता है। हरड़ को रातभर पानी में भिगोकर सुबह पानी को छानकर आँखें धोने से आंखों को शीतलता मिलती है तथा आँख संबंधी बीमारियों से राहत मिलती है।

मोतियाबिंद में हरीतकी के लाभ

उम्र बढ़ने के साथ मोतियाबिंद की समस्या से सब परेशान होते हैं। हरड़ का इस्तेमाल इस तरह से करने पर मोतियाबिंद के परेशानी से आराम मिलता है।

  • हरड़ की मींगी को पानी में 3 पहर तक भिगोकर, घिसकर लगाने से मोतियाबिन्द में लाभ होता है।
  • हरड़ की छाल को पीसकर लगाने से आँखों से पानी का बहना बन्द होता है।
  • सभी प्रकार के रोगों में हरीतकी को घी में भूनकर आँखों के चारों ओर बाहर के भाग में लेप लगाया जाता है।
  • भोजन करने के पहले प्रतिदिन 3 ग्राम हरीतकी  चूर्ण तथा 3 ग्राम मुनक्का पेस्ट को मिश्री, चीनी या मधु मिलाकर खाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है।

प्रतिश्याय या जुकाम से दिलाए राहत  

मौसम बदला की नहीं जुकाम से सबको परेशानी होने लगती है। हरीतकी जुकाम में बहुत लाभकारी होती है। प्रतिश्याय या जुकाम में हरीतकी का प्रयोग करने से सिरदर्द की परेशानी से आराम मिलता है।

मुँह की बीमारी में हरीतकी के लाभ

मुँह और गले के रोगों में हरीतकी बहुत ही फायदेमंद होती है। हरीतकी का काढ़ा या चूर्ण मुँह के बीमारी में आराम मिलता है। 

  • 20-40 मिली हरीतकी के काढ़े में 3 से 12 मिली मधु मिलाकर पिलाने से गले के दर्द में आराम मिलता है।
  • हरीतकी के चूर्ण का मंजन करने से दांत साफ और निरोग हो जाते हैं।
  • 10 ग्राम हरड़ को आधा ली पानी में उबालकर चतुर्थांश काढ़े में थोड़ी सी फिटकरी घोलकर गरारा करने से जल्दी ही मुँह और गले से होनी वाली ब्लीडिंग बंद हो जाती है।

कफ या खांसी से राहत दिलाये हरीतकी

अगर लंबे समय से कफ से परेशान हैं तो हरीतकी का इस तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं-

  • कफ को निकालने में हरड़ का चूर्ण बहुत अच्छा है। इस कारण हरड़ चूर्ण को 2-5 ग्राम की मात्रा में रोज सेवन करना चाहिए।
  • हरड़, अडूसा की पत्ती, मुनक्का, छोटी इलायची, इन सबसे बने 10-30 मिली काढ़े में मधु और चीनी मिलाकर दिन में तीन बार पीने से सांस फूलना, खांसी और रक्तपित्त रोग (नाक और कान से खून बहना) में लाभ होता है।
  • हरड़ और सोंठ को समान भाग लेकर चूर्ण बनाएं, इसे गुनगुने जल के साथ 2-5 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम सेवन करने से खांसी, सांस फूलना और कामला (पीलिया) में लाभ होता है।

पाचन क्षमता में वृद्वि

अगर खाना खाने के बाद हजम नहीं हो रहा है या एसिडिटी आदि की समस्या हो रही है तो हरीतकी का सेवन इस तरह से करने पर लाभ मिलता है। 3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण में बराबर मिश्री मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करने से पाचन-शक्ति बढ़ती है। हरीतकी चूर्ण के फायदे मिलने के लिए सेवन की मात्रा सही होनी चाहिए।

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।