अलसी खाएं रोग भगाए      Publish Date : 08/06/2026

               अलसी खाएं रोग भगाए

                                                                                              डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

अलसी (Linisgad) एक महत्वपूर्ण फसल है जो बीज व रेशा प्राप्त करने के लिए भारत के अनेक राज्यों में उगायी जाती है। अलसी का पौधा लाइनम (Linum) वंश का सदस्य हें जो लिनेएसी (Linaceae) परिवार के अन्तर्गत आता है। अलसी का वानस्पतिक नाम लाइनम यूसीटेटिसिमम है। क्षेत्रफल के हिसाब से अलसी की खेती में भारत का विश्व में प्रथम स्थान है, जबकि उत्पादन के हिसाब से कनाडा, चीन, यू.एस.ए. एवं इथोपिया के बाद यह पांचवा स्थान रखता है।

अलसी का आर्थिक महत्व

                                

अलसी के बीजों से तेल निकाला जाता है और इस तेल का उपयोग वार्निश, रंग, सायुन व पेन्ट आदि तैयार करने में किया जाता है। अलसी के बीज व तेल को भारत के कुछ हिस्सों नीचे ही उपयोग कर लिया जाता है है। इसके बीजों में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवण तथा विटामिन्स पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं। ओमेगा-3 (0-3) वसा अम्ल के कारण अलसी का औषधीय महत्व बढ़ जाता है। रक्तचाप तथा शोथ वाली बीमारियों के निवारण है क्योंकि ये वसा अम्ल उच्च कोलेस्ट्रॉल, उच्च में अति लाभकारी सिद्ध हुए हैं। लेकिन इसके उपयोग का तरीका बीमारी की प्रकृति पर निर्भर करता है। इसके तेल में अल्फा लीनोलेनिक अम्ल की पर्याप्त मात्रा होती है। इसके बीज से तेल निकालने के बाद उच्च कोटि की खली को दुधारू पशुओं के लिये उत्तम आहार माना जाता है। W. H. O. ने अलसी को 'सुपर फूड' माना है। पिछले कुछ दशकों से हमारे भोजन में 2-3 व 0-6 वसा अम्लों का अनुपात काफी बिगड़ गया है। 0-3 4 0-6 अम्लों का श्रेष्ठ अनुपात 1:1 का होता है। वसा अम्लों के इस अनुपात में भिन्नता भी मधुमेह का एक बड़ा कारण है। मधुमेह के नियन्त्रण हेतु अलसी को अमृत तुल्य माना गया है। मधुमेह का गुदों पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। अलसी गुर्दे के ऊतकों को नई ऊर्जा देती है।

मधुमेह के रोगी को उच्च रक्तचाप की प्रबल सम्भावना रहती है। अलसी रक्तचाप को भी सन्तुलित रखती है। यह हमारे रक्त में अच्छे कोलेस्ट्रॉल (High Density Lipoprotein = HDL) की मात्रा को बढ़ाती है और ट्राइग्लिसरॉइड व खराब कोलेस्ट्रॉल (Low Density Lipoprotein = LDL) की मात्रा को कम करती है। इसके सेवन से दिल की धमनियों से खून का थक्का नहीं बन पाता है। अतः हार्ट अटैक की संभावना कम हो जाती है। अलसी के बीजों के सेवन से उसमें विद्यमान 0-3 वसा अम्ल, आर्जिनिन एवं लिग्निन प्रजनन क्षमता को बढ़ाते हैं। अलसी में पाया जाने वाला लिग्निन सचमुच में एक सुपर पोषक तत्व है। लिग्निन पेड़-पौधों में एस्ट्रोजन (महिला हॉर्मोन) की तरह कार्य करता है। रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन का स्राव कम हो जाता है और महिलाओं को अनेक परेशानियां जैसे- हॉट फ्लेशेज, ओस्टियोपोरोसिस आदि समस्याएं हो जाती हैं। लिग्निन इन सभी में राहत देता है। गर्भवती स्त्री के स्तनों में दूध बढ़ाने के लिए भी अलसी लाभकारी होती है। यदि मां अलसी का सेवन करती है तो उसके दूध में पर्याप्त 0-3 रहता है और बच्चा अधिक बुद्धिमान व स्वस्थ पैदा होता है। अलसी के लगातार सेवन से चेहरे पर भी कांति आती है।

अलसी के कैंसर-रोधी गुण

अलसी में विभिन्न प्रकार के कैंसर-रोधी तत्व खोजे जा चुके हैं। यह तत्व कैंसर-रोधी हॉर्मोन्स को प्रभावी बनाते हैं। विशेषकर पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर व महिलाओं में स्तन कैंसर की रोकथाम में अलसी का सेवन कारगर है। अलसी में लिग्निन अन्य खाद्यान्नों से कई गुना ज्यादा होता है। लिग्निन कैंसर-रोधी होता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है।

अस्थमा नियंत्रण के लिए वरदान

सर्दी, खांसी, जुकाम आदि में अलसी की चाय दिन में दो तीन बार सेवन की जा सकती है। अस्थमा में यह चाय विशेष उपयोगी पायी गई है। अस्थमा के रोगी एक चम्मच अलसी पाउडर कांच के आधा गिलास पानी में सुवह के समय भिगो दें, शाम को इसे छानकर पी लें या फिर शाम को भिगोकर सुबह सेवन करें तो अस्थमा में लाभ मिलता है।

पाचन तंत्र और फाइबर

अलसी में लगभग 28 प्रतिशत घुलनशील (म्यूसीलेज) और अघुलनशील दोनों ही तरह के फाइबर होते हैं। अलसी कब्ज, मस्से, बवासीर, भगंदर और पथरी के रोगियों को बहुत राहत देती है। कब्ज में अलसी के सेवन से पहले ही दिन राहत मिल जाती है। हाल ही में हुए शोधों से पता चला है कि कब्ज के लिए अलसी ईसबगोल की भुस्सी से भी ज्यादा लाभदायक है।

प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन

अलसी त्वचा की बीमारियों जैसे- मुहासे, एग्जिमा, दाद, खाज-खुजली, बालों का सूखा व पतला होना, बाल झड़ना आदि में काफी लाभकारी है। अलसी में पाये जाने वाले 0-3 बालों को स्वस्थ, चमकदार और मजबूत बनाते हैं। अलसी खाने वालों को कभी रूसी नहीं होती है। अलसी त्वचा को आकर्षक, गोरा, कोमल व नरम बनाती है। नाखूनों को स्वस्थ व सुंदर बनाती है। अलसी खाने व इसके तेल की मालिश से त्वचा के दाग धब्बे, झाईयां एवं झुर्रियां दूर होती हैं। अलसी के सेवन से उम्र में वृद्धि होती है।

अलसी के बीजों का संघटन

                                    

संघटक

अनुपात

संघटक

अनुपात

ऑयल

35-40%

कैल्शियम

170 मिग्रा./100ग्रा.

प्रोटीन

20-30%

लौह तत्व

370मिग्रा./100ग्रा.

रेशा

28%

कैरोटिन

2.7मिग्रा./100ग्रा.

नमी

06.5%

थायमीन

0.23मिग्रा./100ग्रा.

खनिज

2.4%

राइबोफ्लेविन

0.07 मिग्रा./100ग्रा.

कार्बोहाइड्रेट्स

28.9%

नियासिन

1.0 मिग्रा./100ग्रा.

मस्तिष्क और स्नायु तंत्र के लिए दैविक भोजन

अलसी हमारे मन को शान्त रखती है। इसके सेवन से चित्त प्रसन्न रहता है, विचार अच्छे आते हैं, तनाव दूर होता है, बुद्धिमत्ता व स्मरण शक्ति को बढ़ाती है तथा क्रोध नहीं आता है। अलसी के सेवन से मन और शरीर में एक दैविक ऊर्जा का प्रवाह होता है। अलसी अल्जाइमर, अवसाद, माइग्रेन, शीजोफ्रेनिया व पार्किन्सन्स आदि बीमारियों में बहुत लाभदायक है। गर्भावस्था में शिशु की आंखों व मस्तिष्क के समुचित विकास के लिए 0-3 अत्यंत आवश्यक है। 0-3 से हमारी आंखों की रोशनी में वृद्धि होती है। रंग ज्यादा स्पष्ट व उजले दिखाई देने लगते हैं। अलसी बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रन्थि, शीघ्रपतन, नपुंसकता आदि के उपचार में भी महत्वपूर्ण योगदान निभाती है।

मधुमेह और मोटापा नियंत्रण के लिए अलसी का आटा

अलसी ब्लड शुगर नियंत्रित रखती है। मधुमेह के शरीर पर होने वाले दुष्प्रभावों को कम करती है। चिकित्सक मधुमेह के रोगी को कम शर्करा और ज्यादा फाइबर लेने की सलाह देते हैं। अलसी व गेहूँ के मिश्रित आटे का ग्लाइसीमिक इंडेक्स गेहूँ के आटे से काफी कम होता है। मधुमेह के रोगी के लिए यह मिश्रित आटा अच्छा भोजन माना जाता है। मोटापे के रोगी को बहुत फायदा होता है। अलसी में फाइबर की मात्रा अधिक होती है। इस कारण से लंबे समय तक पेट भरा हुआ रहता है। देर तक भूख नहीं लगती है। यह शरीर की चर्बी कम करती है।

अलसी का सेवन कैसे करें

स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम एक एक चम्मच अलसी का चूर्ण पानी के साथ, सब्जी या सलाद में मिलाकर लेना चाहिए। अलसी के चूर्ण को जूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। 30-60 ग्राम चूर्ण की मात्रा प्रतिदिन के सेवन के लिए पर्याप्त होती है।

अलसी का चूर्ण तैयार करने का तरीका

अलसी के बीजों को मिक्सर में दरदरा पीसकर किसी वायुरोधी डिब्बे में भरकर रख लेना चाहिए। बीजों को ज्यादा महीन नहीं पीसना चाहिए और न ही अधिक मात्रा में पीसकर रखना चाहिए क्योंकि पिसा हुआ अलसी का चूर्ण कुछ ही दिनों में खराब होने लगता है। सात दिनों से ज्यादा पुराना पिसा हुआ चूर्ण प्रयोग नहीं करना चाहिए।

अलसी कैसे उगाएं

अलसी की बुवाई अक्तूबर की शुरुआत से मध्य नवम्बर के बीच की जाती है। अच्छे जल निकास वाली सभी मृदाओं (pH 5.0-7.0) में इसकी खेती की जा सकती है। भुरभुरी मिट्टी अलसी की बुवाई के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है क्योंकि इसका बीज बहुत छोटा होता है। बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्डाजिम की 2.5 से 3 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए अथवा ट्राइकोडर्मा विरडी की 5 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित कर बुवाई करना चाहिए। अलसी की बुवाई के लिए 30 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर की दर पर्याप्त रहती है।

जब फसल की पत्तियां सूखने लगे, कैप्सूल भूरे रंग के हो जाएं और बीज चमकदार बन जाएं तब फसल की कटाई करनी चाहिए। सामान्यतः अलसी का पौधा उपरोक्त अवस्थाओं को फरवरी माह के अन्त से मार्च माह के अन्त तक के अन्तराल में प्राप्त कर लेता है। अच्छे से प्रवन्धित की गयी अलसी की फसल से 15-20 कुन्तल बीज की उपज प्रति हेक्टेयर मिल जाती है।

भारत में विभिन्न वर्षों में उगायी गयी अलसी के क्षेत्रफल उत्पादन व उत्पादकता के वार्षिक आंकड़े

वर्ष

क्षेत्रफल (लाख हे)

उत्पादन (लाख टन)

उत्पादकता (किग्रा/हे)

2002-03

4.501

1.767

939

2003-04

4.765

1.965

412

2004-05

4.485

1.697

378

2005-06

4.368

1.725

395

2006-07

4.365

1.679

385

2007-08

4.679

1.634

349

2008-09

3.526

1.480

420

2009-10

3.420

1.537

449

2010-11

358.2

146.5

408

2011-12

322.6

152.5

473

2012-13

395.8

148.4

502

2013-14

292.1

141.2

484

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।