
आम में छिपा है सेहत का खजाना Publish Date : 09/07/2026
आम में छिपा है सेहत का खजाना
डॉ0 सुशील शर्मा एवं डॉ0 आर. एस. सेंगर
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कुछ बातों का रखें, ध्यान नहीं तो बिगड़ सकती है आपकी सेहत
आम को फलों का राजा कहा जाता है तो इसके कई कारण हैं। इसमें प्रोटीन, फाइबर की मात्रा काफी अधिक होती है। प्रतिरोधक क्षमता बेहतर करने में मदद करता है। इसमें मौजूद विटामिन सी की मदद से हमारा शरीर सूक्ष्मजीवी, बैक्टीरिया और वायरस से बचाव करने में सक्षम होता है। इसमें विटामिन ए होता है, जिससे त्वचा बेहतर होती है। इसकी चमक एवं लचीलापन बनाए रखने में मदद मिलती है। यह आंखों की सेहत के लिए अच्छा है। आयुर्वेद में इसकी तासीर गर्म बताई गई है, इसलिए आम बहुत अधिक मात्रा में खाने से बचना चाहिए और रसायन की मदद से पके हुए आमों के सेवन से परहेज करना चाहिए। इन दिनों बाज़ार में आमों की बहार है। विभिन्न किस्मों के आम बाहर से देखने में लुभाने लगते हैं पर यह आवश्यक नहीं कि वे स्वाद के साथ सेहत के लिए भी अच्छे हों। रसायनों से पके आमों के प्रयोग के क्या है नुकसान?
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ऐसे आमों के पहचान का क्या हो सकता है तरीका इसको जानने की आवश्यकता है
यदि आप आम खाने के शौकीन हैं, तो इन्हें घर लाने और सेवन करने से पूर्व आपको सावधान होना होगा। जिस तरह से बाज़ार में दूसरी चीजों में मिलावट देखी जाती है, आम के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। दरअसल, कानूनी रूप से प्रतिबंधित और असुरक्षित होने के बाद भी आमों को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड जैसे रसायनों का प्रयोग धड़ल्ले से किया जाता है। इस रसायन की मदद से पकाने की प्रक्रिया को देशी भाषा में पुड़िया मसाला या पाल लगाना भी कहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कैल्शियम कार्बाइड से निकलने वाली गैस में आर्सेनिक और पार्टिकल्स जैसे हानिकारक तत्व भी होते हैं जो सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनसे पेट दर्द, दस्त लगने में जलन, सिरदर्द व एलर्जी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लंबे समय तक इनका सेवन करने पर नर्व सिस्टम के साथ-साथ लिवर पर भी गंभीर प्रभाव हो सकता है। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं के लिए रसायनों से पकाया हुआ आम अधिक नुकसानदेह साबित हो सकता है।
कैसे पकाते हैं रसायनों से आम

जब कैल्शियम कार्बाइड आम से निकलने वाली नमी के संपर्क में आता है, तो यह एसेटिलीन नामक गैस का उत्पादन करता है। यह प्राकृतिक रूप से पकाने वाले हॉर्मोन एथिलीन की तरह काम करता है। एथिलीन एक प्राकृतिक पादक हॉर्मोन होता है जिसका प्रयोग कच्चे फलों और सब्जियों को पकाने इत्यादि के रूप में होता है। यह फलों के विकास को भी नियंत्रित कर सकता है। बता दें कि एथिलीन का प्रयोग खाद्य पदार्थों को पकाने आदि के लिए बड़े स्तर पर होता है। हालांकि एथिलीन का प्रयोग कानूनी रूप से प्रतिबन्धित है और सुरक्षित भी माना जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सेहत को नुकसान नहीं पहुंचा सकता।
कृत्रिम तरीके से पकाए गए आम के सेवन का दुष्प्रभाव का पता तुरंत नहीं चलता। यह प्रक्रिया धीरे होती है, इसलिए आप समझ नहीं पाते कि इसका कारण क्या है। कृत्रिम रूप से पकाए आमों का लगातार सेवन करते रहने से पाचन तंत्र पर बुरा असर पड़ता है। एसीडिटी, गैस, कब्ज या आलस जैसी समस्याओं हो सकती है। इससे लीवर की कार्यक्षमता घट सकती है। रसायन रक्त के माध्यम से पूरे शरीर में फैल सकते हैं जो दूसरे अंगों को क्षति पहुंचा सकते हैं। वहीं प्राकृतिक रूप से पके हुए आम के सभी पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। ऐसे में हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि भले ही आम पकने की प्रतीक्षा करनी पड़े, पर उन्हें घर में पकाकर ही सेवन करना चाहिए।
कृत्रिम रूप से पकने वाले आमों की पहचान कैसे करें
प्राकृतिक पके आम पीले दिखाई देते है। सीधे धूप में रखकर आम पकाना भी गलत है। वह खराब हो सकता है और सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।
आम के सीजन में आम खाने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

यदि पेटी वाले आम घर पर लाए हैं, तो अच्छी तरह देख लें कि उसमें कोई पुड़िया आदि तो नहीं लगी हुई है। प्रयास करें कि आप ऐसी दुकानों और स्टोर से आम खरीदें जो विश्वसनीय हों। ठेलों पर बिकने वाले आम ज्यादातर कृत्रिम रूप से पकाए जाते हैं। यह पके हो सकते हैं। इन्हें घर लाते समय सतर्कता बरतें। प्रयास करें कि ऐसी आम खरीदें जो पूरी तरह से पके न हों, घर पर पकाने का प्रयास करें ताकि जोखिम की आशंका कम हो सकें। आम का सेवन करने या उसे छीलने से पूर्व पानी में लगभग 15 से 20 मिनट तक भिगोकर रख दें। उसके उपरांत खाएं। यह ध्यान रहे कि धुने या छीलने से बाहरी रसायन कम हो सकते हैं, पर अभी भी आम पूरी तरह से सुरक्षित नहीं हो सकता है। आम के डंठल वाले हिस्से को हटाकर सेवन करें। आम को छीलकर उन्हें छोटे छोटे टुकड़े टुकड़ों में काटकर प्रयोग कर सकते हैं यदि आम का स्वाद ठीक नहीं रस। हीन है तो उनका सेवन करने से बचना चाहिए।
लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।
