कोदों एवं कुटकी से प्राप्त होने वाले स्वास्थ्य लाभ      Publish Date : 27/06/2026

कोदों एवं कुटकी से प्राप्त होने वाले स्वास्थ्य लाभ

                                                                                                        डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

कोदो का वानस्पतिक नाम पास्पलम स्कोर्बीकुलातम है जिसकी खेती अनाज फसल के लिए की जाती है। कोदो भारत का एक प्राचीन अन्न है जिसे पुराने समय में ऋषि अन्न के रूप में भी जाना जाता था। कोदों को मुख्य रूप से कम बारिश वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है। भारत के कई हिस्सों में कोदो का उत्पादन किया जाता है। इसकी फसल को शुगर फ्री चावल के तौर पर पहचाना जाता है। कोदो की खेती किसानों के लिए कम मेहनत वाली खेती होती है, जिसकी बुवाई बारिश के मौसम के बाद की जाती है।

                                 

कोदों का उपयोग आमतौर पर चावल की तरह उबालकर खाने के लिए किया जाता है। कोदो का खाने के लिए प्रयोग करने से पूर्व इसके दाने के ऊपर उपस्थित छिलके को कूटकर हटाना आवश्यक होता है। कोदो के दानों से चावल का दाना निकलता है, जिसे खाने के लिए उपयोग किया जाता है और स्थानीय बोली में ‘भगर के चावल‘ के नाम पर इसे उपवास में भी खाया जा सकता है। इसके दाने में 8.3 प्रतिशत प्रोटीन, 1.4 प्रतिशत वसा तथा 65.9 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाई जाती है। कोदो-कुटकी मधुमेह नियन्त्रण, यकृत (गुर्दों) और मूत्राशय के लिए लाभकारी है।

यह रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक के प्रभावों से भी मुक्त है। कोदो-कुटकी हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए रामबाण है। इसमें चावल के मुकाबले कैल्शियम भी 12 गुना अधिक होता है। शरीर में आयरन की कमी को भी यह पूरा करता है। इसके उपयोग से कई पौष्टिक तत्वों की पूर्ति होती है। आपने अक्सर बुजुर्गों को कहते सुना होगा “नहाए के बाल और खाए के” गाल अलग नजर आ जाते हैं। कहने को ये बहुत साधारण सी बात है, लेकिन इसके मायने बहुत गहरे हैं”। जैसा आपका खान-पान होता है चेहरे पर चमक भी वैसी ही होती है। विशेषज्ञ बताते हैं, “मिलेट स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए वरदान हैं, जिनके माध्यम से आधुनिक जीवन शैली की बीमारियों (मधुमेह, रक्तचाप, थायराइड, मोटापा, गठिया, एनीमिया और 14 प्रकार के कैंसर) को ठीक किये जा सकते हैं”।

                               

लघु धान्य फसलों की खेती खरीफ के मौसम में की जाती है। सांचा, काकुन एवं रागी को मक्का के साथ मिश्रित फसल के रूप में लगाते हैं। रागी को कोदों के साथ भी मिश्रित फसल के रूप में लेते हैं। ये फसलें गरीब एवं आदिवासी क्षेत्रों में उस समय लगाई जाने वाली खाद्यान्न फसलें हैं जिस समय पर उनके पास किसी प्रकार अनाज खाने को उपलब्ध नहीं हो पाता है। ये फसलें अगस्त के अंतिम सप्ताह या सितंबर के प्रारंभ में पककर तैयार हो जाती है जबकि अन्य खाद्यान्न का मूल्य बढ जाने से गरीब किसान उन्हें नहीं खरीद पाते हैं। अतः उस समय 60-80 दिनों में पकने वाली कोदो-कुटकी, सावां, एवं कंगनी जैसी फसलें महत्वपूर्ण खाद्यान्नों के रूप में प्राप्त होती है। जबलपुर संभाग में ये फसलें अधिकतर डिण्डौरी, मण्डला, सिवनी एवं जबलपुर जिलों में ली जाती है।

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।