स्वास्थ्य का शत्रु है तनाव      Publish Date : 27/05/2026

           स्वास्थ्य का शत्रु है तनाव

                                                                                                      डॉ0 सुशील शर्मा एवं मुकेश शर्मा

स्वस्थ और दीर्घ जीवन के लिए मन का स्वस्थ रहना जरूरी है। इसलिए अग्रज भी प्रायः खुश रहने का ही आशीष देते हैं। मन प्रसन्न हो, तो जीवन के दूसरे पहलू भी सहज व स्वाभाविक लंगते हैं, किंतु आहार-विहार, विचार, व्यवहार और संस्कारों के कारण इन दिनों प्रसन्न चित चेहरे विरले ही दिखते हैं। इन दिनों अधिकतर लोगों के चेहरे पर तनाव झलकता है।

शरीर में रासायनिक परिवर्तन

हमारे कर्म या व्यवहार से मन में जो संवेग उत्पन्न होते हैं, वे शरीर में रासायनिक परिवर्तन उत्पन्न करते हैं। इन परिवर्तनों के कारण हमारे मन में पैदा होने वाली असुरक्षा, भय, निराशा, उद्विग्नता, कुंठा और दुख आदि ही मानसिक तनाव के पर्याय हैं। तनाव हमारे मन की एक दशा है। कभी यह वास्तविक होता है, तो कभी काल्पनिक। मानसिक तनाव कई तरह से हमारे जीवन पर असर डालता है। मानसिक तनाव को ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हृदय रोग, मोटापा, अनेक प्रकार की एलर्जी, संधिवात (गठिया), थायरॉइड, अम्लपित्त, उदररोग और कैंसर तक का एक कारण माना जाता है।

                               

तनाव को आयुर्वेद में उद्वेग कहा गया है। आयुर्वेद किसी व्यक्ति को तभी स्वस्थ मानता है, जब उसके शरीर में भौतिक और मनोवैज्ञानिक तत्वों (समदोष), शरीर में पैदा होने वाली ऊर्जाओं (समाग्नि) और मांसपेशियों (समधातु) का समन्वय हो। इसके साथ ही उसका उदर ही नहीं बल्कि उसका मन भी क्रियाशील व प्रसन्नचित हो।

किसी भी प्रकार के उद्वेग से शरीर में वात दोष बढ़ जाता है। शरीर में सबसे बड़ी खराबी वातदोष को ही माना गया है। वात दोष का प्रकोप बढ़ने से अन्य तत्वों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।

वैवाहिक और व्यावसायिक जीवन

अपने वैवाहिक और पेशेवर जीवन में हम जिन लोगों से जुड़े होते हैं, विभिन्न परिस्थितियों में उन सबका व्यवहार एक समान नहीं होता। एक-दूसरे के प्रति कभी प्रेम तो कभी घृणा के भाव उठते हैं। यदि हमारे पारस्परिक संबंध या व्यवहार नकारात्मक हैं, तो उससे तनाव उत्पन्न हो सकता है।

वैवाहिक संबंधों में प्रायः बाहरी कारकों से तनाव उत्पन्न होता है जो वैवाहिक स्नेहबंधन, उत्साह और उमंग को कम कर देता है। इससे शारीरिक संबंधों में शिथिलता आ जाती है। तनावग्रस्त दंपत्ति सामाजिक स्तर पर भी अपने को उपेक्षित महसूस करते हैं। कार्यक्षेत्र के तनाव के घर में प्रवेश कर जाने से गृहस्थ जीवन का आनंद, सुख एवं समृद्धि भी नष्ट हो सकती है। तनाव से वैवाहिक संबंधों में अरुचि, निराशा या कुंठित भावनाएं घर कर जाती है और दंपति अपने वैवाहिक जीवनका पूर्ण आनंद नहीं ले पाते। धीरे-धीरे उनके बीच की दूरियां बढ़ती जाती हैं और पारिवारिक जीवन कष्टप्रद लगने लगता है।

इसी प्रकार कार्यस्थलों पर या पेशेवर जीवन में होने वाले घटनाक्रमों का भी हमारे मन पर प्रतिकूल असर पड़ता है। हमारे व्यावहारिक संबंधों और व्यक्ति विशेष के अनुसार बदलती भाव-भंगिमाओं से भी मन के तल पर तरंगें पैदा होती; हैं। यदि दफ्तर में किसी व्यक्ति के प्रति हमारा मैत्री भाव या ईर्ष्या या कोई अन्य नकारात्मक भाव है, तो हमारा मन मैत्री से ज्यादा हमेशा नकरात्मक संवेगों में ही लिप्त रहता है। कार्य संबधी आवश्यकताएं और समय की कमी के चलते अत्यधिक काम का तनाव भी काम की गुणवता को प्रभावित करता है।

एक प्रसन्नचित व्यक्ति जितने बेहतर ढंग से किसी कार्य को करता है, उतना कार्य मानसिक तनाव से ग्रस्त व्यक्ति नहीं कर पाता। लगातार तनाव ग्रस्त रहने से काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है और यह तनाव सेहत के लिए भी नुकसानदेह है। जो लोग लगातार मानसिक तनाव से ग्रस्त रहते हैं, उनकी दो ही प्रवृत्ति होती है। वे या तो तनाव से लड़ेंगे या भाग जाएंगे। दोनों ही स्थितियों में शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। इसलिए ऐसे लोगों के शरीर में रक्त शर्करा की मात्रा और रक्त चाप बार-बार बढ़ जाता है। धीरे-धीरे शरीर की यह आदत बन जाती है और इन दिनों लगभग हर रोग का मूल कारण यही आदत है। आधुनिक विज्ञान के शोध-अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

ऐसे पाएं तनाव से राहत

  • तनाव उत्पन्न करनें वाले कारकों व तत्वों से दूर रहें। संभवतः शांत रहने का प्रयास करें।
  • अगर तनाव अवांछित है और जिसे टाल नहीं सकते तो उसके प्रति उपेक्षाभाव रखें।
  • दुख या आवेगपूर्ण स्थिति में भी संयम रखने का प्रयास करें।
  • परस्पर विचार-विमर्श के द्वारा मन में दमित भाववेगोंको बाहर निकालें।
  • हर्ष और आनंदपूर्वक वातावरण में रहें।
  • गहरी सांसें लें। नियमित रूप से प्राणायाम करें।
  • रोज योगाभ्यास एवं कम से कम 20 मिनट ध्यानसाधना करें।
  • ब्राह्मी, ज्योतिष्मती, जटामासी, पीपल, तुलसी, स्वर्णभस्म, बादाम और गाय का घी का सेवन तन-मन के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं।
  • आयुर्वेदीय पंचकर्म में वर्णित शिरोधारा, शिरोवस्ति, शिरोअभ्यंग (तेल मालिश) आदि से तनाव कम किया जा सकता है।

लेखकः डॉ0 सुशील शर्मा, जिला मेरठ के कंकर खेड़ा क्षेत्र में पिछले तीस वर्षों से अधिक समय से एक सफल आयुर्वेदिक चिकित्सक के रूप में प्रक्टिस कर रहे हैं।